Tuesday, June 23, 2015

भारतीय सांस्कृतिक प्रवाह - हृदयनारायण दीक्षित



प्रकृति सदा से है। यथार्थ है और सत्य है। हम मनुष्य इसी प्रकृति का भाग हैं। इसका शिव व सुंदर तत्व
प्रकट करना हमारा दायित्व है। जंबूद्वीप भरतखंड के पूर्वजों ने सचेत होकर प्रकृति सत्य के भीतर शिव
और सुंदर का साक्षात किया था। प्रकृति, प्रकृति की देन है और संस्कृति मनुष्य के कर्म कौशल से उपलब्ध
शिवत्व और सुंदरतम्। संस्कृति मनुष्य की सुकृति है। संस्कृति व्यक्तिगत नहीं होती। सत्य, शिव और सुंदर
के बोध भले ही व्यक्तिगत होते हों, लेकिन वे समाज को भी सुंदरता के रस से सराबोर करते हैं। शिवत्व 
के लोकमंगल से आपूरित भी करते हैं। तब जीवन के कटु सत्य भी मधुमय हो जाते हैं। सत्य, शिव और
सुंदर की मानवीय चेतना ही भारतीय संस्कृति है। भारत की इस संस्कृति का विकास वैज्ञानिक विवेक

और अनुभूतिपरक दर्शन से हुआ। दर्शन और विज्ञान ने सत्य का बोध कराया। इसी बोध से शिव और सुंदर का सृजन हुआ। इसी सृजन का नाम पड़ा संस्कृति। यही संस्कृति हमारे प्राणों के अणु परमाणु में रची बसी है। अथर्ववेद का पृथ्वीसूक्त विश्व का प्रथम सत्य, शिव और सुंदरतम सांस्कृतिक उद्घोष है। अथर्वा कहते हैं, हे धरती माता! यहां विभिन्न भाषाओं वाले, विभिन्न धर्मो वाले लोग रहते हैं आप सबका पोषण करें।'' कोई द्वैत नहीं। कोई अपना पराया नहीं। सबका अभ्युदय इस संस्कृति की अभीप्सा है। यहां विभिन्न धर्मो का अर्थ भिन्न-भिन्न जीवन शैली है। पंथ या मजहब नहीं। अथर्ववेद के रचनाकाल में पंथ मजहब नहीं थे।

टीवी की बहसों में भारतीय संस्कृति के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहे हैं। विद्वान टाइप मित्र प्रश्न करते हैं-यहां दहेज हत्या है, बलात्कार हैं, अपहरण हैं। कहां है यह संस्कृति?'' उनके प्रश्न संगत हैं, लेकिन वे प्राथमिक भूल कर रहे हैं। उनके प्रश्नों का केंद्र सांस्कृतिक है। दहेज हत्या और बलात्कार निंदनीय अपराध हैं। निंदनीय कहने की यह सोंच आखिरकार आई कहां से? सही गलत का निर्णय करने वाले 'विवेक' का विकास क्या सांस्कृतिक श्रमफल का ही परिणाम नहीं है? अपराध होते हैं। अपराध मुक्त समाज सबकी इच्छा है। संस्कृति समाज को अपने ढंग से अपराध मुक्त बनाने का उद्यम करती है। सारी संस्कृत सुभाषित संस्कृति का भाग है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के रचनाधर्मी मनुष्य के निंदित कर्म, असभ्य और अश्लील आचरण पर टिप्पणी करते हैं। टिप्पणियों के स्रोत संस्कृति में हैं। राज्य व्यवस्था अपराधी को दंडित करती है, वह अपराध नहीं रोकती। संस्कृति कल्याणकारी मार्ग को बढ़ावा देती है। कानून और संस्कृति दोनो अच्छे हैं पर कानून की सीमा है। कानून का पालन कराने वाले राजकीय बल अपराधी से भिन्न लोगों पर हाथ नहीं डाल सकते। डालते हैं तो गल्ती करते हैं। इस गल्ती का प्रतिकार करने के लिए सड़क पर आए गैर राजनैतिक समाज को सांस्कृतिक समाज ही क्यों नहीं कहेंगे?

'सिविल सोसाइटी' नाम नया है, लेकिन चर्चा में है। इस तरह के समूह गलती का प्रतिकार करने के लिए सक्रिय हैं। यह प्रशंसनीय है, लेकिन शुभत्व की प्रतिष्ठा का क्या हो? शुभत्व की परिभाषा क्या हो? शुभत्व काल विभाजित नहीं होता। उसे आधुनिक शुभत्व या प्राचीन शुभत्व में नहीं बांटा जा सकता। जो वैदिक काल में सत्य और शुभ था, वही महाकाव्य काल में है। मौर्यकाल और गुप्तकाल में भी वही शिव है। प्राचीन भारतीय इतिहास के नायक अपने अपने देशकाल के बावजूद उसी सत्य, शिव और सुंदर की प्रतिष्ठा करते हैं। आदर्श राज्य की कल्पना मार्क्सवाद में है। विद्वान उसे 'यूटोपिया' कहते हैं। आदर्श और व्यवहार में फर्क होते ही हैं। लेकिन आदर्श के प्रति लगाव बनाए रखना ही सांस्कृतिक होना है। तुलसीदास का रामराज्य इंद्रधनुषी आदर्श है। आधुनिक लोकतंत्री संदर्भ सहित वैसे ही राजसमाज का प्रयास करना सांस्कृतिक आदर्श ही कहा जाएगा। संस्कृति से कटे समाज के पास केवल राजव्यवस्था ही होती है। राजव्यवस्था के पास विधि या कानून होते हैं और इसका एक तंत्र। यह तंत्र हरे पेड़ काटने पर सजा दे सकता है, लेकिन पेड़ लगाने ओर उन्हें पोषण, संरक्षण या आदर देने की प्रकृति नहीं विकसित कर सकता।

जल और वायु प्रदूषण पर कानून हैं। हत्या, लूट, बलात्कार, अपहरण आदि पर कानून हैं। कानून से अपराध नहीं रूकते। भारतीय सांस्कृतिक प्रवाह में जल माताएं हैं और देवियां हैं। वायु देवता हैं। श्रद्धेय हैं। जल और वायु के प्रति श्रद्धा का भाव सांस्कृतिक चेतना है। जीवन के प्रति श्रद्धा का भाव अपराधों से विरत रहने के संस्कार देता है। काव्य, कला, संगीत, कथाएं अपने ढंग से समाज की संवेदना जगाते हैं। इनका अपना महत्व है। वैदिक साहित्य विश्व की प्राचीनतम ज्ञान निधि है। इसमें अनेक प्रेरक, संवेदन तत्व है। ऋग्वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक राष्ट्रजीवन की एक विशेष धारा है। कीट पतिंग और वनस्पति जगत तक से प्रीति प्यार की इस धारा को क्या नाम देंगे? क्या किसी राजा या राजव्यवस्था के निर्देशानुसार नदियां हमारी माताएं हैं? क्या पृथ्वी को मां जानने की अनुभूति संविधान से आई है? क्या लोकमंगल अभीप्सु प्रीति की यह रीति उचित नहीं है? इसमें रूढि़वाद क्या है? बेशक इस सबके बावजूद समाज में अनेक तरह की विसंगतियां हैं, लेकिन क्या इसका दोष भारतीय संस्कृति का है? वामपंथी मित्र अर्थव्यवस्था को ही अनेक समस्याओं का कारण मानते हैं। अर्थव्यवस्था एक प्रमुख कारण होती भी है। भारत में भी कृषि अर्थव्यवस्था के समय एक सामूहिक और मजेदार संस्कृति थी। औद्योगीकरण के बाद इसमें तमाम परिवर्तन आए, लेकिन विश्वकल्याण की कामना ज्यों की त्यों है। इसलिए कि लोकमंगल भारतीय संस्कृति का आधारभूत तत्व है।

कानून में जो दंडनीय है, वही संस्कृति में अकरणीय और निंदनीय है। कानून में प्रशंसनीय होता ही नहीं। संस्कृति का बड़ा भाग प्रशंसनीय की धारा में चला है। राष्ट्ररक्षा के लिए युद्ध अपरिहार्य है। संस्कृति परंपरा में युद्ध में वीरगति मिलती है और योद्धा को स्वर्ग। युद्ध से भागा योद्धा दंडनीय है, दंड भाग सरकारी है। लोक उसकी प्रशस्तिगाता है, यह बात संस्कृति है। स्तुति और निंदा संस्कृति है। शुभ की स्तुति और अशुभ की निंदा का स्वभाव भारतीय समाज में संस्कृति परंपरा से ही आया है। उपनिषदें में प्रेय और श्रेय की चर्चा है। जो प्रिय है, वह प्रेय है। जो लोकमंगल के लिए जरूरी है, वह श्रेय है। प्रेय की उपासना प्रकृति है और श्रेय का धारण संस्कृति। संस्कृति सामूहिक संपदा है लेकिन व्यक्तिगत जीवन को भी सत्य, शिव और सुंदर के मधुरस से भरती है और सामूहिक जीवन को उत्सवधर्मा बनाती है। भारत में कोई संस्कृति ही न होने की बातें करने वाले विद्वान कृपया नोट करें कि यहां विचार अभिव्यक्ति की प्राचीन संस्कृति के चलते ही उनकी गलत बातें भी सुनी जाती हैं।

कुछेक विद्वान संस्कृति तो स्वीकार करते हैं, लेकिन उसे सामंतों पुरोहितों की गढ़ी मानते हैं। वे राष्ट्र और उसकी प्राचीन उपलब्धियों की उपेक्षा करते हैं। देश भक्ति का स्रोत आखिरकार है क्या? प्राचीन उपलब्धियों के प्रति गौरवभाव देश भक्ति है। तप, ज्ञान, शोध और बोध की परंपरा के प्रति श्रद्धा भाव देशभक्ति है। काव्य सृजन की परंपरा का साक्ष्य ऋग्वेद है। संसार के इस प्राचीनतम ग्रंथ में ही उसके पूर्व की परंपरा और संस्कृति के उल्लेख हैं। उपनिषद् दर्शन यूनानी दर्शन के जन्म से भी प्राचीन है। काव्य सृजन और वाचन की 'पुराण शैली' आनंदित करती है। रामायण और महाभारत में इतिहास, दर्शन, संस्कृति, सभ्यता, समाजनीति, लोकनीति और राजनीति के मार्गदर्शक तत्व हैं। कालिदास जैसे महान कवि इनसे सामग्री लेते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर की अनेक कविताओं में उपनिषदों की ध्वनियां हैं। भारतीय संस्कृति के प्रवाह में अनेक धाराएं हैं। यहां अंधआस्थावाद और वैज्ञानिक विवेकानंद की टक्कर भी पुरानी है। नई संस्कृति गढ़ने के इच्छुक विद्वानों को भी मूल का ध्यान रखना चाहिए। जड़ से कटे पेड़ पर पक्षी भी गीत नहीं गाते। जड़ से जीवन रस लेते हुए कमजोर वृक्ष भी अपनी जिजीवीषा के कारण फिर-फिर हरियाते हैं और नई कोपलें देते हैं। मूल वही, रस वही। नई कोपलें तभी उगती हैं वरना ठूंठ के ठूंठ। झूठ नहीं बोलना चाहिए।

लोक से दूर होती संस्कृति - प्रमोद भार्गव

भारतीय साहित्य में जातीय सांस्कृतिक चेतना - डॉ मनोज पाण्डेय


भा रतीय साहित्य और उसकी जातीय अस्मिता की परख के लिए भारतीयता की अवधारणा पर विचार करना जरूरी है।
 कारण यह है कि, भारतीयता की अवधारणा  पर विचार करना जरूरी है। कारण यह है कि, भारतीयता के मूल स्वर को अभिव्यक्त करने वाला साहित्य ही भारतीय साहित्य हो सकता है चाहे उसकी रचना देश की चौहद्दी के भीतर हुई हो चाहे बाहर, और चाहे वह किसी भी देश-विदेशी भाषा में लिपिबद्ध हुई हो। कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय साहित्य वही कहा जा सकता है जिसमें भारतीयता के तत्त्व विद्यमान हो, जिसमें भारतीय जनमानस के स्वर मुखरित हुए हों, भारतीय अस्मिता की जिसमें पहचान निहित हो। दिक् और काल, बोली और भाषा भारतीयता के मापदण्ड नहीं हो सकते, न ही भारतीय साहित्य के निर्धारक हो सकते हैं। किसी भी राष्ट्र की अपनी एक जातीय संस्कृति होती है, सांस्कृतिक चेतना होती है जिसमें उसकी अस्मिता के सूत्र होते हैं, उन्हें दरकिनार कर उसके राष्ट्रीय साहित्य की अवधारणा लिपिबद्ध नहीं हने सकती-भारतीय साहित्य की भी नहीं हो सकती।
जहां तक भारतीयता की बात है, इसका अर्थ किसी संकीर्णता के बंधन में बंधा हुआ नहीं है, न ही किसी जाति, धर्म, सम्प्रदाय या वर्ग विशेष की सीमा में संकुचित है। भारतीयता जीवित सत्ता का नाम है, मृत नहीं। डॉ  नगेन्द्र के अनुसार- 'भारतीय भौगोलिक और राष्ट्रीय, देशिक और कालिक सीमाओं से मुक्त एक स्थिर धारणा है, जिसका निर्माण भारतीय जीवन-दर्शन में व्याप्त स्थायी तत्त्वों के द्वारा हुआ है।' डॉ  सुनीतिकुमार चटर्जी ने इसे ही भारत धर्म कहा है। धर्म, दर्शन और अध्यात्म भारतीयता के विशेष पहलू हैं। निश्चय ही भारतीयता की एक वृहद अवधारणा है, इसमें विविधता में एकता का भाव विद्यमान है। हमारे राष्ट्र की राष्ट्रीयता की पहचान ही है भारतीयता।
भारतीयता के स्वरूप का निर्धारण करते हुए डॉ  नगेन्द्र ने अपने निबंध 'आधुनिक भारतीय साहित्य में भारतीयता' में निम्नलिखित तत्त्वों का उल्लेख किया है-1 आस्तिक बुद्धि-अर्थात भौतिक जीवन से ओत-प्रोत किसी न किसी प्रकार की चैतन्य सत्ता में विश्वास , 2 इस चैतन्य सत्ता के संबंध से जीवन के प्रति आस्था-यानी त्याग से परिपोषित भोग की कामना 3 अनेकता में एकता की कल्पना ओर तज्जन्य समन्वय भावना, 4 धार्मिक मानववाद अर्थात अतीन्द्रिय आनंद और कल्याण की भावना से प्रेरित मानव  गरिमा की स्वीकृति, 5 साहिष्णुता और समभाव अथवा सत्य के रूढिमुक्त विकासशील रूप की कल्पना आदि।
कहना न होगा यहनं नगेन्द्रजी जिस भारतीय जीवन-दर्शन की बात कर रहे है उसका आधार हमारी-सांस्कृति चेतना है। यही हमारी भारतीयता के भाव का प्रतीक भी है।
भारतीय साहित्य के संबंध में विचार करते हुए डॉ  इन्द्रनाथ चौधरी ने भारतीयता की पहचान के तीन आद्यप्रारूपी बिम्बों का उल्लेख किया है। जिसमें पहली है वेदान्तिक अवधारणा, जिसके अनुसार पारमार्थिक सत्ता एकमात्र सत्ता है  इस सत्ता को समझने के लिए ही भारतीय आचार्यों, संतों, विद्वानों ने ब्रह्म और प्रकृति, आत्मा और परमात्मा, स्रष्टा और सृष्टि के भदोपभेद किये हैं। दूसरा आद्यप्रारूप है, आदर्शवाद और तीसरा है मानवतावाद। यह भारतीय आदर्शवाद ही है कि यहां पत्ते के झडने तक को अंकुर के फूटने के संदर्भ में देखा जाता है, मनुष्य को स्वयं ईश्वर का पर्याय माना जाता है। उपनिषद् का घोष वाक्य ही है-'अहं ब्रह्मास्मि।' कहना न होगा कि भारतीयता के ये आद्य प्रारूप भारतीय जीवन-दर्शन के प्ररेक ओर सहचर है और भारतीय साहित्य के मानक हैं। समूचे भारतीय वाड्मय साहित्य में इन्हें पाया जा सकता है।
डॉ  नगेन्द्र इसे ही 'भावप्रतिमा' मानते हुए कहते हैं, 'भारतीय परिवेश में और यथासंभव भारतीय उपकरणों के माध्यम से भारत की इसी भाव प्रतिमा को अंकति करने वालाा साहित्य शुद्ध अर्थ में भारतीय साहित्य है। आज भी भारतीय साहित्य का उत्तमांश इसी कल्पना से अनुप्राणित है।'
जातीय-सांस्कृतिक चेतना प्रत्येक राष्ट्र की अपनी विरासत होती है, जो वसीयत के रूप में भाषा, साहित्य, पर्व-त्यौहार, व्यवहार आदि माध्यमों से अनवरत् प्रवाहमान बनी रहती है। उसमें कुछ नया जुडता रहता है, कुछ पुराना खारिज होता रहता है। यह भी उल्लेख है कि भारत वर्ष  की जातीय-सांस्कृतिक चेतना की अपनी एक पहचान है, उसका अपना मुकम्मल इतिहास और वर्तमान है। साहित्येतिहास का कोई भी कालखंड ऐसा नहनीं है, जिसमें समूचे भारतीय मानव का स्वर एक-सा न सुनाई देता हो, टोन में कमी-बेशी हो सकती है, अभिव्यक्ति के माध्यम भिन्न हो सकते हैं, अभिव्यंजना के धरातल भिन्न हने सकते हैं, परन्तु अभिव्यंजित वस्तु अभिन्न है, उसमें एक सावयविक एकता है। आदिकाल या प्रारंभिक काल और उससे भी पहले जायें तो वैदिक काल और उपनिषद्काल से लेकर आज तक के समूचे भारतीय वाड्मय का इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारतीयता का भाव इस राष्ट्र की किसी एक भाषा, एक बोली, एक क्षेत्र, एक जाति, एक धर्म की जागीर नहीं रहा है, वह समस्त भारतीय मानस की भावना का प्रतिबिम्ब रहा है, समग्र भारतीय समाज का दर्पण रहा है। हमारे वैदिक साहित्य उपनिषद, पुराण आदि जिस भारतीय की परिकल्पना में रचे गये हैं वह इस राष्ट्र की एकात्मकता की नींव है। संस्कृत काल में रचित साहित्य की भावभूमि एक ही है, चाहे उसका सृजन काशी उत्तर भारत में हुआ हो या कांजी दक्षिण भारत में या कश्मीर में। कावेरी नदी से गंगा तट तक बीच में अन्यान्य जलधाराओं को छूते-मिलाते हुए संस्कृत में जो रचना हुई है उसमें वैविध्य के बावजूद समन्वय की विराट चेतना है।
मध्ययुगीन भक्ति साहित्य को भी हम मिसाल के तौर पर देख सकते हैं। भक्ति साहित्य एक सामाजिक आंदोलन की उपज है। यह किसी एक भाषा-भाषी की विरासत नहीं है। इसमें समूचे भारतवर्ष की भावना व्यक्त हुई है। बहुभाषी होते हुए भी इसकी भावभूमि एक समान है। डॉ इन्द्रनाथ चौधुरी के शब्दों में 'भक्ति साहित्य में अलग-अलग भाषाओं का प्रयोग है। सांस्कृतिक विशिष्टताओं की अभिव्यक्ति है तथा समुदाय के आश्रय से ऐतिहासिक क्रियात्मकता में प्रादेशिक अस्मिता का प्रसार है। विभिन्न भाषाओं में रचित इस साहित्य में दिखाई पडने वाली विविधिता के बावजूद एक आम विश्वास , आस्था , मिथक तथा अनुश्रुतियां इनमें विषयवस्तु की एकता का पता देती है।'
इसी प्रकार आधुनिक काल का नवजागरण सर्व घटना है। नवजागरण के प्रभावस्वरूप राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पुनरुस्थानवाद का जो उदय हुआ , उसे समूचे भारतीय साहित्य में देखा जा सकता है। मौजूदा दौर को ही देखें तो उदारीकरण, भूमण्डलीकरण, व्यापारीकरण का दबाव-प्रभाव और इनके कारन्ण लोग पहचान को, स्थानीय रंगत को कायम रखने की चिंता और चेतना, विमर्श के नये धरातल तथा स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श की अनुगूंज समस्त भारतीय भाषाओं के साहित्य में देखी-समझी जा सकती है और इनकी सर्व भारतीय पहचान को महसूस किया जा सकता है ।
यह भी उल्लेख करना होगा कि भारतीय जातीय अस्मिता के तन्तुओं की समानता के कारण ही भारत के किसी भी एक भू-भाग में घटने वाली मसलन किसी विचारधारा या साहित्यिक प्रवृति का प्रादुर्भाव, मात्र वहनीं तक सिमटकर नहीं रह जाती। वह जल्दी ही सर्वभारतीय रूप ग्रहण कर लेती है। विगत कऊछ दर्शकों में उभरने दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श के स्वर को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।
कुल मिलाकर कहना यह है कि भारतीय साहित्य की अवधारणा की पहचान-परख के लिए भारतीय जातीय सांस्कृति चेतना की पहचान आवश्यक है। यही वह आधार है जिसके सहारे भारतीय साहित्य की एकसूत्रता की तलाश की जा सकती है। आचार्य कृष्ण कृपलानी का मत निष्कर्ष रूप में यहों ध्यातत्व है-'भारतीय सभ्यता की तरह, भारतीय साहित्य का भी विकास, जो एक प्रकार से उसकी सटीक अभिव्यक्ति है, सामाजिक रूप में हुआ है। इसमें अनेक युगों ,प्रजातियों और धर्मों का प्रभाव परिलक्षित होता है और सांस्कृतिक चेतना तथा बौद्धिक विकास के विभिन्न स्तर मिलते हैं।'
http://www.deshbandhu.co.in बाट साभार 

Tuesday, June 9, 2015

मुहिङगुम अङसीमाङलाई सांस्कृतिक पक्षबाट नियाल्दा - नेम्बाङ नन्दकुमार ‘गाउँलेजी’



वि.सं२०२७ अगाडि मुहिङगु अङसीमाङ लिङ्देन आत्मानन्दसेइङको महत्वकांक्षी योजना थियो, आफू मात्र मुक्ति भएर जाने तर, २०२७ साल गर्नुभएको कठोर तपस्याले वहाँको महत्वकांक्षालाई पूरा हुन दिएन। आफ्नो मुक्तिका लागि शुरु भएको तपस्या सिङ्गो किरात समुदाय मानव मुक्तिको जिम्मामा परिणत भयो। जुन कुरा समान्य थिएन किनकि, अन्धकारमा गुज्रिरहेका किरातका साथै मानव समुदायको मुक्तिका लागि महागुरु फाल्गुनन्द लिङ्देनले प्रतिपादन गर्नुभएको किरात धर्म दर्शनलाई पूरा गर्नु पर्ने जिम्मेवारी वहाँमा आइलाग्यो। त्यो असामान्य जिम्मेवारी पूरा गर्नै पर्ने माङको आज्ञा भएपछि किरात समाज उत्थानका लागि धार्मिक सांस्कृतिक आन्दोलन एकसाथ शुरु गर्नु भयो

विकृति विसंगतिमा चुर्लुम्म डुबेको समाजलाई रुपान्तरण गर्नु त्यति सहज थिएन। त्यसैले आफ्नो भलाइका लािग अरुको बलि दिएर रगतको पोखरीमा डुबेका किरात समाजलाई पवित्र जीवन जीउनका लागि धार्मिक शिक्षा सँगसँगै उनीहरुले गर्ने कर्म संस्कारमा परिवर्तनका लागि योजनाबद्ध ढंगले काम शुरु गर्नुभयो।

किरात सभ्यता, संस्कार, संस्कृति, इतिहास, भाषा, लिपि आदि विषयमा उपदेश दिँदै समाजिक परिवर्तनमा जोड दिनुभयो। सत्य, शान्ति, अहिंसा मानवतावादी विचार श्रवण गराउँदै अनन्त मुक्तिको बाटोमा किरात समुदायलाई डो¥याउँदै ल्याउनु भयो। उक्त कार्य गर्न वहाँले सांस्कृतिक क्षेत्रलाई अगाडि बढाउनेभयो। सांस्कृतिक क्षेत्रबाट वहाँले पु¥याउनुभएको योगदानबारे यहाँ छोटकरीमा चर्चा गर्ने कोशिष गरिएको छ।


मुहिङगुम अङसीमाङको सांस्कृतिक अभियान
 

जतिखेर मुहिङगुम अङसीमाले सांस्कृतिक रुपान्तरणका लागि अभियान थाल्नु भयो। त्यसबेला संगठित रुपमा कार्यक्रम गर्न प्रतिबन्ध थियो। मातृभाषामा गीत लेख्न गाउन पाइदैन थियो। आफ्नो भाषामा गीत लेख्ने, गाउनेलाई राजद्रोहीको मुद्दा लगाइन्थ्यो। त्यतिखेर मुहिङगुम अङसीमाङले जोखिम मोलेर किरात भाषामा गीत लेख्ने कामको शुभारम्भ गर्नुभयो।

किराती समुदाय आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक राजनीतिक क्षेत्रबाट पूर्णरुपमा विमुख भइसकेको अवस्थालाई देखेर परिकल्पना गर्नु भयो। काङवा खोला काबेली खोलाको दोभानको उत्तरपट्टिको पवित्र थुम्कीमा रहेको ढुङ्गामा बसेर गीत संगीतको माध्यमबाट किरात समुदायलाई उठाउने महान् विचार फुटाउनु भयो। जसरी काङवा खोला काबेली खोला एक भएर नदीको रुप लिएर बगेको , त्यसरी नै किरात समुदायलाई एक ठाउँमा ल्याउन सके एउटा महान् शक्तिको रुप लिन सक्छ भन्ने सपना बोकेर वि.सं. २०३४ मा किरात भाषामा गीत लेख्न शुरु गर्नुभयो। जुन गीतको पहिलो अन्तरा यस्तो

किराती चुम्से पोगिना सेख्खा इङवाने कासेरो।

सिवादिङ खाहुन माङ इङघङ मये सेख्खाने आसेरो।।

भावार्थः

किराती मित्र हो उठ्नु नै पर्छ, भाले बास्यो है।

ज्ञान, उपदेश बिहीन भएर मरे झैं भयौं है।।

पञ्चायतकालमा पनि मुहिङगुम अङसीमाङले किरात समुदायको उत्थानको सम्भावना देख्नुभएको थियो। राज्यको दमन विभेदले शिथिल बनेकाकिरात समुदायलाई त्यही कारण अब उठ्नु पर्छ, जुट्नु पर्छभन्ने सन्देश दिन पान्थर ताप्लेजुङको सीमानामा रहेको काबेली माङहिमको प्राङ्गणमा बसेर माथि उल्लिखित गीतको रचना गर्नुभएको थियो। उक्त गीतमा किरातहरु धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा सामाजिकरुपमा अस्तव्यस्त रहेकाले अब सबै एक हुनु पर्छ। विकृति विसंगतिको विरुद्धमा लड्नु पर्छ। ज्ञान शिक्षाको बाटोलाई पछ्याउनु पर्छ। कुमार्गबाट सुमार्गमा आउनु पर्छ। त्यसको नेतृत्व दिन तयार छु। तपाईहरुको उत्थान मुक्तिका लागि आइसकेको छु। तपाईहरुको मुक्तिका लागि माङको छडीले शुभसाइत देखाइसक्यो। तसर्थ, किराती मित्रहरु उठ्नु पर्छ। जबकि, भाले बासिसक्यो भन्ने सन्देश दिन खोज्नुभएको छ। त्यसैगरी किरातहरु धर्मोपदेश विहीन भएर ईश्वरीय कर्महरुबाट अलग भएका बेला हामी साँच्चै अस्तित्व विहीन भयौं। भाषा, लिपि, साहित्य, संस्कृति, इतिहास सबै हराएर मरे झंै भयौं भन्ने सन्देश दिनु भएको छ।

मुहिङगुम अङसीमाङले गीत लेखन कार्यलाई निरन्तरता दिने क्रममा वि.सं. गीत संगीतको सिर्जना गर्नुभयो। जुन गीतको पहिलो अन्तरा यस प्रकार :

ओतीरो नोफूङवा चुम्से ओतिरो

तक्साङङाङ थोधो थोक्फेला फेक्ते कुघेम्मी पयङङा हौं

तेम्भोआङ यो यो आजीफूङ फेक्ते सोलुङमा सहिम्मा हौं

खादाम्मा लाजेओ खाओप्मान त्यारो लुङमाने पहिम्मा हौं

ज्ञान विवेक विहीन भएपछि मानिस मरेतुल्य हुन्छ। अस्तित्व पहिचान विहीन भएपछि मानिस मूल्यहीन बन्न पुग्छ। किरातीहरु बाँचेर पनि मरे झंै बन्न पुगेको अवस्थामा मुहिङगुम अङसीमाङले गीत संगीतको माध्यमबाट प्रेरणा दिइएको उक्त गीतमा भनिएको

बल्नु पर्छ पवित्र मित्र हो, बल्नु पर्छ

माथिमाथि लेकमा लालीगुराँस फूल्यो सुहाउँदिलो भयो है

तलतल मैदानमा टाँकी फूल फुल्यो उराठै लाग्यो है

अँध्यारो देशमा उज्यालो आयो विरह लाग्यो है

विवेकशील मानिस शक्तिशाली हुन्छन्। शक्ति नै ज्योति हो। ज्योति हुनु नै बल्नु हो। किरातीहरुसँग भाग्य छ। त्यसैलाई सम्हाल्नु उठ्नु पर्छ अनि ज्योतिले बल्नु पर्छ। प्रकृतिले पनि साथ दिनेछ। समयले साथ दिनेछ। ऋतुहरुले साथ दिनेछ। अब बल्नु पर्छ भनेर किरात समुदायलाई झक्झक्याउनु भएको छ। नेपालमा भएको राज्य सत्तालाई अँध्यारोको बिम्बको रुपमा लिनु हुँदै अँध्यारो देशमा उज्यालोको लालीकिरण आइसकेको यस परिवर्तनलाई कसैले रोक्न नसक्ने तर्फ सङ्केत गर्नुभएको छ।

सांस्कृतिक आन्दोलनबाट किरातीहरुलाई ब्यूँझाउने क्रममा मुहिङगुम अङसीमाङले किरात समुदायको मुक्तिका लागि माङको निगाहले आफू आइसकेको गीतको माध्यमबाट बताउनुभएको छ। त्यसरी नै वहाँले आफूले के कुरा भनिरहेको छु? आफु को हो? भन्ने राम्ररी बुझ्न, सुन्न हेर्न अनुरोध गीतबाट गर्नु हुँदै भन्नुभएको :

थाङमाङ लाम्दो हात्ने साम्लो नुरिक खेप्सेम्मे

लत्छा निङ्वा चोगेम्मेआङ लाम्मिन तयेम्मे

अर्थ :

उकालो बाटोमा को गीत गाउँदैछ राम्ररी सुन है

एक मन बनाएर बाटो खन है

उक्त गीतमा ओरालो झर्नु जति सजिलो हुन्छ, उकालो जानु त्यति सहज हुँदैन। त्यस्तै, पवित्र जीवन जीउन जति अभ्यास गर्नु पर्छ, अपवित्र हुनलाई त्यति गाह्रो हुँदैन। आफू पवित्र मार्गका लागि उकालो जाने यात्रु भएको कुरालाई औल्याउँदै महान यात्रुको पछि हिँड्ने महान् मार्गको आवश्यक भएकाले त्यस मार्गलाई एक मन एक चित्त भएर निर्माण गर्नु पर्दछ भन्ने अमूल्य सन्देश दिनुभएको छ।

मुहिङगुम अङसीमाङको माथि उल्लिखित गीतहरु धार्मिक जागरणसँग सम्बन्धित हुन्। वहाँले धार्मिक जागरण बाहेक पाङभे साम्लो (लोक गीत) सेवा साम्लो (भक्ति गीत) पनि रचना गर्नुभएको छ। वहाँले रचना गर्नुभएको पाङभे साम्लोमध्ये एकको पहिलो अन्तरा यस्तो :

लच्छा पुधिक परेबे ताङसाङथाङ

कन तरेमान सारिक्के आसिराधाङ

अर्थ :

एउटा चरा आकाशमा उड्यो है

यो पाहुनालाई साह्रै मन ¥यो है

यस गीत रचना गर्दाको रमाइलो घटना छ। वि.सं. २०४३ चैत्र महिनाका एक दिन मुहिङगुम अङसीमाङ महमाई निवासी हर्कवीर योङहाङसँग गुरुको बाजे पर्ने इलाम जितपुर ढोडेनीका सिराने बाजे (रनबहादुर लिङ्देन) लाई भेट्न जाँदै हुनु हुन्थ्यो। यसरी जाने क्रममा फुःलुङगीबाट अलि माथि खत्रक्पाबाट बाया अलिक तल कन्काईमाई देउमाईको संगम स्थनमाको छेउमा एउटा ठूलो मैदानमा रहेको छ। त्यहाँ जितपुर उकालो चढिन्छ। त्यस ठाउँमा नै गुरु लच्छा पुथिक भन्ने गीत गाउँदै नाच्नु भयो। उक्त गीतलाई मुहिङगुम अङ्सीमाङले लिपिबद्ध गराउनु भयो। उक्त गीत अहिले चर्चित बन्न पुगेको छ। यस्तै, वहाँले रचना गर्नुभएको गीतमध्ये तान्छोदिङ तारे, ओत् तागेरा, इक्सादिङ खाम्बेकलगायतका हुन्। यसलाई समय सापेक्ष उपयोग विश्लेषण गर्दै जानु आजका नयाँ पिढीको जिम्मेवारी हो। मुहिङगुम अङसीमाङले कति गीत लेख्नु भयो? कति गीत गाउनु भयो? भन्ने प्रश्न भन्दा पनि किन गाउनु भयो? किन गीत रचना गर्नु भयो? त्यसको प्रभाव कसरी बढ्दै आयो? भन्ने कुरालाई खोज अनुसन्धान गर्नु आजको आवश्यकता हो।


संगीत तथा सम्पादनमा देन :


मुहिङगुम अङसीमाङ लिङ्देन आत्मानन्द सेइङलाई गीतकार तथा गायक मात्र होइन वहाँले आफूले रचना गर्नुभएको गीतमा संगीत पनि भर्नुभएको छ। आफूले रचना गर्नुभएको गीतमा मात्र होइन अरुले रचना गरेको गीतमा समेत संगीत भर्न सहयोग गर्नुभएको छ। शब्द संगीतको तादात्म्यता भए नभएको समेत जानकारी गराउनुभएको छ।

गीत संगीतबाट अलि पर गएर मुहिङगुम अङसीमाङलाई हेर्ने हो भने अन्य दृश्य सम्पादनमा पनि रुचि छ। वहाँले मुन्धुमी चलचित्र साप्पुना मरङना, सामाजिक फिल्म माराम, विभिन्न म्युजिक भिडियोको सम्पादनमा सल्लाह दिँदै आउनुभएको छ।


अन्त्यमा,


मुहिङगुम अङसीमाङ ज्ञान चेतनाका अद्भूत स्रोत हुनु हुन्छ। वहाँले दिनुभएको योगदानलाई केलाएर हेर्ने हो भने हरेक पक्षहरुमा दर्शनको निर्माण भइरहेको हुन्छ। आर्थिक, समाजिक, राजनीति सबै पक्षमा वहाँको क्रियाशीलता छ। यसका साथै सांस्कृतिक क्षेत्रमा पनि वहाँको गहन योगदान छ।

निरङ्कुश पञ्चायतकालदेखि आफ्नो मौलिक भाषामा गीत लेखेर सांस्कृतिक पहिचानको आन्दोलनलाई शुभारम्भ गर्नुभएको थियो। वहाँको त्यो अदम्य साहसबाट सिर्जित रचनाहरु आदिवासी सांस्कृतिक आन्दोलनका मार्गदर्शन बन्न पुगेको छ। वहाँले दिनुभएको सांस्कृतिक देनलाई वहाँले गीतमा भन्नु भए झंै अँध्यारो देशमा उज्यालोको लाली किरण आइसकेको छ।

मानव जीवनमा रहने अँध्यारो पक्षको विरुद्धमा उभिनु हुने मुहिङगुम अङसीमाङ जीवनका उत्तराद्र्धकालमा संसारभरका आस्थाका पुज्य बन्नुभएको छ। नेपालका राष्ट्र प्रमुख, प्रधानमन्त्री, मन्त्री, राजनीतिक दलका प्रमुख सबैको पूज्य बन्नुभएको छ। वहाँप्रतिको सम्मानले हामी गर्विलो भएका छौं। मुहिङगुम अङसीमाङले सोच्नुभएका सबै कुरा साकार बनून्। समस्त किरात समुदाय मानव जगतका लागि यही नै कल्याण हुनेछ।
http://www.mangsebungnews.com बाट साभार