Sunday, December 18, 2016

लाल बहादुर वर्मा का आलेख – ‘भूमंडलीकरण का सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य’।

लाल बहादुर वर्मा



भूमंडलीकरण अपेक्षाकृत एक आधुनिक टर्म है जिसने समूची दुनिया को कई अर्थों में सीमित कर दिया है। इस आधुनिकता ने एक तरफ जहाँ दुनिया को एकरूप बनाने में बड़ी भूमिका निभायी है वहीँ इसने कई दिक्कतें भी पैदा की हैं। कहना न होगा कि आज के ताकतवर और साम्राज्यवादी मानसिकता के देश इसका अपने पक्ष में उपयोग कर रहे हैं। इन्हीं सन्दर्भों में इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा का मानना है कि ‘साम्राज्यवाद के प्रतिकार का भी भूमंडलीकरण होना चाहिए।’ पहली बार पर हम प्रख्यात इतिहासकार प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा के आलेखों को श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी क्रम में आज प्रस्तुत है उनका यह आलेख – ‘भूमंडलीकरण का सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य’। 


भूमंडलीकरण का सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य


प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा


आजकल भूमंडलीकरण का प्रतिकार सामन्तवाद, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के विरोध से ज्यादा होता लग रहा है। तो क्या भूमंडलीकरण उसी श्रेणी की परिघटना है और उतनी ही जन विरोधी, 'आउट ऑफ डेट' और प्रतिकार्य? प्रायः समझा यही जा रहा है। पर यह गलत है।

क्या भूमंडलीकरण- सामन्तवाद, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद की तरह गलत है और उसे भी सिद्धान्त और व्यवहार में नकारा जा सकता है? नहीं, कतई नहीं और यही समझना जरूरी है। भूमंडलीकरण न तो पूरी तरह गलत है न तो चाह कर भी, सारी ताकत लगा कर भी, उसे समाप्त किया जा सकता है। ऐसा करना न केवल संभव नहीं, वांछित भी नहीं है।

भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, बाजारीकरण आज के पूँजीवाद की प्रकृति को चिन्हित करने के सरलीकृत सूत्र मात्र है। यह सब तो पूँजी की प्रकृति में निहित है- जब से पूँजीवाद का प्रादुर्भाव हुआ यह सब होता रहा है। आज भूंमडलीकरण का विशेष अर्थ पूँजी का भूमंडलीकरण है पर इतना ही कहना पर्याप्त नहीं। आज का पूँजीवाद पहले से अधिक जटिल, अधिक आक्रामक, अधिक ग्लैमराइज्ड, अधिक व्यापक तथा अधिक सूक्ष्म और सांस्कृतिक हो गया है और इसी लिए पहले से अधिक खतरनाक और इतिहास विरोधी हो गया है।

भूमंडलीकरण वास्तव में आधुनिकता की लाक्षणिकता है और आधुनिकता पूँजीवाद ही नहीं समाजवाद में भी चरितार्थ हुई है। इसलिए भूमंडलीकरण पूँजीवाद के लिए ही नहीं, समाजवाद के लिए भी अनिवार्य है। दूसरे, भूमंडलीकरण को न केवल रोका नहीं जा सकता, भूमंडलीकरण आर्थिक ही नहीं राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से भी चरितार्थ होता है और होगा ही। मुद्दा यह है कि वह किसके द्वारा किसके हित में कार्यान्वित होता है। तीसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि भूमंडलीकरण और केन्द्रीयकरण न पर्यायवाची हैं न अनिवार्यतः पूरक। ऐसा भी भूमंडलीकरण संभव है जो विकेन्द्रीकरण और संघवाद (फेडरलिज्म) के सार को प्रोन्नत करे। समाजवादी भूमंडलीकरण का यही लक्ष्य होना चाहिए।

भूमंडलीकरण के सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य का विश्लेषण करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि विश्व संस्कृति का- अपने तमाम सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं के साथ, निर्माण नई विश्व व्यवस्था के साथ पिछले दशक में शुरू नहीं हुआ। वह पांच सौ वर्षों से जारी है।

उसकी गति विज्ञान और टेक्नालॉजी के विकास के साथ-साथ तेज होती गई है। शासक वर्ग की संस्कृति का वर्चस्व बनता-बढता गया है। आधुनिक काल के प्रारंभ में जब राष्ट्र-राज्य यूरोप में विकसित हुए, संस्कृति राष्ट्रीय होने लगी और सत्ता का चरित्र जब अन्तर्राष्ट्रीय हुआ तो संस्कृति भी अंतर्राष्ट्रीय हो गई। आज शासक वर्ग वैश्विक होता जा रहा है इसलिए बदनीयत और बाजारू शासकों की संस्कृति का वैश्वीकरण भी बाजारू और बनावटी है। नतीजे में संस्कृति के मर्म-सृजनशीलता और उदारीकरण का क्षरण उजागर होता जा रहा है।

एक एकांगी और विकृत भूमंडलीकरण के रू-ब-रू व्यक्ति-समुदाय-राष्ट्र सभी असहाय होते जा रहे हैं। स्थानीय, राष्ट्रीय और बाहुल (प्यूरल) यथार्थ के सामने जीवन-मरण का प्रश्न खड़ा हो गया है।


पूँजीवाद के व्याख्याकार इसी भूमंडलीकरण को अनिवार्य ही नहीं निर्द्वन्द्व,सर्वशक्तिमान और रामबाण की तरह उद्धारक करार देने में लगे हुए हैं। सिद्धान्ततः ऐसी स्थिति में धार्मिक कट्टरता और साम्प्रदायिकता को अप्रासंगिक होते जाना चाहिए था। पर पूँजीवाद उसके पोषण को मजबूर है। आखिर क्यों? इस लिए जिस तरह से अपने इतिहास के सर्वोत्तम काल फ्रांसीसी क्रान्ति के दौरान सामन्तवाद से क्रान्तिकारी ढंग से सत्ता छीन लेने के बाद भी पूँजीवाद ने सामन्तवाद से समझौता कर लिया था और दो सौ वर्षों से उसे जिलाए रखे हुए है। उसे पता है कि सामन्तवाद की मौत हो गई तो मेहनतकशों से उसकी सीधी टकराहट होगी जिसे सम्भालना असंभव हो जाएगा। अभी तो सामन्ती संस्थाओं और संस्कारों में जकड़ा मेहनतकश भी व्यक्ति और वर्ग के रूप विभाजित रहता है और अपने नैसर्गिक शत्रु पूँजीवाद पर भरपूर संगठित प्रहार नहीं कर पाता। आज पूँजीवाद के तथाकथित  और घोषित एकक्षत्र वर्चस्व के दौर में‘फंडामेंटलिज्म’, तरह-तरह की संकीर्णताओं और जादू-टोने अंधविश्वासों को बढ़ावा मिलना- यहाँ तक कि उनका राजनीतिक इस्तेमाल, क्या अनायास हो रहा है? व्यक्ति और समाज में ज्यों-ज्यों तर्कशीलता और विवेकशीलता बढ़ती जा रही है रूढिग्रस्तता, नियतिवादिता और प्रतिक्रियावादिता को कमजोर होते जाना चाहिए। ऐसे तो जन विरोधी शक्तियों का प्रभुत्व ध्वस्त हो जाएगा। इसलिए तात्कालिक लाभ के लिए आत्मघाती पिछड़ेपन को भी प्रोन्नत किया जाता है। पूँजीवाद ऐसा पहली बार नहीं कर रहा है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद उसी के द्वारा पैदा की गई स्थितियों में जब इटली, जर्मनी और स्पेन में फासीवाद उभरा तो उसे इस लिए पोसा गया था ताकि रूस की समाजवादी क्रान्ति के विरुद्ध उसका इस्तेमाल किया जा सके। जब हिटलर ने फ्रांस और इंगलैण्ड को हड़पने के लिए आक्रमण शुरू किया तब जा कर उन्हें भस्मासुर के जन्म की अर्थवत्ता समझ में आई।

आज भूमंडलीकरण के बाढ़ में सबसे सुगठित संस्था राष्ट्र-राज्य पूँजीवादी बांध में भी दरार पड़ने लगी है। सोलहवीं शताब्दी से ही राष्ट्र-राज्य पूँजीवाद के गढ़ के रूप में मजबूत होता गया था। उसकी दमनकारी भूमिका बढ़ती गई। उसके विरुद्ध क्रान्तियां तक हुई,  पर समाजवादी क्रान्ति के बाद भी राज्य, जिसे विलुप्त होते जाना था, कमजोर नहीं हुआ। पर आज भूमंडलीकरण और अमरीकी वर्चस्व के जमाने में राज्य की सार्वभौमिकता लड़खड़ाने लगी है। भारतीय राज्य भी कितनी ही बार अपनी सार्वभौमिकता के साथ समझौता करता लगता है। व्यक्ति की बढ़ती आत्मकेन्द्रिता अजनबियत और बढ़ने न पाये इसके लिए विघटनकारी शक्तियों को पोसा जा रहा है। बढ़ती उद्धतता और बेहया आक्रामकता का प्रतिकार वर्तमान जीविता हर तरह की सामुदायिक और सामाजिकता को कमजोर कर रही है। समाज में सृजनशीलता का क्षरण हो रहा है। अनिवार्य और नैसर्गिक अन्तर-संबंध विकृत और विरूपित होते जा रहे हैं। समाज में सृजनशीलता का क्षरण हो रहा है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी, जो प्रगति के सूचक और वाहक हैं, आज प्रगति को अवरुद्ध करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

परन्तु दूसरी ओर यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि मनुष्य सामाजिक ही नहीं सांस्कृतिक प्राणी भी है जैसे मनुष्य नैसर्गिक रूप में सामाजिक है वैसे ही सांस्कृतिक भी। संस्कृति प्रबुद्ध और ‘भद्र’ लोगों की बपौती नहीं। वह हर व्यक्ति की नैसर्गिक लाक्षणिकता है। संस्कृति मानव समाज का नैसर्गिक सम्बल है। वहीं अश्वमेध के घोड़ों की रास थाम ली जाती है। राम कितना ही आततायी हो लव-कुश का दमन-दलन संभव नहीं। मतलब यह कि संस्कृति के क्षेत्र में प्रतिकार को रोका नहीं जा सकता। तो फिर बीड़ा उठाने के लिए क्या करना होगा?

सबसे पहले तो यह समझ लेना होगा कि इतना जोर जानने पर क्यों है। सारी सूचना क्रान्ति का मन्तव्य क्या है? जाहिर है कि बौद्धिक प्रक्रिया-सूचना, ज्ञान, विवेक में सूचना सबसे निम्न स्तर का काम है। जानने को सर्वोतम प्राप्य के रूप में स्थापित करने का उद्देश्य यह है कि समझने की अर्थवत्ता समझ में न आवे। समझने से निर्णय ले पाने यानी विवेक का द्वार खुलता है और विवेक शासकों के लिए खतरनाक सिद्ध होता है। तभी तो अगर इर्न्फोरमेशन से बात आगे जाती भी है तो नॉलेज पर रोक लगा दी जाती है- कहा जाता है - ‘नालेज इज पावर’। पूछा जा सकता है कि ‘विजडम इज पावर’ क्यों नहीं। सारांश यह कि सांस्कृतिक मोर्चे पर सूचना के वर्चस्व और केन्द्रीकरण का विरोध होना चाहिए। कार्यभार के रूप में ‘क्विज कल्चर’ के मर्म को समझना चाहिए और उसके स्वरूप को बदलने और वैकल्पिक माध्यम विकसित करने के प्रयास होने चाहिए।



दूसरा मुद्दा सुख और आनंद का है। आज सारी दुनिया में, विशेष कर भारत जैसे देशों में,उन्हें सम्पति और भोग-विलास से जोड़ कर ही देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। कुछ लोग इससे ऊब कर पराभौतिक आनन्द की तलाश में जुटते हैं जैसे- यूरोप, अमरीका के कुछ लोग जिनका ‘मोहभंग’ हो जाता है। कुछ लोग दान-दक्षिणा-भजन-कीर्तन- तीर्थ-यात्रा में अपराध-बोध से रास्ता तलाशते हैं- जैसे भारत का मध्य वर्ग। दोनों ही अतिरेकपूर्ण रास्ते मीडिया के प्रिय विषय हैं और इनको तरह-तरह से प्रोन्नत किया जा रहा है। इसलिए जरूरी है कि आज सम्पत्ति, सुख, आनन्द आदि की अर्थवत्ता स्पष्ट की जानी चाहिए और समाजशास्त्र में, शिक्षण जगत में, इस पर जोर दिया जाय कि विकास वैयक्तिक है और आनन्द सामुदायिक तथा भौतिक आनन्द का सबसे बड़ा उत्सव सहभागिता है।

एक बड़ी सांस्कृतिक चुनौती आज की विडम्बनाओं से उबरने की है। आज आतंकवाद के विरुद्ध सबसे ऊंची आवाज उस की है जो दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी है। आज मानवाधिकार हनन का मुद्दा वह उठाता है जो सबसे व्यवस्थित और नियोजित ढंग से उसका हनन करता है। आज जनवाद का सबसे बड़ा हिमायती होने का दावा और दलील वह देश करता है जो दूसरे देशों में ही नहीं स्वयं अपने देश की भी उन जनवादी परम्पराओं का उल्लंघन कर रहा है, जिन्हें पूँजीवादी से बहुत गर्व से संजोया है। जो जनवाद आधुनिकता का अनिवार्य लक्षण है, जिसका विकास मानव की मुक्ति-कामना से अंतरंग रूप से जुड़ा हुआ है, जिसके लिए संघर्ष से मानव समाज ने नई बुलंदियां दी है। वह न केवल ठहराव का शिकार है बल्कि उसका क्षरण हो रहा है। इसलिए साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण के खिलाफ सबसे बड़ा मोर्चा जनवाद का है। यह न केवल पूँजीवादी-साम्राज्यवादी विकृतियों के विरुद्ध है अपितु समाजवादी भटकावों के भी खिलाफ जरूरी आधार प्रस्तुत करता है। इस से भी सामान्य जन के लिए कार्यभार निकलता है। आज जनवादी परिवार विकसित करना एक आधारभूत कार्यभार है, किसी भी तरह के नवजागरण और सांस्कृतिक आन्दोलन के लिए।

भूमंडलीकरण के संदर्भ में एक सांस्कृतिक संकट भाषा को ले कर भी पैदा हो रहा है। आज अंग्रेजी भूमंडलीकरण का उपकरण बन रही है। इंटरनेट की भाषा अंग्रेजी ही बनती जा रही है। पर यह संयोग ही है कि अंग्रेजी अमरीका की भी भाषा है। इसमें अंग्रेजी का क्या दोष? ऐतिहासिक कारणों से अंग्रेजी का विश्वव्यापी प्रचार हुआ। पहले न अंग्रेजों के राज्य में कभी सूरज डूबता था न अंग्रेजी के। अंग्रेजों का राज तो खत्म हुआ पर अंग्रेजी का बना रह गया। इसमें अंग्रेजी भाषा-साहित्य की प्रकृति का भी योगदान है। आज भी अंग्रेजी दुनिया की सबसे लचीली और जज्ब करने वाली भाषा है। हर साल सारी दुनिया की भाषाओं में सैकड़ों शब्द और मुहावरे अंग्रेजी में आत्मसात किए जाते हैं और शब्द कोशों का विस्तार होता जाता है। अब अंग्रेजी को नकारा नहीं जा सकता पर अपनी-अपनी भाषा-साहित्य के समुचित विकास में जुट जाने की चुनौती स्वीकारी नहीं जा सकती है। उदाहरण के लिए हिन्दी या तो पिछलग्गू और पिछड़ी होने को स्वीकार ले या फिर बीड़ा उठा ले। वर्तमान स्थिति में हिन्दी के साहित्यकार और बुद्धिजीवी इस चुनौती और उससे निकलने वाले कार्यभार की अर्थवत्ता के अहसास, समझ और संकल्प से लैस नहीं दिखाई पड़ते। आज विश्व के श्रेष्ठ लेखन का हिन्दी में अनुवाद मौलिक रचना से कम महत्वपूर्ण नहीं है-- कभी-कभी तो वह श्रेष्ठ और आवश्यक मौलिक रचना की पूर्व शर्त लगाता है। हिन्दी मनीषा की गहराई-ऊंचाई-विस्तार के लिए अनिवार्य है कि वह दुनिया के अधुनातन और श्रेष्ठतम से परिचित हो। यह अंग्रेजी अनुवादों की घटिया अनुवादों यहाँ-वहाँ से उड़ाए गये उदाहरणों और 'अंधों में कनवा राजा' की मानसिकता से संभव नहीं।

कुल मिला कर आज का विकृत और एकांगी भूमंडलीकरण लोगों में परायापन और असहायता भर रहा है- विकल्पहीनता (THERE IS NO ALTERNATIVE, TINA FACTOR) की ओर ले जा रहा है। ऐसे में पहला जरूरी काम तो यही है कि अपने को,अपनों को, सब को विश्वास दिलाया जाय कि विकल्प बाकी है, एक और संसार संभव है और उसे रचना आवश्यक है और उसे हम ही रच सकते हैं।


संकट आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का है।

मानवता के शत्रु भूमंडलीकरण को अपने हित में इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका जवाब राष्ट्रवाद पर जोर नहीं, समाजवादी भूमंडलीकरण की दिशा है। साम्राज्यवाद के प्रतिकार का भी भूमंडलीकरण होना चाहिए। आज सृजन और संघर्ष दोनों का परिप्रेक्ष्य विश्वव्यापी होना चाहिए।

अगर भारत केन्द्रित कोई रणनीति बनती हो तब भी यह जानना आवश्यक है कि भारत प्राचीन काल में संसार में किसी क्षेत्र में पिछड़ा नहीं था। मध्य काल में दुनिया के मुकाबले न यहाँ की अर्थव्यवस्था पिछड़ी थी, न राजनीति, न संस्कृति, विषमता और अमानवीयता के बावजूद। फिर आधुनिक काल में यह क्यों पिछड़ता चला गया? इसके लिए सामन्ती जकड़ पर्याप्त व्याख्या प्रस्तुत नहीं करती। मुख्यतः सामन्ती रूस में पूँजीवादी क्रान्ति के तत्काल बाद समाजवादी क्रान्ति हुई। सामन्ती चीन में नाजीवादी,फिर समाजवादी क्रान्ति और फिर पूँजीवादी प्रति क्रान्ति हुई। भारत 'न तीतर न बटेर’बना रहा। आखिर क्यों? क्योंकि यहाँ यही घातक जाति व्यवस्था थी और अठारहवीं शताब्दी में ही औपनिवेशिक राज्य कायम हो गया। और धीरे-धीरे विदेशी शासकों को भारत में माई-बाप मान लिया गया। यहाँ मध्य वर्ग और पूँजीवाद भी पनपा पर पंगु और पराधीन ही बना रहा। भगत सिंह के पहले किसी ने पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हो कर व्यवस्था परिवर्तन की बात भी नहीं उठाई। यहाँ कांग्रेस ही नहीं कम्युनिस्ट भी प्रायः परमुखापेक्षी बने रहे- नेतृत्व के लिए कभी इंग्लैण्ड तो कभी रूस तो कभी चीन का मुंह ताकते रहे।

आज के हालात में बची-खुची स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता भी छिन जाने का नहीं,समर्पित कर दिए जाने का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसलिए आज के सांस्कृतिक आन्दोलन को व्यापक सृजनशीलता, संघर्ष और साझेदारी विकसित करना पडे़गा। ऐसी चेतना और कार्यक्रम आज जीवन के लिए पूर्व-शर्त से बन गए हैं।


सम्पर्क –

मोबाईल- 09454069645

(इस आलेख में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)
    

Monday, November 7, 2016

नेपाल नाम र तामाङ जातिबीचको सम्बन्ध


१. नेपालको भौगोलिक तथा जन-आवादीको अवस्थिति :
पृथ्वीनारायण शाहको आधुनिक नेपाल तथा अबको नयाँ नेपाल विश्व मानचित्रको दक्षिण एशियामा पर्दछ । चीन र भारतद्वारा घेरिएको यो देश २६ डिग्री २२'' देखि ३० डिग्री २७'' उत्तरी अक्षांश र ८० डिग्री ४'' देखि ८८ डिग्री १५'' पूर्वी देशान्तरसम्म फैलिएको छ । यस्तैगरि पृथ्वीको उत्तरी गोलार्धमा अवस्थित छ । समुद्र सतहको ७० मिटरदेखि ८,८४८ मिटरसम्म अग्लो भू-भाग रहेको नेपाल विश्वमा बुद्धको देशको नामले चिनिएको छ । भौगोलिक रूपमा हिमाल, पहाड र तरार्इ गरी तीन भागमा बाँडिएको देशमा २०५८ सालको जनगणनानुसार विभिन्न १०७ जातजातिको आवादी रहेको छ । हालसम्म सरकारी निकायबाट मान्यता प्राप्त ५९ आदिवासीहरू सूचिकृत भएका देखिन्छन् । अल्पविकसित, बहुल जाति, भाषा, संस्कृति, धर्मको साझा घरको रूपमा रहेको छ । यो देश अहिले हिन्दु एकीकृत निरङ्कुश राज्यसत्ताबाट सङ्घीयताको नाममा जातीय, क्षेत्रीय र भाषिक रूपमा बल्ल-बल्ल स्वायत्तता र मुक्तिको तयारीमा उभिएको छ । दशौं वर्षम्म मारिएका चौधौं हजारको चिहान, कैयौं बेपत्ताहरूको अवस्था अज्ञात रहेको छ । जनआन्दोलका घाइतेहरूका पीडामाथि उभिएर छातीमा हात राखेर नयाँ नेपालको खाका कोर्ने तयारीमा जुटेका छौं ।

२. काठमाडौं दह, मञ्जुश्री र तामाङ बोम्बो-झाँक्री :
पहिले नेपाल खाल्डोमा पानीको दह थियो । सोही दहबीच हालको स्वयम्भू रहेको स्थानमा स्वयम्भूको विराट महाज्योति प्रकट भएको थियो । त्यसपछि ठाउँ-ठाउँबाट मानवबुद्धहरू महाज्योर्तिमय स्वयम्भूको दर्शनार्थ आउने र जाने गरेका वर्णनहरू पाइन्छन् । सोही क्रममा महाचीनबाट मञ्जुश्री बोधिसत्व पनि दर्शनार्थ यहाँ आइपुगेका थिए । उनैले त्यस दहको पानी बाहिर निकालेको कथा पाइन्छन् । एक कथाअनुसार बोधिसत्व मञ्जुश्रीले दहको पानीबीचमा रहेको स्वयम्भूको दर्शन गर्न र यहाँको पानी निकाल्नको निम्ति दहमा जल सयर गरेका थिए । जल सयरका लागि उनलाई एकजना गोले थरी तामाङ बोम्बोले सहयोग गरेका थिए । ती बोम्बोको मन्त्र साधना र शक्ति यति ठूलो थियो कि- उनी नागर्जूनको भित्तोबाट तालमा प्रवेश गरी पौडँदै वा पैदल यात्रा नै गरेर पनि हालको भक्तपुरहुँदै नगरकोट र फूलचोकीसम्म पनि पुग्न सक्थे । कथानुसार मञ्जुश्रीले दहको पानी निकालेर बस्ती बसालेपछि ती बोम्बोको चुरीफुरी बढ्नु पनि स्वाभाविक थियो । बस्ती बसेको केही समयपछि उनका विरोधीहरूले एकदिन भक्तपुरमा समाती ढुङ्गाको खम्बामा बाँधी षडयन्त्रपूर्वक हत्या गरेका थिए । यस्तैगरि अर्को कथा अनुसार ती बोम्बोले दहको पानी निकाल्न मञ्जुश्रीलाई सहयोग गरेकाले कदर स्वरूप भक्तपुरमा तिनको मूर्ति स्थापना गरिएको छ । अझैपनि बैशाख पूणिर्मामा काभ्रेस्थित नमोबुद्धको दर्शनपश्चात् काठमाडौंतिर आउने दर्शनाथीहरूले सोही बोम्बोको मूर्ति रहेको भनिएको प्रशन्न शिल महाविहार, क्वाठण्डौ-देव ननी-ख्वपको दर्शन गर्ने गरेका पाइन्छन् (टेकबहादुर तामाङ, अध्यक्ष बोन कम्यूनिटी स्कूल)। यस विहारको बाहिरी खोपामा रहेको मञ्जुश्री सँगैको दुर्इवटा भैरवको जस्तो देखिने मूर्तिमध्ये एकलाई तामाङ जातिले गोले बोम्बोको रूपमा लिएको हुनुपर्दछ । यहाँ यो कथा जोड्नको कारण के हो भने यस ठाउँ पहिलो बासिन्दा तामाङ नै थियो । त्यसैले यस ठाउँको नामाकरण पनि उनीहरूले नै आफ्नै भाषामा गरेको हुनुपर्दछ भन्ने नै हो ।

३. तामाङ जातिको आवादीसम्बन्धी प्राप्त प्रागऐतिहासिक प्रमाण :
ऐतिहासिक प्रमाणका आधारमा यो निष्कर्षा पुग्न सक्छौं कि- तामाङ जाति नै यस उपत्यकाको पहिलो आदिवासी हो । यस ठाउँको पानी निकाल्न सहयोग गर्ने तामाङ जातिकै बोम्बो थिए भन्ने कथा माथि नै उल्लेख गरिसकिएको छ । रूसी प्रागऐतिहासिक पुरातत्त्वविद् डा. अनातोली याकोब्लेभ शेटेन्को वि.सं. २०३४ सालको हिउँदको अन्त्यमा दुर्इ महिनाको लागि (अर्थात् जनवरी १५ मार्च २४, १९७८ सम्म) नेपालको पुरातात्त्विक अध्ययन भ्रमण गरेका थिए । उनले नेपालको पुरातत्त्व विभागको सहयोगमा अनेक प्राग-ऐतिहासिक पुरातात्त्विक स्थलको अध्ययन गरेका थिए । अध्ययनको क्रममा काठमाडौंस्थित बुढानीलकण्ठको दक्षिण-पूर्वतिरको बानियाँपाखा र पण्डितगाउँको बीचमा रहेको धोवीखोला किनारामा उनले र्इ.पू. ३०,००० (आजभन्दा ३२ हजार) वर्ष पुराना ढुङ्गो हतियारहरू भेट्टाएका थिए । उनका अनुसार मङ्गोलियाको गोवी सभ्यतासित मिल्ने ती हतियारहरू ढुङ्गे युगका पालिस नगरिएको तर चोट दिएर, ताछेर बनाइएका थिए । यसले पनि तामाङ जाति यहाँको पहिलो बासिन्दा हो भन्ने तथ्यको पक्षपोषण गर्दछ । डा. माणिकलाल श्रेष्ठ तथा परशुराम तामाङ लगायतका विश्लेषकहरूले पनि तामाङ नै यस उपत्यकाको पहिलो बासिन्दा भएको बताउँदै आएका छन् ।

४. 'नेपाल' नामसम्बन्धी प्राप्त वर्णन :
यस भूमिको नाम 'नेपाल' कसरी रह्यो होला भन्ने सम्बन्धमा तथ्यगत प्रमाणको अभावमा सबैले अनुमानको भरमा "नेपाल" शब्दको अक्षरलाई फुटाउँदै मनोवाञ्छित विश्लेषण मात्र गर्ने गरेका देखिन्छन् । 'कहिलेदेखि नेपाल शब्द प्रचलित भयो त्यो एकीनसाथ भन्न सकिँदैन तापनि समुद्र गुप्तको प्रयाग प्रशस्तिमा परेको 'नेपाल' नेपाल शब्द नै आजसम्म पाइएको सबभन्दा पुरानो नाम हो' भनि लेभी १९७५ : ११, रेग्मी २०२६ : २ लाई उदृत गर्दै लेखक परशुराम तामाङले आफ्नो पुस्तक "तामाङ जाति"मा उल्लेख गरेका छन् । भाषाबंशावलीमा उल्लेख भएअनुसार- मञ्जुश्रीले नेपाल उपत्यका निवासयोग्य बनाएको केही कालपश्चात् कुनै "ने" मुनीद्वारा पालित यस उपत्यकाको नाम "नेपाल" हुन गयो (बालचन्द्र शर्मा, "नेपालको ऐतिहासिक रूपरेखा" प्रकाशिका : कृष्णकुमारी देवी, २३।११९ दूधविनायक, वाराणसी - १, पृ. ४७) । यहाँ उल्लेखित कुनै "ने" मुनी भनेको को हो भन्ने स्पष्ट हुँदैन । त्यसैले यो मतमा विश्वास गर्न सकिने अवस्था छैन किनकी "ने" मुनी को थिए भन्ने सम्बन्धमा 'कुनै एक मुनी' मात्र भनिएको छ । यदि उसैको नामबाट नेपाल नामाकरण भएको भए कुनै एक 'ने' मुनी भन्नुको सट्टामा उसको स्पष्ट परिचय दिनुपर्दथ्यो साथै उसैले बाँधिदिएको थिति अनुसार चलेको भन्ने हो भने ती थितिहरू के- के र कस्ता-कस्ता थिए भन्ने सम्बन्धमा पनि उल्लेख हुनुपर्दथ्यो ।
भाषा बंशावलीमा उल्लेख भएअनुसार मञ्जुश्रीले पानी निकालेको भन्ने सम्बन्धमा पनि कतिपयले विवाद उठाएका पाइन्छन् । उनीहरूका अनुसार यहाँको पानी मञ्जुश्रीले नभई श्रीकृष्णले निकालेका थिए तर मञ्जुश्रीले पानी निकाल्दा हुँदा टौदहको निर्माण गरी नागराजलाई रोकेको, पशुपति आर्यघाटमास्तिर पानी जमेकोले पशुपति गौरीघाटनेरको डाँडा काटेको र गोकर्णको डाँडा काटी सोभन्दा माथितिरको पानी निकालेको जस्ता क्रमबद्ध वर्णन र स्पष्टता श्रीकृष्ण वा उनका प्रतिनिधिले निकालेको भनिएकोमा पाइँदैन । स्मरणीय तथ्य यो पनि हो कि- त्यस बखत श्रीकृष्ण यहाँ आएका थिएनन् । श्रीकृष्णले पानी निकालेका थिए भनेर विश्वास गर्नेहरूले यहाँको पानी मञ्जुश्रीले निकालेका हुन् भन्ने कुरा झुठ्ठा भएको दावी गरेका पाइन्छन् । यदि भाषावंशावलीमा उल्लेखित मञ्जीश्रीले पानी निकालेको भन्ने कुरा झुट्ठा मान्ने हो भने भाषाबंशावली नै गलत भन्नुपर्ने हुन्छ अनि भाषावंशावली नै गलत भए "ने" मुनीद्वारा पालित नेपाल भनेर दावी गर्नुपर्ने गलत हुनेछ ।
कतिपयले "मञ्जुश्री" भारतीय नाम भन्ने गरेका पनि पाइन्छन् । स्मरण गरौं इतिहास र धर्मग्रन्थहरू उल्था गर्दाखेरि जुन भाषामा लेखियो सोही भाषामा मानिसको नामसमेत उल्था गर्ने चलन थियो । अझ बुझनु पर्ने कुरा यो पनि छ कि- "मञ्जुश्री" भारतीय नाम त हो तर त्यो भन्दा बढी यो तिब्बती भाषाको "ज्याम्बेयाङ"को उल्था हो । तिब्बतीहरूले "मञ्जुश्री"लाई आफ्नै भाषामा "ज्याम्बेयाङ" नै भनी भन्ने गरेका पाइन्छन् । बरू पछि "मञ्जुश्री" नाम तिब्बतमा पनि प्रचलित हुन असम्भव देखिँदैन । यसप्रकार हामी स्पष्ट हुन्छौं कि यस नागदहको पानी श्रीकृष्णको सट्टा मञ्जुश्रीले नै निकालेका थिए ।
'नेपाल' नामकै सन्दर्भमा पाइने अर्को मतानुसार नेवारको "ने" र उनीहरूले बत्ती बाल्न प्रयोग गर्ने पालाको "पाल"लाई संयोजन गरी "नेपाल" नाम बनाइएको हो । त्यसरी नेवारको "ने" र पालाको "पाल"लाई जोडेर "नेपाल" बनाइरहनुपर्ने आवश्यकता देखिँदैन । यस्तैगरी यहाँ नेवारको आवादी हुनुअगावै पहिलो आदिवासी तामाङ जातिको आवादी भइसकेकोले पनि उनीहरूले पहिले नै यस ठाउँको नामाकरण गरिसकेको हुनुपर्दछ ।
यस्तैगरि प्राप्त अर्को कथन अनुसार 'नेपाल र नेवार शब्दको मूल एउटै 'न्यार्वा' शब्द हो । 'न्यार्वा' भन्ने जाति नेवार र तामाङको रक्त मिश्रणबाट बनेको हो ।' अर्थात् नेवार र तामाङको रक्त मिश्रणबाट जन्मिएका मानिसहरू नै 'न्यार्वा' हो । तिनै 'न्यार्वा'बाटै 'नेवार' र 'नेपाल' भएको हो भन्ने मत तामाङ सम्बन्धी अध्ययन, अनुसन्धान गर्दै आएका लेखक रविन्द्र तामाङले टामास यङ्गर जर्ज ग्रियर्सनलाई उदृत गर्दै प्रस्तुत गरेका देखिन्छन् ।
तिब्बततिर झूकाव राख्नेहरूले भने "नेपाल"को अर्थ तिब्बती भाषामा खोज्ने प्रयास गरेका पाइन्छन् । यस मतका अनुयायी मध्ये वाडेल साहेबले १८९१ र्इ. मा एक लेख प्रकाशित गरेको देखिन्छ । उनका अनुसार- तिब्बती भाषामा वा तिब्बत-बर्मी भाषा कुलका अन्य बोलीहरूमा "ने"को तात्पर्य "घर" वा निवास स्थल एवं "पाल"को तात्पर्य "ऊन" हुन्छ । अतः "पाल" हुने ठाउँमा "ने" हुने मानिस "नेपाल" हुन्छन् अथवा "पाल" को "ने" (ऊनको घर वा मण्डी) पनि "नेपाल" भनिन सक्तछ । यसप्रकार माथिल्लो भनाई अनुसार अघि ऊन हुने देशका निवासीहरूको नाम "नेपाल" भएतापनि पछि निवासीहरूको नामले नै उनीहरूको देश पनि प्रसिद्ध हुनु असम्भव छैन ।
पुरानो लाप्चा भाषामा पनि पूर्वी नेपाल र सिक्किमलाई "ने" सञ्ज्ञा नै दिइएको छ र प्राचीन लाप्चा भाषाका ज्ञाताहरू यस शब्दको अर्थ "मानिस बस्ने कन्दरा वा गुफा" लाउँछन् । भोटका लामा धर्मग्रन्थहरूमा यो "ने" शब्द "न्यस्" (Gnas) लेखने गर्दछन् तापनि यसको उच्चारण "ने" नै गर्छन् । लामाहरू यसलाई "पवित्र स्थल वा गुफा" बुझ्दछन् भनी उल्लेख गरेका देखिन्छ तर यहाँ बाडेल साहेब तथ्यको नजिकै पुगेर पनि पछि परेको भन्न सकिन्छ किनकी उनले 'नेपाल' नामको अर्थ तिब्बती लामा र पूर्व लाप्चा भाषामा खोज्न पुगे ।
'नेपाल' नामको वास्तविक अर्थ खोज्ने नै हो भने यहीँको बासिन्दा र भूमिपुत्रलाई सोध्नुपर्दथ्यो । स्मरणीय कुरा के पनि हो भने नेपाललाई तिब्बतीहरूले आफ्नै भाषामा "ह्रोङ" र "माङ्हृयुल" भन्ने गर्दथे । "ह्रोङ" र "माङ्ह्युल" भनेर सम्बोधन गरी सकेपछि पुनः यस देशमा "ने" अर्थात् "घर" र "पाल" अर्थात् "ऊन" लाई मिलाएर "नेपाल" भनि व्याख्या र नामाकरण गरिरहनु पर्ने आवश्यकता नै देखिँदैन ।

५. को थिए पहिलो आदिवासी ?
काठमाडौं उपत्यकाको पहिलो आदिबासी कुन हो भन्ने जिज्ञासा उठ्न सक्छ । प्राप्त प्रमाणहरूले तामाङ नै यहाँको पहिलो आदिवासी भएको प्रमाणित गरेको पाइन्छ । पछि नेवार जातिको प्रवेश भएपछि तामाङ जाति विस्तारै यहाँबाट बाहिरिन थालेको देखिन्छ । हालको टिचिङ्ग हस्पिटल महाराजगञ्ज रहेको स्थानमा सो अस्पतालको निर्माण अघिसम्मै तामाङ बस्ती थियो । अस्पताल निर्माणको क्रममा त्यहाँका तामाङ जातिलाई हटाउन सकिने भन्दै अधिग्रहण गरी हटाइएको थियो । अझैपनि काँठ क्षेत्रका साथै बौद्ध क्षेत्रमा तामाङको बस्ती पाइने गरेको छ । आवादीको कुरा गर्ने नै हो भने यहाँको पहिलो आवादी भएको जाति तामाङ नै हो भन्ने सम्बन्धमा थुप्रै अनुसन्धानकर्ताहरूले लेखेका छन् ।
जनकलाल शर्माका अनसुार "...मङ्गोल जातिका मानिस कुनै समय पहिले काठमाण्डू उपत्यकामा आवाद भए र त्यसपछि अन्य बाहिरिया मानिसको आगमन हुन थालेपछि ती मङ्गोलहरू उपत्यकाभन्दा बाहिर रहेको पहाडी भूमितिर लागे । रहँदाबस्ता तिनीहरू पछिल्लो कालमा आएर तामाङ, मुर्मी आदि अनेक नामले सम्बोधित हुँदै गए । जो आज पनि त्यसै उपत्यकालाई चारैतिर घेरेर बसेका पाइन्छन्" (जनकलाल शर्मा 'हाम्रो समाज : एक अध्ययन' प्रकाशक : साझा प्रकाशन, तेस्रो संस्करण २०५८ पृ. ३१९) । यस्तैगरी परशुराम तामाङज्यूले वंशीटार्टलाई उल्लेख गर्दै लेखेका छन् कि- प्राचीन इतिहासले यस्तो सङ्केत गर्दछ कि तिनीहरू (तामाङ) नेपाल खाल्डोका प्राचीन बासिन्दा थिए तर पछि केही समय बितेपछि तिनीहरूलाई अन्य केही जातिले पराजित गरायो । जसले तिनीहरूलाई अपमानजनक अवस्थामा आधिपत्य गर्‍यो र तिनीहरूलाई खेतबारी जोतने, भारी बोक्ने, दाउरा घाँस गर्ने आदि कडा श्रम गर्न बाध्य गरायो । व्यवहारमा तिनीहरूको दास बनाए । यस्ताबाट उम्कन तिनीहरू पूर्वी नेपालका टाढा-टाढासम्म घुमे र त्यहीँ बसोबास गरे (१९०९) ।
करनले पनि तामाङ जाति नेपालमा र्सवप्रथम आउने आगन्तुकहरू मध्येका हुन् भन्ने मान्दछन् (१९६० : ६६) । तामाङको के तर्क छ भने तिब्बतको आवादी पाँच हजार वर्षघि मात्र भएको हो । त्यसैले तामाङ जाति तिब्बत आवादी हुनुभन्दा पहिले नै हिमाल पार गरी बसेको हुनुपर्दछ (१९९१ : १४) (परशुराम तामाङ 'तामाङ जाति', प्रकाशक : नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान, कमलादी काठमाडौं प्रथम संस्करण २०५१ पृ. २४) । यसैगरी तामाङ जातिको आवादीकै सन्दर्भमा अर्का अध्येता कर्क पेटि्रकका अनुसार नेवार जातिले राज्य गर्नु अघि नेपालमा भोटे जातिले राज्य गरेका थिए । नेवारले तिनीहरूलाई काठमाडौं उपत्यकाबाट हटाएका थिए । तिनलाई काठभोटिया (काठमाडौं भोटिया) भनिन्थ्यो । जो आजसम्म पनि संरक्षित छ र हाल कच्छाडको पहाडमा तर मुख्य रूपमा कुतीपट्टीको पर्वतीय भूमिमा आवाद छन् (१८११ : १४८) (ऐ.ऐ. पृ. २९) । एवंरीले परशुराम तामाङ आफैँले पनि उपत्यकामा नेवारभन्दा पहिले तामाङ जातिले राज्य गरे भन्ने आशङ्का गरेका देखिन्छन् (ऐ ऐ. पृ ६) । यिनै आधारहरूले पनि काठमाडौं उपत्यकामा सबैभन्दा पहिले आवाद भएको जाति तामाङ भएको कुरा पुष्टी हुन्छ ।

६. के हुन सक्छ त तथ्य ?
प्राप्त ऐतिहासिक प्रमाणहरूका आधारमा यो भन्न सक्छौं कि- नेपाल उपत्यकाको आदि भूमिपुत्र भनेको तामाङ जातिकै पूर्खा थिए । त्यसैले "नेपाल" नाम तामाङ भाषाबाटै आएको हुनुपर्दछ । तत्कालिक तामाङ समाज बोन धर्म र झाँक्रीवादी प्रचलनद्वारा सञ्चालित थियो । त्यसैले यिनीहरूको समाजमा भूतप्रेत, नाग-नागिनी, देउ-देउता, शिकारी र कुलदेउता आदिमाथिको विश्वास पाइन्छन् । ती शक्तिहरूमा पनि आफैँ उत्पत्ति वा उत्पन्न भएको, बोन वा समाजले स्थापना गरेको, कुल र पितृदेउता आदि हुने गर्दछन् । आफैँ उत्पन्न भएको शक्ति वा देउतालाई 'नेपा ल', स्थापना गरिएको देउतालाई 'तेन्पा ल' र कुल तथा पितृ देउतालाई 'तिङ्दो ल' र 'फोला ल' र गाउँको देउतालाई 'स्हिङ्ला/ह्युल्ला ल' भन्ने गर्दछन् ।
संस्कृतको 'स्वयम्भू' नाम तामाङ भाषाको 'नेपा ल'को उल्था गरिएको रूप हो भन्ने मेरो ठहर छ । सोही 'नेपा ल' (स्वयम्भू) शब्दबाटै 'नेपाल' नाम रहेको हुनुपर्दछ किनकी स्वयम्भूलाई 'नेपा ल' भनी सम्बोधन गर्दा-गर्दै 'नेपा ल' बाट 'नेपाल' हुँदै 'नेपाल' नाम रहेको गएको देखिन्छ । कालन्तरमा त्यही 'नेपाल' नामले हालको 'स्वयम्भू'लाई मात्र नभई यस काठमाडौं खाल्डोलाई नै चिनाउन थालेपछि तामाङ भाषाको 'नेपाल' (स्वयम्भू) भने 'स्वयम्भू' नामबाट परिचित हुन गएको देखिन्छ । पृथ्वीनारायण शाहले एकीकरण गरी सकेपछि भने यस देशको नाम पनि 'नेपाल' नै रहन गएको तथ्य त सबैलाई थाहा भएकै कुरा हो ।

७. कसरी ?
हालको स्वयम्भू दहको पानीभित्र डुबिरहेकै बेला त्यहाँ महाज्योर्तिमय विराट रूप उत्पन्न भएको देखिन्छ । संस्कृत भाषाको "स्वयम्भू"को अर्थ आफैँ उत्पन्न भएको भन्ने हुन्छ । आफैँ प्रकट भएको महाज्योर्तिमय रूपको भगवानलाई नै "स्वयम्भू" नामले चिनाउन थालिएको पाउँछौं । त्यसरी आफैँ उत्पन्न भएको देउतालाई तत्कालिक बोन (झाँक्री) धर्म मान्ने तामाङ जातिको भाषामा "नेपा ल" (नेपा + ल ) भनिन्थ्यो । उनीहरूको भाषानुसार "नेपा"को अर्थ आफैँ उत्पन्न भएको र "ल" को अर्थ देउता भन्ने हुन्छ । यसप्रकार शुरूमा नेपाल खाल्डोलाई बस्तीयोग्य बनाउने वा आवादी गर्ने यिनै तामाङ जातिकै भाषामा यहाँको नाम 'नेपाल' रहन गएको हुनुपर्दछ ।
वास्तवमा हालको स्वयम्भू दहको पानीभित्र डुबिरहेकै बेला त्यहाँ महाज्योर्तिमय विराट रूप उत्पन्न भएको मानिन्छ । त्यसबखत त्यस दहका वरिपरि रहेको तामाङ झाँक्रीहरूले नै त्यस महाज्योतिलाई 'नेपा ल' अर्थात् 'आफैँ उत्पन्न भएको देउता' भनेको हुनुपर्दछ । बाहिरका मानिसहरूले समेत त्यस ज्योतिको दर्शन गर्न आएका बखत ती तामाङ जातिले आफ्नै भाषामा 'नेपा ल' भनेर चिनाएको हुनुपर्दछ किनकी कसैको छोराको नाम अन्तैका मानिसले आएर राखीदिन सम्भव हुँदैन । त्यसैगरि आफू बसेको स्थानको नाम पनि आफैँले नै राखने कुरा हो । यस स्थानको नाम यहीँ आवादी भएका तामाङ जातिले नै राखेका थिए भनेर ठोकुवा गर्न सकिन्छ । तत्कालिक तामाङ बोम्बो भाषामा रहेको 'नेपा ल'को ठ्याक्कै उल्था नै संस्कृत भाषाको "स्वयम्भू" हो । त्यसैले यस नेपाल खाल्डोलाई बस्तीयोग्य बनाउने वा आवादी गर्ने तिनै तामाङकै पूर्खाले आफ्नै भाषामा यस स्थानको नाम 'नेपा ल' भन्ने गरेकोमा पछि सोही 'नेपा ल'बाट 'नेपाल' रहन गएको देखिन्छ ।
समाप्त

- खोजराज गोले
email : khojrajgole@gmail.com
मो.नं. : ९८४१-३७०३५३
साभार : 'तामाङ एकता' सामयिक पत्रिका

http://tamangsagar.blogspot.com बाट साभार 

Monday, October 31, 2016

कम्युनिष्टले किन मनाउँदैन तिहार ? - आहुती

यसरी भयो तिहारको शुरुवात

यो कृषि युगको कुरा हो । करिब ३ हजार वर्ष अगाडि नै कृषि युगको प्रारम्भ भइसकेको थियो । त्यही बेलादेखि नै यो पर्व मनाउन शुरु भएको हो ।
हिन्दी भाषामा यो पर्वलाई त्यौहार भनिन्छ । तिहार भन्ने शब्द त्यहीँ त्यौहारको अपभ्रंस भएर बनेको हो । गंगा नदीले बनाएको मैदान जहाँ कृषि संस्कृति थियो, त्यहाँ वाली भित्र्याएपछि उत्सव मनाउने प्रचलन भएको देखिन्छ । यस्तो प्रचलन संसारका सबै किसान भएको ठाँउमा हुन्छ ।
aahuti
त्यहीँ क्रममा बाली भित्र्याएपछि बाली लगाउन वा त्यो जिविकालाइ अगाडि बढाउन सहयोग गर्ने सबै जनावरहरुलाई पनि त्यो उत्सवमा सामेल गर्ने गरिएको समाजशास्त्रीहरु बताउँछन् ।
छठपर्व पनि तराइमा वाली भित्र्याइसकेपछि मनाइने पर्व हो । त्यतिबेला बाली घरमा भित्र्याउँदा आजभोली जस्तो एक–दुई दिनमा सम्भव थिएन । आजको जस्तो प्रविधिको विकास भएको थिएन । ट्रयाक्टर वा आधुनिक प्रकारका औजारहरु केही पनि थिएनन् ।
त्यतिबेला सिंगै खलक अथवा वस्ती मिलेर पालैपालो बाली भित्र्याउने चलन थियो । यसो गर्दा महिनौ लाग्ने गर्दथ्यो ।
वाली भित्र्याउने पर्वहरु लामा–लामा नै छन् । दसैँ पनि त्यसकै एक रुप हो । दसैँ १५ दिन मनाउनु, तिहार पाँच देखि सात दिन मनाउनु यसैका प्रमाण हुन् ।
कृषिवालीमा हुने विभिन्न किरा, फट्यांग्राहरु नाश गरिदिने सर्भक्षीप्राणी हुनाले कागलाई पूजा गर्न थालिएको हो । त्यसैगरी कृषि या सम्पत्तिको सुरक्षामा महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह गर्ने हुनाले कुकुर पूजा गर्न थालिएको हो ।
त्यसैगरी जमिन जोत्नको लागि गोरु चाहिने हुनाले गोरुको पूजा गर्न थालियो । पहिले गोरु तिहारलाइ हल तिहार पनि भनिन्थ्यो । यद्यपि अहिले गोर्वद्यन तिहार भनिन्छ । गोरु तिहार या गोर्वधन पूजा पनि हल तिहारकै अपभ्रंस रुप हो । यी पछि जोडिएका शब्द हुन् ।
जव गंगा मैदानमा हिन्दु मतको जन्म भयो । सामाजिक रुपमा आम जनताले मनाउँदै आएको पर्वहरुलाइ पनि हिन्दुकरण गर्ने परिपाटीको शुरुवात भयो । त्यसै अनुरुप तिहारलाइ पनि दुइवटा मिथकसँग लगेर जोड्न थालिएको हो ।
तिहारसँग जोडिएका दुई मिथक
एउटा यमराज आफ्नो बहिनी यमुनाकहाँ आएको र धेरै खुशी भएर यो दिन सधैं सम्झिरहनुपर्छ भन्ने चलन अनुसार हरेक साल मनाउन लागिएको मिथक छ । अर्को चाहीँ वलीराजा पाताल भासिएको र वर्षको एकदिन पृथ्वीमा आउने अनुमति भए अनुसार उनी आँउदा उनको स्वागतमा तिहार मनाउन थालिएको मिथक हाम्रो समाजमा सुन्न सकिन्छ ।
देउसीको इतिहास
पहिले पहिले ‘देउसी रे’ लाई देउ श्रीराम अर्थात देव श्रीराम भन्ने गरिन्थ्यो । पछि राम हट्दै गएर देवश्री मात्र भएको हो । अझै पछि अप्रभंस भएर देउसी रे हुन पुग्यो ।
यो कथा रामायणसँग जोडिएको छ । रामले रावण बध गरेर आएपछि सबै जनता सडकमा निस्केर देव श्रीराम, देव श्रीराम भनेर जयजयकार गरेको र राती घरघरमा बत्ति बालेर दीपावलीका साथमा उत्सव मनाएको कुरासँग यो मिथक जोडिएको छ ।
भैली शब्द पनि अपभ्रंस भएको हो । वलिराजाको पक्षमा गीत गाउनेहरुले बलि बलि भन्दै जाँदा भैली भएको हो ।
गैरहिन्दुमाथि लादिएको औजार
उत्पत्ति जे जसरी भएको भएतापनि यो नेपालको एउटा विशेष पर्वको रुपमा राज्यले मान्यता दिएको पर्व हो । लामो समयसम्मको विदाको कारण यो पर्व गैरहिन्दुमाथि हिन्दुकरण लादिने प्रकृयाको एउटा औजार बनिरहेको छ ।
चाडपर्वहरुलाई कसरी लिने ?
नेपालमा अधिकांश चाडपर्वहरु धर्मसँग गाँसिएका छन् । केही निश्चित चाडपर्वहरु जस्तै महपूजा, घोडेजात्रा, ल्होसार जस्ता पर्वमात्र धर्मसँग जोडिएका छैनन् । यीनै केही पर्वहरु मात्र इतिहाससँग र केही सामान्य संस्कृतिसँग जोडिएका छन् । अधिकांश पर्वलाइ धार्मिक स्वरुप र मान्यता दिइसकेको हुनाले यसमा ५ वटा कुरा गर्न जरुरी छ ।
१. जो मान्छे नमनाइकन छाड्दैनन । चाडपर्व नमनाइरहन सक्दैनन् । ति मान्छेहरुले चाड मनाउँदा उपभोक्तावादी तरिकाले मनाउनु हुँदैन । चाहिने नचाहिने कुरामा खर्च गरेर, ऋण खोजेरै भएपनि चाड राम्रोसँग मान्नुपर्छ भन्नेहरुलाइ हामीले रोक्नसक्नुपर्छ । थोरै खर्च र थोरै लगानीमा किफायती तरिकाले चाड मनाउने संस्कारको विकास गर्न र गराउन पर्छ ।
२. चाड मनाउने, उत्सव मनाउने तर धार्मिक अनुष्ठान नगर्ने चलनको शुरुवात गर्न सकिन्छ । देउसी भैलो खेल्ने तर लक्ष्मीपूजा नगर्ने गर्न सकिन्छ आजको जमानामा लक्ष्मी पूजा गरेर पैसा आउनेवाला छैन । पैसा कमाउनको लागि मान्छेले संघर्ष गर्नुपर्छ । श्रम गर्नुपर्छ । यो कुरा त सबैले राम्रोसँग बुझेकै छन् । त्यसैले ति पर्वलाई धर्मवाट अलग गरेर विशुद्ध साँस्कृतिक रुपमा मात्र मनाउनुपर्छ ।
३. राज्यले तिहारमा ३ दिन विदा दिने गरेको छ । यो धेरै भयो । इदको मौका पारेर रमाजान महिना दिनसम्म चल्छ । त्यतिबेला जम्मा १ दिन विदा दिएर हुने, ल्होसारमा १ दिन दिएर हुने तर तिहारलाइ ३ दिन किन चाहियो ? दसैँमा हप्तौंसम्म विदा किन चाहियो ? यो त सरासर अरु धर्म मान्नेहरु माथिको दमन भयो । राज्य स्वयं दमनको साधन हुनुभएन ।
४.भौतिकवादीहरुले यसलाई नमनाउने साहस गर्नुपर्यो ।
५.भौतिकवादी र लोकतन्त्रवादीहरुले हाम्रै कालखण्डमा अर्थात हाम्रै जीवनकालमा घटेका घटनाक्रमहरुको स्मरणमा ति दिनहरुलाइ साँस्कृतिक पर्वको रुप दिन थाल्नुपर्छ ।
गणतन्त्र दिवस, मइ दिवस, ८ मार्च अर्थात अन्तराष्ट्रिय श्रमिक महिला दिवस जस्ता पर्वलाइ हामी बिशुद्ध राजनीतिक तरिकाले मनाइरहेका छौँ । जुलुश, भेला, वैठक, अन्तक्र्रिया वा सभाहरु गरेर मनाउने गरेका छौं । यी दिनलाइ अब साँस्कृतिक रुप दिन आवश्यक छ ।
पर्वहरुलाइ साँस्कृतिक रुप दिन खानपिन र मनोरञ्जनसँग जोड्नुपर्दछ । त्यसैगरी भावना साटासाटको रुप दिनुपर्दछ । बिहे गरेर गएका चेली वेटीहरुलाइ आठ मार्चको दिन माइतीमा बोलाउने, मिठो मसिनो खाने र भावना साटासाट गर्ने गर्ने हो भने अर्को वर्ष स्वतः त्यो चेलीलाइ आज आठ मार्च हो । मलाई माइतीले बोलाउँछन् भन्ने पर्छ । यसरी विस्तारै पर्व स्थापित हुँदै जान्छ ।
चिन्दै नचिनेको, गरेको हो कि होइन भन्ने विश्वास नभैसकेको लक्ष्मीको गुणगान गाउनु भन्दा अहिले हाम्रै जीवनकालमा लडाकु महिलाले गरेका साहसिक यात्रा र काम गरेका दिनलाइ सम्झँदा खेरी नै हामीलाई आनन्द आँउछ । कथामा लेखिएका रामसीताले गरेको विहे सम्झेर एक्साइटेड हुनुभन्दा आफ्नै हनिमून सम्झेर रोमाञ्चित हुन्छौं ।
त्यसकारण भौतिकवादीहरुले विकल्पका साथ नयाँ साँस्कृतिक पर्वलाई स्थापित गर्न लाग्ने हो भने समाज आफै उन्नत र वैज्ञानिक सभ्यतातिर जान संभव छ ।
राज्य नै उपभोक्तावादको शिकार
यस्ता चाडपर्वको हकमा राज्य पुरै व्यापारीको हकमा उभिएको छ । व्यापारीहरुले एक महिना अगाडिदेखि नै आफ्नो मालको प्रचार गर्न थाल्छन् । जस्तो, कोकले दाइ बोतल, भाइ बोतल बनाएर प्रचार गरिरहेको छ ।
जनताको दिमागमा एक महिना अगाडिदेखि नै दसैँ वा तिहारलाइ व्यापक बनाउने सबैभन्दा पहिले व्यापारीले नै हो । राज्यले त्यहीँ वेलामा कर्मचारीलाइ बढी पैसा दिन्छ । आफै खशीबोका र च्यांग्रा बोकेर चीनतिर जान्छ । राज्यले पनि जनतालाइ उपभोक्तावादी बन्न सघाइरहेको छ ।
राज्यले जनतालाइ गलत आदतमा जानबाट बचाउनुपर्छ । त्यहीँ वेलामा सुपथ मुल्यको पसल खोलिदिनु या जनतालाई यति उति छुट दिन्छु भन्नु चरम उपभोक्तावाद हो ।
हुनेखानेलाइ त जति पैसा खर्च गरेपनि हुन्छ तर गरिवले कहाँबाट ल्याउने बढी पैसा खर्च गर्नको लागि । आम जनताको लागि चाडवाड पनि पिडा बोकेर आउने गरेको छ । त्यसैले राज्यले व्यापारीसँगै हो मा हो मिलाएर सस्तो उपभोक्तावादलाई बढावा दिनुहुँदैन ।
प्रस्तुतीः आस्था केसी
http://www.ratopati.com बाट साभार 

Friday, October 28, 2016

किरण कमरेड ! म तपाईंको उत्तर पर्खिरहेको छु - डा. ऋषिराज बराल

यो लेख लेखेको पनि २ वर्ष हुन लागेछ । समयले यो अभिव्यक्ति सही थियो भन्ने प्रमाणित गरेको छ  । ज्ञवाली एण्ड कम्पनी मात्र होइन, वरिष्ठ सौन्दर्यचिन्तक  चैतन्य अर्थात् कमरेड किरण पनि यसबाट भाग्न पाउनु हुन्न, सक्नु हुन्न, सबै कुरा बाहिर ल्याउनुपर्छ । यथार्थ बाहिर नआए मोर्चा कस्नुको विकल्प छैन। सत्यको सामना गर्न नसकेर ऋषिराज बरालहरूलाई  कारबाही गरे पनि समयले छोड्ने छैन, इतिहासले यस मामलामा कमरेड किरणलाई पनि छोड्ने छैन । किरण  कमरेडले सत्यको सामना गर्नैपर्ने हुन्छ । उत्तर दिनै पर्ने हुन्छ ।
rishi-raj-baral‘जनआस्था’ साप्ताहिकको फागुन ५ को अङ्कमा प्रकाशित ‘क्रान्ति, केको क्रान्ति, कस्तो क्रान्ति ! शीर्षकमा प्रकाशित ‘पाठकपत्र’ सित सम्बन्धित भएर उठेका टिप्पणीहरूका सन्दर्भमा मैले केही कुरा प्रस्ट पार्नु आवश्यक ठानेको छु । खासगरेर  मेरो पुस्तक सत्ता र संस्कृति मा समाविष्ट ‘जनयुद्ध, सांस्कृतिक आन्दोलन र जनसांस्कृतिक सङ्घ’ तथा ‘सांस्कृतिक सेनासम्बन्धी माओवादी दृष्टिकोण’ मा यसबारे प्रस्ट पारेको हुँ तापनि अहिले आएर विषयसन्दर्भहरू नयाँ किसिमले उठेकाले यसबारे पुनः केही प्रस्ट पार्नु आवश्यक ठानेको छु ।
‘पाठकपत्र’ मा ‘अखिल नेपाल जनसांस्कृतिक महासङ्घ’ को विगतको सम्मेलनदेखिका कुराहरूका साथै त्यसमा ‘इच्छुक सांस्कृतिक प्रतिष्ठान’सित सम्बद्ध मुद्दाहरू पनि उठाइएका छन् । यसो हेर्दा यी फरकफरक विषय भए पनि यी एकअर्कासित अन्तर्सम्बन्न्धित छन् । यी सबैको लामो व्याख्या यहाँ सम्भव नभए पनि यी सबै समस्याको  जडचाहिँ ‘अखिल नेपाल जनसांस्कृतिक सङ्घ’ को तेस्रो राष्ट्रिय सम्मेलन हो भन्ने कुरा म प्रस्ट पार्न चाहन्छु ।  यो सबै सन्दर्भको प्रस्टताका लागि युद्धकालमा रोल्पामा पढ्न प्रतिबन्ध लगाइएको मेरो पुस्तक फेरिे लाल भन्ज्याङमा उभिएर र कथा ‘‘प्रति+आगमन . प्रत्यागमन’ को सन्दर्भलाई पनि यहाँ ल्याउनुपर्ने हुन्छ ।
२०६३ असोजमा  तय गरिएको ‘अखिल नेपाल जनसांस्कृतिक सङ्घ’ को तेस्रो राष्ट्रिय सम्मेलनमा लागि केन्द्रीय संयोजकका नाताले मैले प्रतिवेदन तयार पारेँ । यसलाई लिएर सांस्कृतिक विभाग र आयोजक समितिको दुईतीन  बैठक बस्यो । प्रचण्ड सांस्कृतिक विभागका इन्चार्ज थिए  ।त्यतिबेर प्रचण्ड–बाबुराम घुमन्तु सिविरमा हुन्थे । भक्तपुर गेस्ट हाउसमा बसेको मिटिङमा मैले त्यतिबेला चर्चामा आएका  तल उल्लेखित तीनवटा मुद्दामा बहसछलफल चलाएँ । 
 १.  जनार्दन शर्मा ‘प्रभाकर’ को उटपट्याङ चिन्तनको पछि लागेर ईश्वरचन्द्र ज्ञवाली र खासगरेर सेमभेकका केही साथीहरू जनमुक्ति सेनाका झैँ सांस्कृतिक क्षेत्रमा पनि कम्पनी, बटालियन,  ब्रिगेड र डिभिजन बनाउने हठमा थिए । सांस्कृतिक सेना भनेको विचारको सेना हो, यो क्रान्तिकारी विचारबाट सङ्गठित हुन्छ, तर ब्रिगेड आदि हुँदैन,  खास अभियानमा सैन्य फर्मेसनमा लामबद्ध हुन सकिए पनि जनसेनाका झैँ सांस्कृतिक पल्टनको स्थायी बटालियन र ब्रिगेड हुँदैन भन्ने मेरो भनाइ थियो र माओले पनि सांस्कृतिक सेना र जनमुक्ति सेनाको संरचना र कार्य एउटै हँदैन भनेको सन्दर्भ हाम्रा सामु थियो । तर ब्रिगेड र डिभिजन बनाउँदा मात्र क्रान्तिकारी होइन्छ भन्ने र माओभन्दा क्रान्तिकारी देखिने चस्का लागेका  केहीहरू यसमा सहमत भएनन् । युद्धकालमा प्रचण्डले पनि यसैमा ताली बजाए । यसबारे मैले निरन्तर बहस चलाएँ र  सम्मेलनका बेला  पनि चलाएँ ।
२. कुनै पनि कृतिको सौन्दर्यशास्त्रीय पक्ष हुन्छ, यसलाई सङ्ख्या अथवा प्राविधिक किसिमले डण्डा  लगाएर ठीकबेठीक भनेर खारेज गर्न मिल्दैन भन्ने मार्क्सवादी मान्यता हो । फेरिे लाल भन्ज्याङमा उभिएर र कथा ‘प्रति+आगमन= प्रत्यागमन’ का सन्दर्भमा उठेका विवादलाई मैले सौन्दर्यशास्त्रीय आधारमा बहस चलाऔँ,  अंश होइन समग्रमा हेरौँ, भनेर तर्क गरेँ । यसबारेमा पार्टी केन्द्रको सिक्लेस बैठकमा एक किसिमको “समझदारी” पनि बनाइयो र यो समझदारीलाई सांस्कृतिक विभागको बैठकले समेत निर्णय गरी व्यवस्थित गरियो । तर यो मुद्दालाई सम्मेलनको सेरोफेरोमा प्रायोजित र निर्देशित रूपमा उछाल्ने काम गरियो ।
३.  केही साथीहरू ‘अखिल नेपाल जनसांस्कृतिक सङ्घ’ लाई महासङ्घमा लैजाने हठमा लागे । मैले भखैरै ‘शान्तिप्रक्रिया’ आएको र  स्थिति कसरी अगाडि बढ्छ प्रस्ट नभएकाले महासङ्घलाई अवधारणाका रूपमा स्वीकार गरौँ, आवश्यकता अनुसार सङ्घभित्र विभाग बनाऔँ, महासङ्घमा जान हतार गर्दा वैचारिक तथा साङ्गठनिक अस्तव्यस्तता र  अराजकता आउँनसक्छ भन्ने मेरो धारणा थियो ।
फेरिे लाल भन्ज्याङमा उभिएर र कथा ‘प्रति+आगमन=प्रत्यागमन’ का बारेमा सिक्लेस बैठकमा निर्णय भइसकेकाले सांस्कृतिक विभागको बैठकमा यो विषय त्यति बहसको विषय भएन ।  मूल बहस सांस्कृतिक  क्षेत्रमा बटालियन, ब्रिगेड र डिभिजन बनाउने कुरामै रह्यो । प्रचण्ड–बाबुरामले पनि यस विषयमा गोलमटोल कुरा मात्र गरे । माइला लामा र ज्ञवाली ब्रिगेड र डिभिजनको रमाइलोमा थिए ।  त्यसपछि सबै कुरा सम्मेलनमा लगेर हल गर्ने भनियो । तर सम्मेलनमा वैचारिक बहसको सट्टा होहल्ला र गुन्डागर्दीले प्रभुत्व कायम गर्यो । खासगरेर आफूलाई आधारइलाकाका भन्न रुचाउने केही हुल्लडबाजहरूले ममाथि भौतिक रूपमै आक्रमण गरे ।  अब सांस्कृतिक सेनाले ठोक्छ भन्दै कुर्सी भाँचेर ममाथि आक्रमण गर्नथाले । भित्री निर्देशन आधारइलाकाका बडे कमरेडहरूको थियो भन्नेमा म प्रस्ट थिएँ ।  त्यस कार्यक्रममा प्रमुख अतिथि भएर आएका देव गुरुङ्ले पनि आगोमा घिउ थप्ने काम गरे । कस्ताकस्ता मान्छेहरूलाई सांस्कृतिक मोर्चामा ल्याएइछ भन्ने पनि लाग्यो । यस किसिमको भद्रगोलमा सांस्कृतिक मोर्चामा रहनुको औचित्य रहेन । मैले पहिले नै निर्णय गरेको थिएँ  ।
सांस्कृतिक सम्मेलनमा देखिएको गुन्डागर्दीको यो  समाचारलाई अन्य पत्रिकाका साथै ‘जनआस्था’ले पनि विशेष रुचिका साथ छापेको थियो ।  यो ‘सम्मेलन’ पछि  मैले तयार पारेको  र पार्टीको सांस्कृतिक विभागले पारित गरेको प्रतिवेदनमा पूरै परिवर्तन गरेर उल्टोपाल्टो पारिएछ । सबैभन्दा आपत्तिजनक कुरा इतिहासको तोडमरोड गरेर सारै विकृत ढङ्गले प्रस्तुत गरिएछ । यो जनसांस्कृतिक सङ्घको प्रतिवेदन नभएर विकृत दस्ताबेजमा परिणत भएको थियो । २०६० सालमा  सांस्कृतिक मोर्चाको केन्द्रमा ल्याइएका ईश्वरचन्द्र ज्ञवालीले नेकपा (एकताकेन्द्र)  बनेपछि तीनवटा सांस्कृतिक मोर्चाको एकताद्वारा बनेको संयोजन समिति २०४७ मा आफू पनि रहेको भनेर प्रतिवेदनमा लेखेछन् र त्यतिबेला केन्द्रमा  रहेका अन्य साथीहरूको नाम हटाएछन् । मैले यसलाई घोर आपत्तिजनक कार्य ठानेँ । कसैको इतिहास नै गायब पार्नु र आफ्नो नाम थप्नु घोर अनैतिक काम थियो ।
यो सन्दर्भपछि  सांस्कृतिक मोर्चासित मेरा ५ ओटा विषयमा मतभेद रहेको कुरा प्रकाशमा ल्याएँ । पहिलेका तीनवटा —सांस्कृतिक सेनासम्बन्धी, कृतिलाई मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्यका आधारमा समीक्षा गरिनुपर्ने, तत्काल महासंघ नबनाउने भन्नेमा अरू दुईवटा थपिएका थिएः १. प्रतिवेदनमा ईश्वरचन्द्र ज्ञवालीले गरेको इतिहासको विकृतीकरण सच्याएर उनीमाथि कारबाही गर्नुपर्ने र २.सम्मेलनमा भएको गुण्डागर्दी गैरमार्क्सवादी कार्य थियो भन्ने निर्णय गर्दै त्यसो गर्नेहरूमाथि कारबाही गर्नुपर्ने ।
उहाँकै इन्चार्जसिपमा विकृतिलाई अनुमोदन गरियो । विकृतिमाथि विकृति थपियो । सांस्कृतिक आन्दोलनका समस्या कसरी हल गर्ने र कसरी अघि बढ्ने भन्ने कुरामा  किरण कमरेडसित अलिकति पनि विचारविमर्श हुनसकेन । यसमा उहाँको रुचि  नै रहेको पाइँन । उहाँ प्रभाववाद र क्षेत्रीयतावादमा फस्नु भयो । एक हिसाबले विकृतिलाई वहांले अनुमोदन गर्नुभयो  ।
समयले मैले उठाएका कुराहरू सही साबित भएका छन् । अहिले वैचारिक तथा साङ्गठनिक दुवै दृष्टिले सांस्कृतिक आन्दोलन लथालिङ्ग र भताभुङ्ग भएको छ । त्यतिबेला गुण्डागर्दी गर्नेहरू कतिपय आन्दोलनबाट पलायन भएका छन् र  कतिपय सिसिएम र पिबिएम भएर विभिन्न ‘माओवादी’मा बाँडिएका छन् ।
दस बर्स हुनलागेछ ।  त्यसपछि एउटै पार्टी र जनयुद्धको कालको केन्द्रीय संयोजक भएर पनि अहिलेसम्म जनसांस्कृतिक सङ्घ (हाल महासङ्घ) को कुनै पनि कार्यक्रममा म सहभागी भएको छैन र माथि मैले अगाडि सारेका मुद्दाहरू समाधान नहोउन्जेलसम्म  सहभागी हुने स्थिति पनि छैन ।  त्यतिबेला ‘शान्तिप्रक्रिया’ को रमझममा प्रचण्ड–बाबुरामका लागि सांस्कृतिक मोर्चाका समस्या त्यति महत्वका भएनन् । तर किरण कमरेड जेलबाट छुटेर आएपछि यस सन्दर्भमा उहाँबाट जेजस्तो भूमिकाको आशा र विश्वास गरेको थिएँ, त्यो हुन सकेन । उहाँकै इन्चार्जसिपमा विकृतिलाई अनुमोदन गरियो । विकृतिमाथि विकृति थपियो । सांस्कृतिक आन्दोलनका समस्या कसरी हल गर्ने र कसरी अघि बढ्ने भन्ने कुरामा  किरण कमरेडसित अलिकति पनि विचारविमर्श हुनसकेन । यसमा उहाँको रुचि  नै रहेको पाइँन । उहाँ प्रभाववाद र क्षेत्रीयतावादमा फस्नु भयो । एक हिसाबले विकृतिलाई वहांले अनुमोदन गर्नुभयो  । बरु त्यतिबेला मैले उठाएका प्रश्नहरूमा किरणभन्दा प्रचण्ड केही सकारात्मक, सहयोगात्मक  र खुलस्त देखापरेको अनुभूत मलाई भएको थियो ।  एउटै पार्टीमा छँदा चीन जानुभन्दा अघि सायद २०६६ असोजमा प्रचण्ड–किरणले नयाँ बजार निवासमा मलाई बोलाएर छलफल चलाएका थिए । त्यहाँ पनि मैले उठाएका मुद्दाहरूको सन्दर्भमा  किरण कमरेडभन्दा प्रचण्डमै मैले बढी खुलस्तता अनुभूत गरेको थिएँ ।
नेताहरूका घरका तला थपिँदै जाने र तलका सांस्कृतिक कलाकर्मीहरू बेघरबार र भोकभोकै रहने स्थितिले ल्याउने परिणाम दुखद र भयावह पनि हुनसक्छ । भ्रष्टाचारका प्रमाणहरू सामुन्नेमा हुँदा पनि थाहा नपाएझैँ गर्नु भनेको सारतः त्यसको हिस्सा बन्नु हो । यस किसिमको निस्पृहताले दुर्घटना निम्त्याउँछ ।
अब यताको १० वर्षको लेखाजोखा गर्नु आवश्यक छ । यी १० वर्षमा सांस्कृतिक आन्दोलनका समस्या समाधान गर्न, विकृतिहरू हटाउन र एकताबद्धका साथ सांस्कृतिक आन्दोलनलाई  अघि बढाउन फ्याक्सन इचार्ज बनेकाहरूको भूमिका केकस्तो रह्यो त्यसको पनि समीक्षा हुनु जरुरी छ । ज्ञवालीद्वारा इतिहासलाई विकृत पारिएको र लाल सलाम फिल्मलगायतका घटनाहरूका भएका भ्रष्टाचारहरूलाई लिएर ‘महासङ्घ’ मा प्रश्न उठेपछि  पार्टीमा निवेदन दिएपछि छानबिन आयोग बनेको कुरा चर्चामा आए पनि आफू त्यसमा नरहेकाले ज्ञवालीले गरेको भनिएको भ्रष्टाचारबारे विस्तृत रूपमा केही भन्न सक्ने स्थिति छैन । त्यहाँ छानबिन  पनि हुँदैन  र भए पनि प्रतिवेदन  बाहिर आउँदैन भन्ने निवेदनकर्ताहरूको  भनाइ छ  ।
जहाँसम्म ‘इच्छुक प्रतिष्ठान’को कुरा छ ।  प्रतिष्ठान बनाउने निर्णय पार्टीको फुन्टिवाङ बैठकपछि रोल्पाको इरिवाङमा बसेको सांस्कृतिक मोर्चाको बैठकले गरेको थियो । भारतीय जेलबाट छुटेर आएपछि ठमेलको होटलस्थित प्रचण्ड क्याम्पमा कमरेड किरणको संयोजकत्वमा सुरुमा म र पाख्रिनको समिति बन्यो र पछि अरू नाम थपिँदै गएका हुन् । ज्ञवाली यहाँ पनि  दुई वर्षपछि मात्र जोडिएका हुन् ।
नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलनमा कमरेड किरणको छवि एकजना इमान्दार र आदर्शप्रति प्रतिवद्ध नेताका रूपमा स्थापित छ, तर कार्यकर्तालाई सही किसिमले चिन्ने, बुझ्ने र संरक्षण गर्ने कुरामा वहाँमा धेरै समस्या देखिए । फलस्वरूप पछिल्ला दिनमा वहांको क्षमतामाथि नै प्रश्न उठ्न थालेको छ ।
अहिले ‘इच्छुक प्रतिष्ठान’मा पनि भ्रष्टाचारका कुरा आएका छन् । मलाई थाहा छ यससित पनि थुप्रै  गुप्त अगुप्त पक्ष जोडिएछन् । पहिले टेन्डरद्वारा निर्णय गरेको नक्सा पुनस् टेन्डर नगरी फेर्नु र  सानो  नक्सा बनाएर र ठूलो भवनको रकम निर्णय गर्नु, ज्ञवालीले आफ्नो जग्गा महँगोमा प्रतिष्ठानलाई बेच्नु, भाउ बढेको बेला त्यही जग्गा फेरि आफैँले पहिलेभन्दा सस्तोमा किन्नु  र त्यो पैसा पनि प्रतिष्ठानको खातामा नराखी आफ्नै खातामा राख्नु जस्ता प्रश्नहरू अहिले उठेका छन् । यसो हो भने यो महाअपराध हो । पछिल्ला दिनमा प्रतिष्ठानको भवन ठेकेदार र रेखदेख गर्ने इन्जिनियरसित रिसोर्टहरूमा ज्ञवाली लगायतको टोलीले रमाइलो गरेको समाचार पनि आएका छन् ।  समयसन्दर्भमा यो सबै  बाहिर आउँनेछ  नै ।
वास्तवमा यो इच्छुक  प्रतिष्ठानमा र ऋषिराज बरालको मात्र कुरा होइन, प्रश्न सिङ्गो राजनीतिक तथा सांस्कृतिक आन्दोलनलाई कसरी अघि बढाउने भन्ने कुरा हो र  यसमा किरण कमरेडको न  त कुनै योजना नै रह्यो, न त राम्रो सल्लाह सुझाव सुन्ने मन नै भयो, उहाँमा इच्छा शक्तिको अभाव देखियो । उहाँमा एउटा सानो कोटरीमा रमाउने र बहस र विवाददेखि अतंकित हुने प्रवृति ।
कृष्ण सेन इच्छुकसित जोडिएको संवेदनशील विषय भएकाले समग्र पार्टी यसमा गम्भीर हुनु आवश्यक छ । सांस्कृतिक मोर्चा र आन्दोलनका समस्या हल गर्न इच्छाशक्ति नदेखाउनु, मोर्चा  र प्रतिष्ठानमा भएका अनियमितता र भ्रष्टाचारका सन्दर्भप्रति गम्भीर नहुनुले गजुरमा बसेकाहरू पनि  प्रश्नभन्दा बाहिर हुनसक्तैनन् । किरण कमरेडको मौनता  रहस्यमय छ  । नेताहरूका घरका तला थपिँदै जाने र तलका सांस्कृतिक कलाकर्मीहरू बेघरबार र भोकभोकै रहने स्थितिले ल्याउने परिणाम दुखद र भयावह पनि हुनसक्छ । भ्रष्टाचारका प्रमाणहरू सामुन्नेमा हुँदा पनि थाहा नपाएझैँ गर्नु भनेको सारतः त्यसको हिस्सा बन्नु हो । यस किसिमको निस्पृहताले दुर्घटना निम्त्याउँछ । नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलनमा कमरेड किरणको छवि एकजना इमान्दार र आदर्शप्रति प्रतिवद्ध नेताका रूपमा स्थापित छ, तर कार्यकर्तालाई सही किसिमले चिन्ने, बुझ्ने र संरक्षण गर्ने कुरामा वहाँमा धेरै समस्या देखिए । फलस्वरूप पछिल्ला दिनमा वहांको क्षमतामाथि नै प्रश्न उठ्न थालेको छ ।
यस यथार्थलाई बाल्कोनीमा बसेका सबैले बुझ्नु आवश्यक छ । सबैभन्दा बढी किरण कमरेडले बुझ्नु आवश्यक छ । विकृतिको थुप्रोमा रमाएर सुन्दरको कुरा गर्नुको अर्थ छैन । वास्तवमा यो इच्छुक  प्रतिष्ठानमा र ऋषिराज बरालको मात्र कुरा होइन, प्रश्न सिङ्गो राजनीतिक तथा सांस्कृतिक आन्दोलनलाई कसरी अघि बढाउने भन्ने कुरा हो र  यसमा किरण कमरेडको न  त कुनै योजना नै रह्यो, न त राम्रो सल्लाह सुझाव सुन्ने मन नै भयो, उहाँमा इच्छा शक्तिको अभाव देखियो । उहाँमा एउटा सानो कोटरीमा रमाउने र बहस र विवाददेखि अतंकित हुने प्रवृति देखियो ।
http://halkaro.com बाट साभार 

Tuesday, October 25, 2016

नेपाली समाज अब सामन्तवादी होइन - आहुती


अहिले नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलनमा कार्यदिशाका विषयमा जवरजस्त वहश चलिरहेको छ । नेपालको क्रान्ति अब पनि नयाँ जनवादी हो कि समाजवादी हो ? यसको छिनोफानो नगरिकन कम्युनिष्ट आन्दोलन अगाडि बढ्दैन, त्यसैगरी दलित आन्दोलन पनि अब स्पष्ट रूपमा अगाडि जाँदैन।
कार्यदिशाबारेको यो बहसको मुख्य सरोकार भनेको नेपाली समाज अहिले पनि मूल रूपमा सामन्तवादी वा अर्धसामन्ती नै छ कि पूँजीवादी भैसक्यो भन्ने नै हो। नेपाली समाज मूल रूपमा सामन्तवादी वा अर्धसामन्ती छ भने अबको क्रान्ति नयाँ जनवादी नै हुनुपर्ने हुन्छ भने समाज मूल रूपमा पूँजीवादी भैसकेको हो भने अबको क्रान्ति स्वतः समाजवादी हुनपुग्दछ।
त्यसैले नेपाली समाजको चरित्र कस्तो हो भन्ने विश्लेषणले निर्णायक महत्व राख्दछ। नेपाली समाजको आजको चरित्रलाई बुझ्न सामन्तवादी र पुँजवादी समाजको आधारभूत चरित्रबारे एकपल्ट घोत्लिनु आवस्यक छ। सामन्तवाद भनेको के हो ? यहाँवाट चर्चा सुरु गरौं।
कुनै पनि राजनीतिक व्यवस्थाको समाज वैज्ञानिक चरणको ३ वटा खुट्टा हुन्छन्, चाहे त्यो दास-मालिक व्यवस्था होस्, सामन्तवादी होस् या पूँजीवादी व्यवस्था । ती तीन खुट्टाहरूमा एउटा अर्थतन्त्र हो, अर्को राजनीति व्यवस्था र तेस्रो सांस्कृतिक अवस्था हो।
यो तीनवटा कुरा मिलेर कुनै पनि वाद स्तरको समाज व्यवस्था बन्छ । सामन्तवादी अर्थव्यवस्था भनेको के हो रु पहिलो कुरा, उत्पादनका साधनहरु, मूलत त्यतिवेला जमिन हुन्छ , त्यसको मुख्य हिस्सा, यसरी बुझौं कि पचास प्रतिसतभन्दा बढी जमिन सामान्तहरुको हातमा हुन्छ, खेत नजोत्नेहरुको हातमा हुन्छ र खेत जोत्नेहरु बहुसख्यक मोही किसानहरु हुन्छन् वा भूदास किसान हुन्छन् ।
सामन्तवादको आधारभूत जग नभत्केकोले क्रान्ति चाहिँ पूँजीवादी नै गर्न नयाँ जनवादी अर्थात् कम्युनिस्टको नेतृत्वमा पूँजीवादी क्रान्ति गर्ने रणनीति अघि सारेको कुरा इतिहाससिद्द छ।
दोस्रो कुरा, सामन्तवादको आर्थिक व्यवस्थाको आधारभुत मुख्य अर्को कुरा के हो भने, त्यो समाजको पचास प्रतिशत भन्दा बढी श्रमशक्तिको क्रय विक्रय चाँही ज्याला प्रणालीमा हुँदैन बरू त्यो बाली प्रणालीमा हुन्छ । जे कामको ज्याला पनि नगदमा होइन बालीमैं तिर्ने अवस्था हुन्छ। सामन्तवादको आर्थिक ढाँचाको मूल चरित्र यही हो।
माओ त्से तुङले चीनलाई अर्धसामन्ती समाज अर्थात् आधा सामन्ती समाजको रूपमा किटान गरे। माओको अर्धसामन्ती व्याख्याभन्दा पहिले राजनीतिकशास्त्रमा अर्धसामन्ती भन्ने जस्तो कुनै समाजको व्याख्या नै थिएन, कि सामन्तवाद थियो की पुँजीवाद थियो। माओले उद्योगदन्दा, व्यापार जस्ता पूँजीवादी व्यवस्थाका अङ्गहरू पनि सुरू भई त्यसको प्रभाव पनि समाजमा पर्न थालिसकेको तर सामन्तवादको आधारभूत जग पनि नभत्केको संक्रमणकालीन अवस्थालाई अर्धसामन्ती अवस्था मानेको बुझिन्छ।
सामन्तवादको आधारभूत जग नभत्केकोले क्रान्ति चाहिँ पूँजीवादी नै गर्न नयाँ जनवादी अर्थात् कम्युनिस्टको नेतृत्वमा पूँजीवादी क्रान्ति गर्ने रणनीति अघि सारेको कुरा इतिहाससिद्द छ। त्यही माओको विश्लेषण नेपालमा पुष्पलालले रोप्दै नेपालमा पनि जुट मिललगायत उधोग र व्यापार सुरू भैसकेको तर सामन्तवादी आधार पनि नभत्केको वि स २००६ को अवस्थामा नेपाललाई अर्धसामन्ती समाज पनि चित्रण गरे जुन सही नै थियो। जुन समाज २००६ सालमैं सामन्तवादी होइन, आधा सामन्ती थियो भने के ६५ वर्षपछि पनि जस्ताको त्यस्तै रहेको छ त रु कदापि छैन।
बितेको ६५ वर्षमा २०१६ सालको ‘क’ वर्गको विर्ता उन्मूलन, २०२१ सालको सामन्तहरूलाई जग्गा लुकाउन प्रेरित गर्ने कथित भूमिसुधार, भूमि ऐनका पटक पटकका संशोधन, उत्पादकत्व घट्नेक्रमबाट सामन्तहरूमा जन्मेको निरासा, जनसंख्याको वृद्धिले गरेको खण्डिकरण, लगातारको सामन्तवादविरोधी राजनीतिक आन्दोलन, जमीनबाट नेपालमा क्रमशस् हैकमसाली प्रगतिको संभावना घट्दै जानु र त्यसको सट्टा दलाल तथा नौकरशाही पुँजीको दवदवा बढ्दै जाने सिलसिलाले नेपालको जमीनसँग जोडिएको सामन्तवादी सम्बन्ध ध्वस्त हुन पुगेको छ।
अहिले नेपालमा आर्थिक सम्वन्ध कस्तो छ त भनेर हेर्‍यो भने, नेपालमा दर्ता भएका र दर्ता नभएका मोही किसानहरुको करिव ३ लाख परिवार छन् जबकि नेपालमा ५५ लाखभन्दा बढी परिवार छन् । ५५ लाखभन्दा बढी परिवारमध्ये जम्मा ३ लाख परिवार मात्र मोही भएको देश सामन्तवादको अवशेष भएको त मान्नुपर्छ तर त्यो मूल रूपमा सामन्तवादी वा अर्धसामन्तीअर्थ व्यवस्था भएको देश हुन्छ कि हुँदैन रु अर्को कुरा अहिले वाली प्रथा कहाँ कहाँ वाँकी छ भन्यो भने,करिब ३५ प्रतिशतको हाराहारीमा दलितबीच वाँकी छ ।
दलितमध्ये पनि ६५ प्रतिशतभन्दा बढी ज्याला प्रणालीमा गइसके जुन नगदको ज्याला प्रणाली पुँजीवाद हो सामन्तवाद होइन। यसरी जुन समाजमा श्रमशक्तिको क्रय विक्रयमा १० प्रतिशत पनि मानिसहरु बालिप्रथामा छैनन् । त्यो समाजको अर्थतन्त्र कसरी सामन्तवादी हुन्छ । कि त सामान्तवादको परिभाषा नै हामीले उल्ट्याइदिनुपर्यो हैन भने नेपालको अर्थतन्त्र मुल रुपमा सामान्तवादी छ भन्न अब मिल्दैन । त्यसैले आजको नेपालको अर्थतन्त्र पूँजीवादी नै हो भन्ने प्रष्ट छ। यो पुँजीवाद राष्ट्रीय र प्रगतिशील छैन, सत्य कुरा हो । यो दलाल पुँजीवाद हो। तर जस्तो भए नि पुँजीवाद हो, सामन्तवादचाहिँ होइन। राजनीतिक व्यवस्थामा सामन्तवाद भनेको के हो ? राजनीतिक व्यवस्थामा सामन्तवाद भनेको राज्यका मुलभुत राजनीतिक अंगहरुमा जनताले आफ्ना प्रतिनिधी चुनेर पठाउन नपाउने व्यवस्थालाई सामन्तवाद भनिन्छ ।
बितेको ६५ वर्षमा २०१६ सालको ‘क’ वर्गको विर्ता उन्मूलन, २०२१ सालको सामन्तहरूलाई जग्गा लुकाउन प्रेरित गर्ने कथित भूमिसुधार, भूमि ऐनका पटक पटकका संशोधन, उत्पादकत्व घट्नेक्रमबाट सामन्तहरूमा जन्मेको निरासा, जनसंख्याको वृद्धिले गरेको खण्डिकरण, लगातारको सामन्तवादविरोधी राजनीतिक आन्दोलन, जमीनबाट नेपालमा क्रमशस् हैकमसाली प्रगतिको संभावना घट्दै जानु र त्यसको सट्टा दलाल तथा नौकरशाही पुँजीको दवदवा बढ्दै जाने सिलसिलाले नेपालको जमीनसँग जोडिएको सामन्तवादी सम्बन्ध ध्वस्त हुन पुगेको छ।
राजपरिवारमा जन्मेपछि स्वतः राजा हुने , चुन्न नपाइने नपर्ने। गाउँमा मुखिया तोकिदिएपछि हुने, चुन्न नपाइने । जन्मने वित्तिकै वा शाषनले व्वयस्था गरे अनुसार नै पोष्टहरुमा पुग्ने मुल परिपाटी जहाँ हुन्छ त्यसलाई नै सामन्तवादी राजनीतिक प्रणाली भनिन्छ । अहिले नेपालमा कुन त्यस्तो पद छ जहाँ नियमपुर्वक वा नचुनिकन स्थापित गरिन्छ रु ती नियम र निर्वाचन जतिसुकै देखावटी वा औपचारिक किन नहुन् तर ती सामन्तवादीचाहिँ कदापि होइनन्। तथ्यमा आधारित कुरा गर्नुपर्‍यो, त्यत्तिकै भनेर त भएन । हिजोको सुव्वालाई, सुव्वा मान्नुपर्दैन ।
राईलाई, राई मान्नुपर्दैन । मिजारलाई मान्नुपर्दैन । अव झुक्किएर भनौं वा जे भनौं गुरूङ पनि सेनापति भइसक्यो । जे जे गरेर भए नि नियमअनुसार नै भएको हो । पद्धतिमै भएको हो, सैनिक ऐन अनुसार नै भएको हो । राष्ट्रपति पनि, अरु जो जो पनि चुनिएर भएको हो । औपचारिक लोकतन्त्र अनुसार भएका हुन् ।औपचारिक पुँजीवादी लोकतन्त्रअन्तर्गत भाका हुन् । त्यसकारण यो राजनीतिक परिपाटी सामन्तवादी होइन, पूँजीवादी हो। यो पुँजीवाद नै हो । त्यसो त मूल राजनीतिक व्यवस्था पूँजीवादी भैसक्दा पनि अवशेषहरू सामन्तवादी रहन सक्दछन्। जस्तै युरोपेली देसहरूका राजतन्त्र, ती सामन्तवादका अवशेष हुन्, पुँजीवादका अङ्ग होइनन्। समाज व्यवस्थाको तेस्रो खुट्टा संस्कृतिबारे कुरा गरौं । नेपालमा संस्कृतिमा सामन्तवाद अलि बढी नै बाँकी छ । नेपालको सामन्तवाद हिन्दू वर्णव्यवस्थामा आधारित हो जुन सामान्तवाद आर्थिक प्रणाली सम्बन्धमा भन्दा सांस्कृतिक सम्बन्धमा झन् बलसाली हो ।
कसरी हो भन्दाखेरी एउटा थकाली धनी छ भने पनि आफूभन्दा गरिव ब्राम्हणलाई थकालीले नमस्कार गर्नुपर्थ्यो । हाम्रो विशिष्ट सामान्तवाद यस्तो हो। अन्तको सामन्तवाद त्यस्तो होइन, अन्त केवल धनीलाई नमस्कार गर्ने हो, जातलाई होइन । यहाँ गरिव नै छ भने पनि ठकुरी वावुसाहेव हुने हो । एउटा सुनार धनी नै छ भने पनि उसले ठकुरीलाई नमस्कार गर्नै पर्छ । सम्पत्तिले मात्रै काम चल्दैन । नेपाली समाजमा सामन्तवाद विशिष्ट प्रकारको वलशाली सांस्कृतिक पछ्यसहितको हो । अहिले पनि कयौ सांस्कृतिक क्षेत्रमा सामन्तवादको जवरजस्त प्रभाव छ तर सामन्तवादी संस्कृति नै अब मूल र निर्णायक प्रवृत्ति छ भन्न सकिंदैन। विवाह प्रथाको कुराबाट छलफल सुरु गरौं । यो विषय अलि रोचक पनि होला। नेपालमा विवाह सामन्तवादी प्रथामा दुई प्रकारको थियो। एउटा मागी विवाह ।
अर्को जनजाति समुदायमा मागी र लुटी विवाह । विवाहको यो मूल सामन्ती प्रवृत्तिबाहेक रोजी वा प्रेम विवाह पनि थियो तर त्यो बिद्रोही काम थियो, आम प्रवृत्ति थिएन। विस्तारै मान्छेहरु वनारस गएर पढ्न थाले अन्तराष्ट्रिय सम्पर्कमा हुन थाले, हिन्दी सिनेमाहरु हेर्न थाले, पढेको केटाले ‘ठिक छ विवाह आफ्नै जातमा गर्ने तर एकपटक हेर्न पाउनुपर्छ’ भन्न थाले । त्यो पुँजीवादको विवाह मामलामा ‘दस्तक’ थियो । संस्कृतिको क्षेत्रमा पुँजीवाद र सामन्तवादको आधारभुत अन्तर के हो भने, सामन्तवादमा संस्कृतिको छेत्रमा छनौटको स्वतंत्रता हुँदैन । पुँजीवादमा छनोटको स्वतन्त्रता हुन्छ । छनौटको स्वतत्त्रता भएको संस्कृति सामन्ती होइन,पुँजीवादी हो । अनि केटीले केटा पनि हेर्ने भन्ने कुरा आयो । हेरेर मात्र पुगेन एकछिन कुरा गरौं भन्ने हुन थाल्यो । त्यसपछि दाई, भाउजु ,फुपु, मामा लगायत ढोकामा पाले बसेर १०, १५ मिनेट कुरा गर्न दिन थालियो । हुँदाहुँदाहँ अहिले पुर्वदेखी पश्चिमसम्म तपाईलाई कुन विवाह ठिक लाग्छ भनी सोध्दा मन परेरै गरेको ठिक भन्ने ठाउँमा पुग्यो । यो पुँजीवाद हो , सामन्तवाद हैन । तपाईलाई पहिला कुनै कुरा छनौट गर्न सम्भव थिएन ।
तपाई रोदी गाउने परम्पराको हुनुहुन्थ्यो भने, रोदी नै गाउनुपर्थ्यो । तपाईले कुनै अर्को गीत गाउँछु भन्ने सम्भव थिएन । संस्कृतिको कुनै पनि चिजमा तपाईलाई स्वतन्त्रताको छनौट थिएन । तर अहिले संस्कृतिको स्वतन्त्रताको छनौट नयाँ ठाउँमा गयो । एउटै टेलिभिजनमा पाँच सेकेन्ड दृष्य मन परेन भने तपाई अर्को च्यानल फेरिहाल्नुहुनेछ, कसैले रोक्न सक्दैन। अव हामी छनौटको स्वतन्त्रताको व्यापकतामा पुगिसक्यौं । अब संस्कृति मूलत सामन्ती छ भन्न मिल्दैन । सामन्तवादी संस्कृतिका अवशेषहरु जवरजस्त छन् , कहाँ कहाँ छन् , भन्दाखेरी दलितहरुको उत्पिडनमा सामन्तवादी संस्कृति नै छ तर त्यो पनि क्रमश घट्दो छ । दोस्रो मधेसमा , हिन्दु महिला र मुस्लिम महिलामाथी साँस्कृतिक उत्पीडन गम्भीर छ ।
त्यसपछि सल्यान जिल्ला काटेर भेरी नदी काटेर गएपछि दार्चुलासम्मको पहाडी भेगमा दलित र महिलालाई पुरुष सरहको उच्च जाति सरहको मान्छेसम्म मान्दैनन् । त्यहाँ छ संस्कृतिमा सामन्तवाद। अव हामीले तथ्यमा आधारित कुरा गर्नुपर्छ । ३ लाख करिव हलिया प्रथामा मान्छे थिए, हलियाप्रथाबाट अन्यायपूर्ण ढंगले हलियालाई मुक्त गरियो, त्यहाँ हलियालाई पटक्कै न्याय भएन तर त्यसले सामन्तवादी बन्धन त कम्तीमा तोडिदियो । कमैया र कम्लरी प्रथाको प्रसंग पनि मूलतः यस्तै नै हो। त्यसकारण नेपालमा सामन्तवाद छ भन्ने कुरा तथ्य र तथ्याङ्कको आधारमा भन्नुपर्यो ।
मैले भनेको हो त्यसकारण ठिक भन्न मिल्दैन । पुष्टि हुने कुरा गर्नुपर्छ, आजको युवा युनिभसिर्टी जाने युवा हो । जुन वेला सामन्तवाद थियो, महेश रेग्मी सामन्तवादको अध्ययन गर्दैथिए, त्यतिबेला महेश रेग्मी नपढ्ने अनि आज जुन वेला सामन्तवाद छैन तब महेश रेग्मीले भन्दा बढी भूमिको कुरा गर्न खोजेर कुरा मिल्दैन। अब वर्ग विश्लेषणको कुरा गर्दाखेरी सामन्त कस्लाई भन्ने भन्दा आज पनि भन्न खोजिन्छ कि दस विघा हद राखौं अर्थात् दश विघाभन्दा माथी जग्गा भएकालाई सामन्त भनौं । यस्तो चेतनाको स्रोत के हो रु नेपालमा तिहुन खाने पहाडिया समुदाय छ । तिउन भनेको तरकारी पर्याप्त खान नपाउनेहरुको खाना रहेछ । मज्जाले तरकारी खान पाउने समुदायले तिउन खाँदैन । तरकारी पनि छैन, दाल पनि छै भने जे जे पाइन्छ नुन हालेर उमालेपछि त्यो तिउन भयो, त्यसमा मुछेर खाने, पहाडिया समुदाय छ नेपालमा ।
उसको जग्गा कम छ, भीरपाखा छ, त्यो तिउन खाने समुदाय जव तराईमा जाँदो रहेछ, त्यसले सबैलाई सामन्त देख्छ । यस्तो मनोविज्ञान तिउनबाट सुरु भएको छ । तराईमा हेर्दाखेरी त आँखाले नभ्याउने जमिन देख्छ त्यसले, अनि ओहो भन्छ ! दश विघा जमिन हुने मान्छेले, दुई सिजन गरेर धान र गहुँको राम्रो फलेको वेला आज सालाखाला पाँच लाख आम्दानी हुन्छ । घटेको वर्ष त्यो साढे तिन लाख, पौने चार लाख मात्र आम्दानी हुन्छ ।
पाँच लाख पैसाले त्यसको परिवारले के खान्छ र त्यसले अरु किसानलाई उत्पीडन गर्नेगरी के गर्न सक्छ रु पाँच लाख त वर्षमा आज मावि टिचरले कमाउँछ । मावि टिचर र सामन्तको हैसियत वरावर हुन्छ भने त्यो सामन्त कसरी हुन्छरु १० विघा जमिन भएका सामन्त हो भने त्यसले राज्य व्यवस्थामा प्रभाव कसरी जमाउँछ रु हैट१ यो त हास्यास्पद कुरा हो । पञ्चायतकालको मध्य समय विशेषत नगेन्द्रप्रसादको रिजाल प्रधानमन्त्री भएको काल २०३१/०३२ सालसम्म तराईमा केही हात्ती पाल्ने सामन्त थिए ।
आज व्यक्ति सामन्त नै नभएको देस हो नेपाल। भूमिमा सामन्तवादी सम्बन्ध अब केवल दुई सन्दर्भमा बाँकी छ। एक, मन्दिर गुठीको नाममा रहेको जमिन र तिनका जोताहा मोहीबीच। दुई, पुस्तैनी रूपमा बन्न पुगेका जग्गा धनी जो सामन्त होइनन् र जोताहा मोही।
तर आज त्यो स्थिति छैन। अहिले मधेस( तराईको आन्दोलन जुन छ, त्यसलाई जमिन्दारको आन्दोलन पनि कतिपयले भन्छन् । यो तिउन मानसिकताद्वारा गरिएको फन्टुस प्रशिक्षणको परिणाम हो । वास्तवमा मधेसमा जति पनि ठूला सामन्त थिए सबैभन्दा बढी जमिन कुम्लाएका त राजा महेन्द्रले नियुक्त गरेका पहाडका शाषकहरु थिए । मधेसी समुदायका सामन्त वास्तवमा पहाडिया पञ्चायती वर्चस्वमुनि कमजोर हँदै जाने क्रम त्यतिबेलै तीब्र भैसकेको थियो। पञ्चायती पहाडिया हिन्दू उच्च जातीय आर्यखस अहंकारवादमा आधारित समग्र राज्यको नीतिले मधेसी-थारू समुदायका सामन्तहरू स्थानीय रूपमा जतिसुकै हैकमसाली भए पनि राष्ट्रियस्तरमा पहाडिया सामन्तको हैकममुनि पारिसकिएको तथ्य नै सत्य हो। मैले यो बोलेको गलत लाग्छ भने तथ्याङ अध्ययन गर्न म सुझाव गर्न चाहन्छु, अरू केही भन्न जरूरी ठान्दिन।
यथार्थमा आज व्यक्ति सामन्त नै नभएको देस हो नेपाल। भूमिमा सामन्तवादी सम्बन्ध अब केवल दुई सन्दर्भमा बाँकी छ। एक, मन्दिर गुठीको नाममा रहेको जमिन र तिनका जोताहा मोहीबीच। दुई, पुस्तैनी रूपमा बन्न पुगेका जग्गा धनी जो सामन्त होइनन् र जोताहा मोही।
यस यथार्थलाई गंभीर रूपमा आत्मसात गर्दा आधारभूत रूपमा ‘जसको जोत उसको पोत’ भन्ने क्रान्तिकारी भूमिसुधारको परम्परागत नाराको औचित्य नेपालमा समात्त भैसक्यो, भूमिसुधारका अन्य पछ्यको मात्र सान्दर्भिकता बाँकी छ।
तसर्थ, नेपाली क्रान्तिको अबको रणनीति वा कार्यदिशा भनेको समाजवादी क्रान्ति स्वतः बन्न पुगेको छ, सामन्तवादका जति अवशेष बाँकी छन् तिनका विरुद्धको संघर्ष पनि समाजवादी क्रान्तिको रणनीतिअन्तरगत राखेर गरिनुपर्ने हुन्छ। अबको नेपाली दलित आन्दोलन पनि अब समाजवादी क्रान्तिको अंगको रूपमा विकाश हुन्छ र गरिनुपर्दछ।

http://dalitonline.com बाट साभार