Tuesday, February 24, 2015

लोक से दूर होती संस्कृति - प्रमोद भार्गव

अपसंस्कृति और मूल्यहीनता

अपसंस्कृति और मूल्यहीनता, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दबाव, उपभोक्तावादी समय के 
आतंक और कथा-साहित्य की महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं के बन्द होते चले जाने के बावजूद 
हिन्दी कहानी ने आधुनिक समय की कंकरीली ज़मीन पर अपना वजूद बनाए रखा है, यह 
एक आशाजनक स्थिति है। रचे हुए शब्दों के प्रकाशन के लिए कहीं कोई आकर्षण, कोई 
प्रेरणा नहीं हैं। कथा-साहित्य लाखों के सर्क्युलेशन वाली पत्रिकाओं से हटकर अखबारों 
के रविवारीय संस्करणों और शुद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं के विचार-प्रधान लेखों के 
कारण हाशिए पर चला गया है, इसके बावजूद हिन्दी में सशक्त कथा-साहित्य का सृजन 
हो रहा है।

लेखन को पीढ़ियों में बाँधकर आँका जाना साहित्य के प्रति ज़्यादती है। लेखक की जवाबदेही अपने समकालीनों या अपनी पीढ़ी के प्रति नहीं, अपने समय के प्रति है। वह निरन्तर बदलते और आगे बढ़ते समय के साथ जुड़कर रचना करता है। लगातार चार दशकों से लेखन करते हुए वरिष्ठ कथाकार भीष्म साहनी या निर्मल वर्मा जब कहानियाँ लिखते हैं तो वे अपने चिर परिचित भाषागत लहजे के बावजूद अपने पुराने इज़्म को तोड़ते हैं। दूसरी ओर यह भी सच है कि जीवन के संश्लिष्ट होते चले जाने के साथ-साथ कथा रचना भी संश्लिष्ट हुई हैं।

सन पचास के बाद की कहानी शिल्प को स्तर पर प्रयोगात्मक होने के बावजूद भोगे हुए यथार्थ, संत्रास एवं द्वंद्वों की नितान्त वैयक्तिक अभिव्यक्ति थी, उसके बाद की पीढ़ी ने मोहभंग की प्रतीति के साथ राजनीतिक - सामाजिक सतर पर गहरे उथल-पुथल और भ्रष्टाचार का आकलन किया है -- इसी के अनुरूप कहानी का शिल्प भी प्रौढ़ हुआ है। इसके अतिरिक्त कहानी में उन स्त्री पात्रों का विद्रोह भी अधिक मुखर दिखाई देता है जे अब तक एक आदर्शवादी चौहद्दी में कैद था।

आधुनिक सामाजिक विसंगतियाँ और उनके विरोधाभास पहले से कहीं अधिक पैने हो गए हैं। एक ओर औरत अपनी सदियों पुरानी इमेज को तोड़कर लगभग विध्वंसक रूप में आगे आती दिखाई देती है तो दूसरी ओर मध्यम-वर्गीय कस्बाई स्त्री का पारंपरिक स्वरूप आज भी बदलाव से अछूता, सदियों पुरानी मान्यताओं को ढोने और समझौतों की सलीब उठाने पर मजबूर है। लेखक-लेखिकाओं की युवा पीढ़ी ने इस चुनौती को बखूबी स्वीकार किया है और मीडिया तथा समय के तमाम अवांछित दबावों के बावजूद कथा साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज की है। कहानियों से अधिक कहानीकारों को रेखांकित करने की प्रवृत्ति सन पचास के बाद के दशक में थीं, जब लेखक के चारों ओर एक प्रभावमंडल निर्मित कर दिया और कुछ इने-गिने कथाकारों और उनकी कहानियों को छोड़कर बहुत से प्रतिभाशाली कथाकार और उनकी रचनाएँ गर्त में धकेल दी गई। रचनाओं से अधिक आत्मकथाओं और जीवनियों में पाठक दिलचस्पी लेने लगे। इसके बाद का समय एक तरह से रचनाकारों के व्यक्तिगत जीवन से पाठक के मोहभंग का रहा। आज पाठक की कोई दिलचस्पी लेखक के विगत जीवन के किस्सों में नहीं हैं क्यों कि आज के जीवन, समाज और राजनीति में उसे लेखकीय आत्मश्लाघा की इस वीभत्स नुमाइश से कहीं अधिक हैरतअंगेज घटनाएँ, घपले और घोटाले सुबह-शाम के अखबारों में बहुतायत में पढ़ने को मिल जाते हैं और आज का मुश्किल समय उसे व्यक्ति-पूजा के 
लिए कोई अवकाश नहीं देता। 

जिस देश में आज भी आए दिन गाँव-क़सबों में लाचार दलित औरतों को निर्वस्त्र पूरे गाँव में घुमाया जाता हो, जहाँ बलात्कार के मुकादमें बरसों कचहरियों की धूल फाँकते हों, जहाँ हर रोज़ दहेज के नाम पर लड़कियाँ जलाई जाती हो, जहाँ अंधविश्वास के तहत नरबलि दी जाती हो, वहाँ पश्चिम से आयातित उत्तर आधुनिकता और संरचनावाद जैसे वैचारिक बदलाव का प्रभाव समकालीन कहानी में ढूँढ़ना अप्रासंगिक हैं।
दोस्तोवस्की का कहना है -- 'सुन्दरता ही अंतत: इस दुनिया को बचाएगी'। जब तक जीवन में कोमलता और सौन्दर्य बचा है तभी तक जीवन जीवन हैं। मानवीय संवेदना के बिना साहित्य की पहचान असंभव है। कहानीकार होने की पहली शर्त उसका संवेदनाशील होना है। सादगी को असंवेदनशील बनाने, बनाते चले जाने के तमाम दबाव गाहे-बगाहे उसके अवचेतन पर पड़ते हैं पर एक रचनाकार तमाम अमानवीय, हिंसक और क्रूर स्थितियों के बीच से अपना रास्ता ढूँढ़ लेता हैं।

आज के प्रजातंत्र में जब एक आम आदमी भी अपनी एक राजनैतिक समझ रखता है और मौजूदा हालातों पर टिप्पणी करता है तो समय और समाज से जुड़ा लेखक इससे अलग, निर्विकार और तटस्थ कैसे रह सकता है? लेखक के पात्र उसकी पक्षधरता के वाहक अवश्य होते हैं, पर जहाँ विचारधारा कहानी पर सायास हावी हो जाए, वहाँ कहानी को क्षति पहुँचना बहुत ही स्वाभाविक है।

आमतौर पर आंदोलनों से कुछ कहानीकारों को लाभ होता है पर कहानी को नुकसान ही पहुँचता हैं। हिन्दी कहानी में विगत दशकों में चलाए गए आंदोलनों में -- नई कहानी, समांतर कहानी, सचेतन कहानी का कोई सीधा प्रभाव कहानी पर नहीं पड़ा, पर इतना अवश्य है कि चलाए गए आंदोलनों से एक खास समय की कुछ विशेष बदली हुई प्रवृत्तियाँ रेखांकित हो जाती हैं और कथा साहित्य के इतिहास के आकलन का काम आसान हो जाता है। परन्तु आमतौर पर ऐसे आंदोलनों का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इनसे न जुड़े रहने के कारण बहुत-सा अच्छा साहित्य हाशिए पर धकेल दिया जाता है।

हिन्दी कहानी भारतीय भाषाओं के अधिक करीब है। इसका एक कारण समानधर्मा परिवेश और सामाजिक संरचना हैं। हिन्दी कहानी किसी भी भारतीय भाषा की कहानी या विदेशी कहानियों के समकक्ष गर्व से रखी जा सकती है। हिन्दी की उदारता का ही परिणाम है कि हिन्दी में तमाम भारतीय भाषाओं तथा विदेशी भाषाओं का प्रतिनिधि साहित्य उपलब्ध है पर इतर भाषाओं में हिन्दी साहित्य का बहुत कम अनुवाद हुआ है इसका प्रमुख कारण स्वयं सरकारी संस्थानों द्वारा हिन्दी की उपेक्षा है।

अन्य भारतीय भाषाओं की कहानियों के मुकाबले हिन्दी कहानियों का तेवर कहीं अधिक पैना और प्रयोगधर्मा है पर वह हिन्दी का दुर्भाग्य है कि इसमें प्रकाशन की सुविधाएँ धीरे-धीरे कम हो रही है।कहानी में सबसे अहम उसका कहानीपन या कथ्य है। हर कहानी अपनी भाषा और बुनावट-शिल्प स्वयं गढ़ती है। एक सीधा सहज कथ्य उलझे हुए शिल्प के कारण आहत हो सकता है। कथ्य और भाषा का सानुपातिक सामंजस्य ही कहानी को संप्रेषणीय तथा ग्राह्य बनाता है।

'हिन्दी में कहानियाँ हैं, कहानीकार नहीं' की तर्ज़ पर यह कहना कहीं अधिक सटीक है कि हिन्दी में कहानियाँ हैं, पाठक नहीं। साहित्यिक और गंभीर रचनाओं के पाठक पहले भी माया, मनोहर कहानियाँ, सरिता या नीहारिका के पाठकों से कम ही थे। इसमें संदेह नहीं कि हिन्दी भाषा वर्ग के संख्या में गुणात्मक वृद्धि हुई है पर हिन्दी फ़िल्मों और सैटेलाइट चैनलों की तेज़ रफ्तार से आती 'हिंग्रेजी' ने महानगरीय युवा वर्ग को अपनी चपेट में ले लिया है। पिछले दस-पंद्रह वर्षों में धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी रंगीन पत्रिकाओं के बन्द होने से हिन्दी का एक एलीट पाठक वर्ग अंग्रेज़ी पत्रिकाओं की ओर मुड़ गया है। यह एक विडंबना ही है कि भारत की राजभाषा साहित्य से जुड़ने की जगह या तो कुछ पाठ्यक्रमों की किताबों में कैद हैं या किसी मीडिया बाज़ार के गलियारों में भटक रही है।जब तक मनुष्य में अपने भीतर पलते लावे को बाहर उड़ेलने की चाह बाकी हैं, काग़ज़ पर शब्द लिखे जाते रहेंगे। 

प्रतिकार करने, विरोध का स्वर उठाने का यह एक सार्थक उपकरण हैं। इसलिए कला या साहित्य को मरने की घोषणाएँ निरर्थक हैं। यह ज़रूर है कि आज इस क्षेत्र में जश्न की अनुपस्थिति हैं।राजभाषा घोषित किए जाने के बावजूद हिन्दी भाषा स्वयं अस्तित्व के संकट से गुज़र रही है। जो भाषा अपने रचनाकारों को आर्थिक आधार ही प्रदान नहीं कर सकती, उसमें कहानीकार -कवि या विचारक कैसे पनप सकते हैं। 

विदेशी भाषाओं के लेखक सिर्फ़ अपने लेखन के बूते पर एक अच्छी, सुविधाजनक ज़िन्दगी जी सकते हैं, जब कि हिन्दी लेखक को रोजी-रोटी के लिए कोई दूसरा जरिया तलाशना पड़ता हैं और अपने लेखक को ज़िंदा रखने के लिए कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं। फिर भी हर काल में, हर पीढ़ी में कुछ ऐसे सिरफिरे निकल ही आते हैं जिनके लिए अकेले कमरे में काग़ज़ और कलम का साथ ही उनकी नियत बन जाता हैं, चाहे उसे पढ़ने-सराहने-समझने वाला कोई हो, न हो।

Monday, February 23, 2015

पूंजीवाद का संकट और मार्क्‍सवाद की चुनौतियां

Thursday, February 12, 2015

नेपाली कम्युनिस्टहरु किन अझै धार्मिक छन् ? - आहुति

नेपाली कम्युनिस्टहरु किन अझै धार्मिक छन् ?



-आहुति
Aahuti Photo 111
क. धर्म र नेपाली कम्युनिस्ट नीति
कार्लमाक्र्सले एउटा महान् संश्लेषण गर्नुभएको थियो, ‘धर्म मानिसको लागि अफिम हो ।’ नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलनले धर्मबारे लिएको नीति यही वाक्यका वरपर यहाँसम्म कि यो वाक्यको भित्री तहसम्म समेत पुग्न नखोजी केवल नतमस्तक भएर घुमिरहेको देखिन्छ । नेपालमा धेरैजसो कम्युनिस्टले यो वाक्यको अर्थ कसरी बुझेका छन् भने अफिम लठ्याएर बेहोस बनाउने लागू औषध हो, त्यसैले यसलाई प्रयोग गर्न हुँदैन, धर्म पनि त्यस्तै लागू औषध हो । माक्र्सको अभिप्राय त्यो होइन । त्यतिबेला असाध्य रोग लागेकाको शारीरिक पीडा कम गर्न कुनै ‘पेन किलर’ औषधि बनेको थिएन, त्यसकारण त्यतिबेला त्यस्ता रोगीको पीडालाई भुल्याउन अफिम सेवन गराइन्थ्यो । यस अर्थमा माक्र्सको अभिप्राय के थियो भने पीडाग्रस्त मानिसलाई गलत तरिकाले नै भए पनि धर्मले अफिमले जसरी पीडाबाट छुटकारा दिने गरेको छ । माक्र्सले धर्मलाई गलत भन्नुभयो साथमा धर्मले नकारात्मक ढंगले पारेको सकारात्मक प्रभावको पनि शानदार ढंगले उजागर गर्नुभयो ।
नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलनले धर्मलाई गलत र यसको विरोध गर्नुपर्दछ भन्ने अत्यन्त सरलीकृत नीति मात्र अघि सारेको देखिन्छ । धर्मको ऐतिहासिक भौतिकवादी विश्लेषणसहित विश्वदृष्टिकोण परिवर्तनको अभियानसँग गाँसेर यसबारे गम्भीर नीति अघि सारेको देखिँदैन । नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलनले धर्मबारे लिएको अर्को नीति के थियो भने राज्य धर्मनिरपेक्ष हुनुपर्छ । ५० को दशकभन्दा अघिसम्म त कम्युनिस्ट आन्दोलन केवल धार्मिक स्वतन्त्रताको मात्र वकालत गथ्र्यो, त्यसपछि भने धर्मनिरपेक्षताको पक्षमा उभिन थाल्यो । हिन्दू धर्म नेपालमा शासक धर्म रहिआएकोले मुख्य प्रहारको निशाना हिन्दू धर्मले सिर्जना गरेका उत्पीडनलाई नै बनाउनु ठीक थियो तर यो द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी विश्वदृष्टिकोण निर्माणको प्रश्नसँग सम्बन्धित भएकाले हिन्दूबाहेकका अन्य धर्मको जनविरोधी मानवविरोधी चरित्रमाथि पनि प्रहार गरिनुपर्दथ्यो । त्यसोचाहिँ हुन सकेन । केवल हिन्दू धर्म मात्रै गलत भए जस्तो, अरु धर्मप्रति भने उदारता अपनाएजस्तो कम्युनिस्ट आन्दोलनको नीति रह्यो, जुन त्रुटीपूर्ण छ ।
baburam
ख. नेपाली कम्युनिस्टको व्यवहार र धर्म 
नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलनमा रहेको धर्मबारे घनिभूत, व्यापक र दूरगामी रणनीतिको अभावका कारणले धर्मबारे नेपाली कम्युनिस्टको व्यवहार मूलतः ढोंगी र अवसरवादी प्रकारको रहन गएको छ । धर्मको विरोध वामपन्थी बालरोग जसरी चर्को रुपमा प्रकट हुने, त्यसपछि समयक्रमसँगै महादेवको तस्वीर कोठामा टाँस्नेस्तरमा एक सय असी डिग्री फन्को मार्ने प्रवृत्ति कम्युनिस्ट आन्दोलनमा हुनु धर्मबारेको छिपछिपे बुझाइका आधारमा गरिएको विरोध बाहेक केही होइन । कम्युनिस्ट आन्दोलनमा अहिलेसम्म कुनै न कुनै रुपमा जातपात कायम रहनु, महिलालाई दोस्रो दर्जाकै व्यवहार गरिनु अनि भाषण गर्दा धर्मको विरोध तर जनै लगाउन नछोड्नु, तामाङ नेता भए स्वयम्भूमै जलाउनु पर्ने, हिन्दू भए पशुपतिमै लाँदा राम्रो मान्नु, घरभित्र सबै धार्मिक अनुष्ठान तर बाहिर परिवारले मान्दैनन् भनी उम्किनु, भूमिगत होउन्जेल दशैंको विरोध तर खुला भएपछि सबैभन्दा ठूलो टीका उनकै निधारमा– यी र यस्ता प्रशस्त व्यवहारहरू छन् नेपाली कम्युनिस्टका जसले धर्मबारेको उनीहरूको उद्घोष वास्तवमा ढोंग पाखण्ड बाहेक अरु केही थिएन भन्ने प्रष्ट हुन्छ । करिब साढे ६ दशकको कम्युनिस्ट आन्दोलनमा पैदा भएका अत्यन्त थोरै नेता कार्यकर्तामात्र धर्मसँग सम्बन्ध विच्छेद गरेका पाइनु भनेको अँध्यारोमा टुकी अवश्य हो, तर झलमल उज्यालो भने हुँदै होइन ।
ग. नेपाली कम्युनिस्ट र केही टिठलाग्दा गल्तीहरू 
नेपाली कम्युनिस्टहरूले परम्परागत चाडपर्वलाई प्रगतिशील चेतना बाँड्न उपयोग गर्ने नीति लिँदै आए । तर चाडपर्व भने हिन्दू चाडपर्व मात्र रोजे, त्यो पनि आर्य खस चाडपर्व मात्र । मधेसी र जनजातिको चाडपर्वका बारेको कम ज्ञान किनभने लामो समयसम्म ठूला कम्युनिस्ट नेता आर्य खस उच्च जातका मात्र रहे अनि मधेसी र जनजाति ठूला नेता कार्यकर्ता नभएका कारणले मधेस र जनजातिका चाडपर्वलाई उपयोग गर्ने प्रस्ताव नै बन्न सकेन । परिणामतः कम्युनिस्ट पार्टीका समारोहहरू हिन्दू पहाडिया उच्च जातीय ढाँचामा ढालिए । कोही नेता चुनियो भने रातो टिका र फूलको माला प्रचलन नै बसालियो अनि मुसलमान र इसाई चुनियो भने पनि स्वाभावैले उसको मान्यता विपरीत माला र टिका लगाइयो । द्यौसी भैलोमा कम्युनिस्ट पार्टीले निर्णय गरेर ‘मह्पूजा’ गर्न जानुपर्ने नेवार युवती कायकर्तालाई रातभरि नचाइयो र ऊमाथि हिन्दू चाड लादियो, उसको आफ्नो चाड मान्न वञ्चित पारियो । लिंग पूजाको तीजसँग कुनै सरोकार नराख्ने लिम्बू महिलालाई सभापति बनाएर ज्यापु महिलालाई नचाइयो । स्कुल क्याम्पसको लागि पैसा बटुल्ने नाममा पार्टीका नेताको संयोजकत्वमा हिन्दू पुराण वाचन कार्यक्रम आयोजना गरियो । अझ कम्युनिस्ट नेताले उद्घाटनसमेत गर्ने गरियो । यस्ता अनगिन्ती उदाहरणहरू छन् जसमा कम्युनिस्ट पार्टीमा लागेका गैरहिन्दूहरूलाई हिन्दू कर्ममा निर्णय गरेर लगाइयो, विडम्बना लगाइँदैछ । यहाँसम्म कि जनयुद्धमा युद्धविराम गर्दासमेत दशैंको निम्ति भनेर गरियो । यसरी गम्भीरतापूर्वक हेर्दा के देखिन्छ भने कम्युनिस्टहरू एकहदसम्म चाहे त्यो थोरै नै किन नहोस्, गैरहिन्दू माथि हिन्दूकरण लाद्ने औजार बन्न पुगे । वास्तवमा यथार्थ यही हो– कम्युनिस्ट पार्टी साँचो अर्थमा धर्मनिरपेक्ष समेत बन्न सकेन । यी इतिहासका टिठलाग्दा गल्तीहरू कम्युनिस्टले तुरुन्तै सच्याउन जरुरी छ । तर दुःखद् पक्ष यसतिर ध्यान धेरैको छैन ।
jhalanathainthenameofgod
घ. दर्श वर्षको जनयुद्ध र धर्म 
तत्कालीन नेकपा (माओवादी) पार्टीले जनयुद्ध सुरु गर्नुभन्दा पहिलासम्म कम्युनिस्टको धर्मबारेको नीति या त ढोंग पाखण्डमा सीमित थियो या त केही योद्धाहरूको विशिष्ट व्यवहारमा सीमित थियो । तर जनयुद्धले धर्मद्वारा लादिएको तीनवटा गम्भीर नकारात्मक सामाजिक व्यवहारमाथि गम्भीर प्रहार गर्यो । एक, गाईको पवित्रतामाथि प्रहार गर्यो । जनयुद्धमा हाम्फालेका सबै हिन्दू समुदायबाट आएकाले (अपवाद पनि होलान्) गाईको मासु खाएर गाईको ईश्वरीय पवित्रतासम्बन्धी हिन्दू मान्यतालाई चुनौती दिए । अब नातासम्बन्ध जोड्दै जाने हो भने नेपालको कुनै पनि ब्राह्मण, क्षेत्री, सन्यासी परिवार, त्यसै स्तरका मधेसी समुदायका परिवार गाईसम्बन्धी आफ्नो मूल्यमा चोखो रहेका छैनन् । यथार्थ यही हो । नेपालमा जनजाति र दलितमाथि थोपरिएको यो अपवित्रताको साङ्लो जनयुद्धले कमसेकम बौद्धिकस्तरमा चकनाचुर पारिदिएको छ । गाई जनावर हो, धेरै दूध दिने जनावर त्यसलाई त्यही रुपमा मात्र बुझ्ने दृष्टिकोण बनाउन ढोका खोलिदिएको छ ।
दुई, जनयुद्धले दलितमाथिको जातपात छुवाछुत भेदभावका विरुद्ध ठूलै परिवर्तन ल्याएको छ । भेदभावलाई घटाउन र दलित जागरण ल्याउन त्यसले ऐतिहासिक भूमिका खेलेको छ । कहिल्यै हतियार बोक्न नपाएकालाई हतियारधारी बनाएर, छुवाछुत भेदभावलाई व्यवहारमा दण्डनीय बनाएर अनि दलितलाई नीतिनिर्माणमा नेतृत्व दिने प्रक्रियाको सुरुआत गरेर जनयुद्धले वर्णव्यवस्थाको ढाडमा धेरै पटक वज्र प्रहार गरेको छ । तीन, महिलालाई सशस्त्र बनाएर जनयुद्धले महिलामाथिको हिन्दू र अन्य सबै धर्मको उत्पीडनलाई गम्भीर चुनौती दिएको छ । निश्चित रुपमा जनयुद्धले धर्मसँग अभिन्न रुपमा सम्बन्धित यी विषयमा गम्भीर परिवर्तन ल्याएकै हो । तर ती परिवर्तन आमसमाजको सांस्कृतिक रुपान्तरणको रुपमा नभएर केवल जनयुद्धको बलमा भएका परिवर्तनको स्तरमा मात्र रहेकाले जनयुद्धको समाप्तिपछि ती उपलब्धी प्रतिगमनमा जाने गम्भीर खतरा उपस्थित भइसकेको छ । दलित र गैरदलितबीचको अन्तरजातीय विवाहमा भइरहेको सम्बन्ध विच्छेद त्यसको ज्वलन्त उदाहरण हुन् । त्यसकारण जनयुद्धले भत्काएका धार्मिक मूल्यमान्यतालाई पुनर्जीवित हुन नदिन र अग्रगामी बाटोमा अघि बढ्न कम्युनिस्ट क्रान्तिकारीहरूले ठोस योजना बनाउन तत्काल जरुरी छ ।
Madhav Nepal
ङ. नेपाली कम्युनिस्ट र धर्मनिरपेक्ष राज्य एवं गणतन्त्रको स्थापना 
तमाम गल्ती कमजोरीका बावजुद नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलन– त्यसमा पनि विशेषतः जनयुद्ध र त्यसको जगमा विकसित वि.सं. २०६२÷०६३ को जनआन्दोलनले नेपालमा गणतन्त्र र धर्मनिरपेक्षता स्थापित गरिछाड्यो । यो निकै ठूलो क्रान्तिकारी उपलब्धी हो । गणतन्त्रको अर्थ हो नेपालको शासकीय धर्म हिन्दूधर्मको राजकीय संरक्षण अन्त्य र धर्म निरपेक्षताको अर्थ हो धार्मिक स्वतन्त्रतासहित नास्तिक बन्ने नागरिकलाई वैधानिक अनुमति– निष्कर्षमा द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी विश्वदृष्टिकोणको प्रचारलाई वैधानिक स्वीकृति । यो उपलब्धीमाथि टेकेर नेपाली कम्युनिस्टले धेरै काम गर्न सक्ने स्थिति सिर्जना भएको छ । जरुरी छ, गणतन्त्र र धर्म निरपेक्षताको रक्षा र सिंगै समाजको अधिभूतवादी प्रत्ययवादी विश्वदृष्टिकोण बदलेर द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी विश्वदृष्टिकोण निर्माण गर्ने अभियान सञ्चालनको गुरु योजना ! त्यो गुरुयोजना बनाउन सक्छ कि सक्दैन भन्ने कुरामा नै नेपाली कम्युनिस्टको धर्मबारेको भविष्य निर्धारण हुनेछ ।
(‘धर्म र नेपाली कम्युनिस्ट’ शीर्षक लेखको एक अंश)

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Thursday, February 5, 2015

सांस्कृतिक रूपान्तरण



दोसाँधमा सांस्कृतिक आन्दोलन

नेपाली प्रगतिशील गीत/संगीतका क्षेत्रमा आफ्नो पृथक् पहिचान बनाएका गायक राजन राईले अहिले आएर आफू हिँडिरहेको 'बाटो' थोरबहुत रूपमा बदलेका छन्। यो उनको बाध्यता हो वा कमजोरी? यसको कुनै निर्क्योल निकाल्न नसकिए पनि निश्चित रूपमा आफू हिँडिरहेको 'बाटो' बदल्नु त्यति सजिलो कार्य भने चाहिँ होइन। तर, बदलिँदो समय, परिस्थिति र अझ त्योभन्दा पनि सांगीतिक क्षेत्रमा देखिएको तीव्र प्रतिस्पर्धाले प्रगतिशील सांस्कृतिककर्मीहरूलाई कुनै न कुनै हिसाबले 'बदलिनु' अपरिहार्यजस्तै बनाइसकेको छ। र, कुनै बेला क्रान्ति, जनताका पीर, मर्का र व्यथाहरूका साथसाथै परिवर्तनका लागि सोझै आह्वान गरिएका गीत/संगीतमा आफ्नो सिप र सिर्जना पोख्ने गायक राईले हालसालै एउटा प्रेमवादी गीत गाएका छन्। स्पष्टीकरणको भाषामा उनी भन्छन्– 'अब हामीले प्रेमका गीतहरूबाट पर भाग्नु हुँदैन। समाजलाई पच्ने र समयले मागेका प्रेमवादी गीतहरू हामीले पनि गाउँदा केही फरक पर्दैन।' 
कुनै त्यस्तो समय पनि थियो, जतिबेला प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलनमा लागेकाहरूलाई प्रेमवादी गीत गाउन लगभग प्रतिबन्धितजस्तै थियो। खुला रूपमा उद्घोष नगरिए पनि प्रगतिशीलको 'ट्याग' लगाएका सांस्कृतिककर्मीहरूले आफ्नो विवेकस्वरूप 'प्रेमवादी गीत गाउनु हुन्न' भन्ने मान्यतालाई बोध गर्र्नै पर्थ्यो। जतिबेला पनि आन्दोलन, परिवर्तन, पीर–व्यथाका गीतहरू मात्रै गाउनुपर्छ भन्ने मान्यता सर्वोपरि थियो। हुन पनि राजनीतिक आन्दोलनका सेपमुनि बाँचेका र हुर्किएका त्यस्ता सांस्कृतिककर्मीहरूले प्रेमवादी गीत गाएर समय खेर फाल्ने कुरा त्यति सुपाच्य पनि थिएन। न त राजनीतिक नेतृत्वलाई, न त संस्कृतिकर्मीहरूलाई नै। तसर्थ पनि बाध्य भएर गाउनुपर्थ्यो– 'वर्गीय समाजमा वर्गीय प्रेम मात्रै चोखो र पवित्र हुन्छ...।' वर्गभन्दा बाहिरको प्रेम, प्रेम हुँदैनथ्यो र त्यतिबेला प्रेमवादी स्वरहरू अलाप्नु नितान्त बेठीक कुरा सावित हुन्थ्यो।  
अहिले गायक शम्भु राई 'क्रान्तिकारी' गीत गाउन अति नै इच्छुक देखिन्छन्। मानौं, उनी क्रान्तिकारी गीत गाउन अग्रपंक्तिमा नै उभिएका हुन्छन्। यो समयले निम्त्याएको सकारात्मक पक्ष हो वा सम्बन्धित व्यक्तिको औसरवादको पराकाष्ठा हो? यो किटान गर्न मुस्किल छ। तर, एकीकृत माओवादी पार्टीको भेलाहरूमा उनी अग्रपंक्तिमै उभिएर 'अन्तिम विजय हाम्रै हो' भन्दै कुर्लिन्छन् हिजोआज। अचम्मको कुरा त के रहेछ भने, गायकहरूका स्वर कहिल्यै पनि नबिटुलिँदो रहेछ। होइन भने, तिनै शम्भु राई हुन्, जसले नेपालको प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलनमा एउटा बहस जन्म गराइदिएका थिए। चालीसको दशकको सुरुआततिर नै तत्कालीन नेकपा (माले)को सांस्कृतिक मोर्चामा रहेर गाउँ–गाउँमा जनवादी गीत गाउँदै हिँडेका उनी अन्ततः उग्र प्रेमवादी गीतहरू गाउनेहरूका पंक्तिमा दरिए। खासगरी, तत्कालीन पञ्चायती व्यवस्थाले फालेको पासोमा अल्भि्कएर रातारात नारायणगोपाल बन्ने सपना बुन्दै रेडियो नेपालमा छिरे र धेरै नै प्रेमवादी गीतहरूमा स्वर अर्पणसमेत गरे। त्यही बेलादेखि नै प्रगतिशील सांस्कृतिक फाँटमा एउटा बहसको प्रारम्भ भयो–'आफूलाई जनताका गायक ठान्नेहरूले प्रेमका गीतहरू गाउन हुने कि नहुने?' यद्यपि, यो बहसले अहिलेसम्म कुनै किनारा भेट्टाइसकेको भने छैन। तर, तिनै राई अहिले माओवादी पंक्तिका 'प्रिय गायक' भएका छन्, कम्युनिस्ट पार्टीहरूले कुनै पनि सभा, सम्मेलन वा भेला गर्दा सुरुमा गाइने 'अन्तर्राष्ट्रिय गीत' गाइँदा उनको उपस्थिति अनिवार्यजस्तै भएको छ। विडम्बना नै भनौं, जीवनभर जनताका गीत गाएर नथाक्ने, गैंची र बेल्चा बोक्नेहरूका पक्षमा स्वर उराल्ने खुसीराम पाखि्रनहरू चाहिँ क्रमशः ओझेलमा पर्दै छन्। वन साङ्लाले घर साङ्लालाई खेदेको कथन अहिले माओवादीको सांस्कृतिक क्षेत्रमा स्थापित भएको छ। यो यथार्थलाई कसैले पनि नकार्न सक्दैनन्।  
जनताका गायकहरूले प्रेमवादी गीतहरू गाउनु हुन्न भन्ने मान्यताद्वारा हिजोका दिनहरूमा ग्रसित थियो, प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलन। तर,  अहिलेसम्म उक्त मान्यताबाट यो आन्दोलन माथि उठ्न सकेको छैन। खासगरी, पुराना पुस्ताका रामेश, रायन, जेबी टुहुरे, खुसीराम पाखि्रनदेखि नयाँ पुस्ताका जीवन शर्मा, माइला लामाहरू प्रेमवादी गीत गाउने सन्दर्भमा अझै पनि हच्किन्छन्। त्यस्ता गीत गाइँदा आफू बिटुलो भइन्छ कि भन्ने मनोवैज्ञानिक त्रास यो पंक्तिका संस्कृतिकर्मीहरूमा विद्यमान छ। एक पटक संगीतकर्मी उदय श्रेष्ठले एउटा प्रेमवादी गीत गाउँदा फरक वृत्तका संस्कृतिकर्मीहरूले नाक खुम्च्याएका थिए। अहिले पनि प्रगतिशील साँस्कृतिक फाँटमा यो स्थिति कायम नै छ। हुन त कुनै बेला माओवादी आन्दोलनभित्र आबद्ध भएर प्रगतिशील गीत/संगीतमा निर्लिप्त रहेका कन्हैया सिंह, अन्जान गुरुङहरू अहिले पूरै प्रेमवादी, अझ त्यसमा पनि विछोड र विरहका गीतहरू गाउनमा माहिर भइसकेका छन्। उनीहरूले आफ्नो पूरै 'ट्र्याक' परिवर्तन गरिसकेका छन्। यो बेग्लै पक्ष हुन सक्ला। तर, प्रगतिशील संस्कृतिकर्मीहरूमा आएको ठूलो विचलनलाई उनीहरूले बदलेको धारबाटै प्रस्ट बुझ्न सकिन्छ।    
प्रगतिशील सांस्कृतिक फाँटमा अहिलेसम्म निर्क्योल हुन नसकेको प्रश्न हो– प्रगतिशील संस्कृतिकर्मीहरूले प्रेमवादी गीत गाउनु हुन्छ कि हुन्न? तर गाउनेहरू गाइरहेका छन् र नगाउनेहरू चाहिँ यो प्रश्नको जवाफ खोज्ने सन्दर्भमा मौन छन्। अर्थात् उनीहरूले सार्थक पहल वा जमर्को नै गरेका छैनन्। तसर्थ पनि, जवाफविहीनताको स्थितिबीच नै अहिलेसम्म नेपाली प्रगतिशील सांस्कृतिक क्षेत्र रुमल्लिइरहेको प्रतीत हुन्छ। समग्रतः दोधार र दोसाँधमा नै नेपालको प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलन अल्मलिइरहेको सर्वत्र आभास हुनु स्वाभाविकै देखिन्छ।

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प्रगतिशील आन्दोलन र सांस्कृतिक रूपान्तरणको प्रश्न


निनु चापागाई
बरिष्ठ माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्री 
नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलनले नेपालमा विद्यमान अर्धसामन्ती एवं अर्धऔपनिवेशिक शोषण–उत्पीडन र सामन्ती संस्कृति तथा पतनोन्मुख प“ूजीवादी संस्कृतिका विरुद्ध संगठित संघर्ष गर्दै आएको पनि लगभग आधा शताब्दीभन्दा बढी वर्षहरू बितिसकेका छन् । यस समयावधिमा नेपालको कम्युनिस्ट आन्दोलनले कतिपय विषयमा केही महŒवपूर्ण उपलब्धिहरू हासिल गर्न सफलता प्राप्त गरेको छ तापनि आन्दोलनको नेतृत्वदेखि आम कार्यकर्ता र संस्कृतिकर्मीहरूको सांस्कृतिक रूपान्तरणको सवालमा जति महŒवका साथ ध्यान केन्द्रित गर्नुपर्ने थियो त्यो नगरेको दुःखदायी अनुभूति यस आन्दोलनप्रति चासो र चिन्ता राख्ने अधिकांशले गर्दै आएका छन् । यो गोष्ठी त्यही चिन्ताको एउटा सानो परिणाम हो र यस अर्थमा यसको निकै ठूलो समसामयिक महŒव रहेको मैले अनुभूति गरेको छु ।
हामी के कुरामा एकदमै स्पष्ट र दृढ हुनु आवश्यक छ भने कम्युनिस्ट आन्दोलन वर्गीय आन्दोलन हो र सर्वहारावर्गको नेतृत्वमा नेपालका सम्पूर्ण शोषित–उत्पीडित वर्गको स्वार्थको प्रतिनिधित्व गर्दै तिनको हितस“ग आन्दोलन एकाकार हुनु अनिवार्य हुन्छ । आन्दोलनमा समाजमा क्रियाशील विभिन्न वर्गका व्यक्तिहरूले प्रवेश पाउन सक्ने र अझ हाम्रो जस्तो निम्नप“ूजिपतिवर्गको बाहुल्य रहेको समाजमा त यस वर्गका मानिसहरू अत्यधिक मात्रामा यसभित्र आउनु एउटा सहज क्रिया बन्न पुगेको देखिन्छ । वर्गसंघर्षको व्यावहारिक क्रममा खारिन नपाउंदै कम्युनिस्ट आन्दोलनमा तिनले प्रवेश गर्ने हुनाले तिनीहरूस“गै विजातीय विचार, भावना, संस्कार र संस्कृति आन्दोलनभित्र पस्नु अनौठो होइन । यसका विरुद्ध निरन्तर सचेत संघर्ष संचालन गर्नु अनिवार्य हुन्छ । त्यसैले आन्दोलनमा सहभागी बन्न पुगेका यस्ता व्यक्तिहरूको दृष्टिकोण र सम्पूर्ण जीवनआचरण सर्वहारावर्ग र तमाम शोषित वर्गअनुरूप बनाउन नेतृत्वदायी तहबाट नै लगातार अभियान चलाइनु आवश्यक हुन्छ । त्यसो नभएको खण्डमा आन्दोलनमा खराबी र विकृतिहरू आउनु अचम्मको विषय होइन । नेपालको कम्युनिस्ट आन्दोलनमा आज सर्वत्र यस्ता खराबी र विकृतिहरू देखा परिरहेका छन् । आन्दोलनमा आबद्ध व्यक्तिहरूको पुरानो विचारधारा र दृष्टिकोण तथा जीवनआचरणको श्रृङ्खलालाई सचेतन ढड्डले नभत्काई यो समस्याबाट पार पाउन सकिन्न । विचारधारामा रूपान्तरण अर्थात् द्वन्दात्मक भौतिकवादी विश्वदृष्टिअनुरूप दृष्टिकोणको निर्माण, सर्वहारावर्ग र आम शोषित–उत्पीडित जनतास“ग एकाकार हुने र वर्गसंघर्षमा प्रत्यक्ष भाग लिने र विचारधाराअनुरूप जीवनशैली, जीवनपद्धति र आचारव्यवहारलाई नया“ ढड्डले पुनर्गठित गर्ने सवाल आज अत्यन्त गम्भीरताका साथ उठाइनुपर्ने विषय भएको छ । ठीक ढड्डले विचारधारालाई समात्ने, त्यसलाई समुन्नत बनाउ“दै लैजाने र सांस्कृतिक रूपान्तरणको कार्यलाई महŒवका साथ अघि बढाउने सम्बन्धमा धेरथोर चर्चा परिचर्चा हुने गरे पनि यस समस्यालाई समाधान गर्न न योजनाबद्ध संघर्ष थालिएको पाइन्छ न त यस विषयलाई गम्भीरताका साथ  लिएकै देन्खिछ । यस गोष्ठीले राजनीतिक नेता र संस्कृतिकर्मीहरूलाई एकै ठाउ“ भेला गराएर छलफल चलाई उक्त कुराप्रति ध्यानाकर्षण गराउने सानो प्रयत्न गरेको मैले ठानेको छु । 

संस्कृति भनेको के हो, सांस्कृतिक आन्दोलनको आवश्यकता किन छ र संस्कृति एवं सांस्कृतिक आन्दोलनको महŒव कति र किन हो भन्ने विषयमा हाम्रो आन्दोलनमा निकै अस्पष्टताहरू रहेका छन् र यसबारेमा सही दृष्टिकोणको अभाव एकदमै खड्किन्छ । दृष्टिकोणको अभाव हुनु भनेको वैचारिक रूपमा प्र्रष्टता नहुनु हो र यो हाम्रो आन्दोलनमा विद्यमान विचारधारात्मक स्पष्टताको अभावकै एउटा अर्काे पाटो मात्र हो । हाम्रा अधिकांश राजनेतादेखि आम कार्यकर्तासम्म संस्कृति भनेको नाचगान र अभिनय बाहेक अरू केही ठान्दैनन् र यो उनीहरूका दृष्टिमा मनोरञ्जनको साधन बाहेक अरू केही होइन । तीमध्ये कतिले यसलाई चाडबाड, रीतिथितिसम्म विस्तार गरिहालेछन् भने पनि उनीहरू राजनीति स्वयं संस्कृतिको एउटा सानो अङ्ग हो, राजनीतिक आन्दोलनले झैं सांस्कृतिक आन्दोलनले पनि वस्तुगत यथार्थलाई बोध गराउने एवं त्यस यथार्थलाई परिवर्तन गर्न नै उत्प्रेरित गर्ने हो र यो राजनीतिभन्दा कता हो कता प्रभावकारी साधन हो भन्ने तथ्यलाई हृदयदेखि नै आत्मसात् गर्न चाहि“ एकदमै पछि परिरहेका हुन्छन् । वास्तवमा सांस्कृतिक आन्दोलन  वैचारिक आन्दोलन हो र यो राजनीतिक आन्दोलनभन्दा शक्तिशाली एवं प्रभावकारी वैचारिक आन्दोलन हो भन्ने बोध गर्न नसक्ता नै संस्कृतिको महŒवपूर्ण पाटोलाई उनीहरूले अधिकांशतः उपेक्षा गरिरहेको  र कम महŒव दिएको पाइन्छ ।

हाम्रो जस्तो शोषकवर्ग र शोषितवर्गमा बा“डिएको समाजमा संस्कृति वर्गीय हुनु स्वाभाविक छ । वर्गीय समाजमा शासकवर्गको संस्कृति प्रभुत्वमा रहन्छ र त्यसले शोषक–शासकवर्गको विचारधारालाई नै मजबुत बनाउने काम गर्दछ । शासकवर्गका विरुद्ध संघर्षरत शक्तिहरूले आÇनो वर्गको विचारधारालाई विकसित गर्न, सम्बद्र्धन गर्न र दरिलो बनाउन आÇनै वर्गीय संस्कृतिको निर्माण गर्नु अत्यावश्यक हुन्छ । त्यसो नगरिए शोषक–शासकवर्गकै संस्कृति अवलम्बन गरिन्छ र त्यसैलाई मलजल पु¥याउने काम हुन्छ । नेपालको कम्युनिस्ट आन्दोलनले यो आधारभूत प्रस्तावनालाई गम्भीरताका साथ आत्मसात् गर्न नसकेको कारण सर्वाड्डमा आÇनै संस्कृति निर्माणमा जति चासो दिनुपथ्र्याे त्यति दिइरहेको छैन । फलतः यो पुरानै संस्कार, आनीबानी तथा आचारव्यवहारमा रङ्मगिइरहेको छ र पुरानै शोषकवर्गको विचारलाई व्यवहारमा बल पु¥याइरहेको छ । यो सर्वथा गलत कुरो हो र यसलाई हटाउन अब ढिलाइ गर्नु हुन्न भन्ने आशयले नै यो गोष्ठी भएको हो । आधारपत्रले त्यही धारणालाई अघि सारेको छ र यस अर्थमा यसको सार्थक महŒव रहेको छ  र रहनेछ भन्ने मलाई लागेको छ ।

हाम्रो थेगो नै बनेको छ – पोलिटिक्स् इन कमान्ड  अर्थात्  सबै कुराहरू राजनीतिको अधीनमा रहनुपर्दछ । वास्तवमा वर्गीय समाजको अस्तित्व रहुन्जेलसम्म यो कुरो एकदमै सही पनि छ । तर यो भन्दा पनि बढी मननीय विषय के हो भने जुन पार्टीले लिनुपर्ने वर्गको दृष्टिकोण अवलम्बन गर्दैन र व्यावहारिक पक्षहरूमा वर्गीय स्वार्थलाई प्राथमिकता दिंने काम गर्दैन भने त्यस्तो राजनीतिको के नै अर्थ रहन्छ र ? यस्तो राजनीतिले त प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष विरोधी वर्गलाई नै फाइदा पु¥याउने हो । नेपालको सन्दर्भमा यस्ता विसंगतिहरू हामीले भोग्नुपरेको यथार्थभित्र नै पर्दछ । एकातिर सर्वहारावर्गको कुरो गर्ने, वर्गीय हितको कुरा गर्ने तर अर्कातिर भने विरोधी वर्गलाई फाइदा पु¥याइरहेको संस्कृतिलाई Çया“क्न, त्यसलाई ध्वंस गर्ने प्रक्रियामा लाग्न र सर्वहारावर्गको वर्गीय हितलाई प्रश्रय दिने संस्कृतिको निर्माण गर्न भने चाहि“दो मात्रामा रुचि नलिने अझ भनौं व्यवहारमा चाहि“ पुरानै चालचलन, बानीबेहोरा, आचारव्यवहारमा अल्मलिइरहने हाम्रो परिपाटी बनिरहेको छ । यो राजनीतिक आन्दोलनकै विसंगतिको परिणाम हो । यसलाई हामी सबैले गम्भीरताका साथ बुझ्ने प्रयत्न गर्नु जरुरी छ । यो भनेको भनाइ र गराइमा एकरूपता नहुनुको परिणाम हो र भनाइ र गराइमा एकरूपताको अभावलाई एक किसिमले पाखण्ड भने पनि हुन्छ । भन्ने एउटा कुरो र गर्ने अर्कै कुरो । हामीले के स्मरण गर्नु आवश्यक छ भने शब्द र कर्मका बीचको अन्तराल प“ूजीवादी नैतिकताको विशेषता हो । हामी पनि त्यही प“ूजीवादी आचरणलाई नै अवलम्बन गर्दछौं भने प“ूजीपतिहरू र हामीमा के फरक रह्यो त ?

सबै कुराहरू राजनीतिको अधीनमा हुनुपर्छ भन्ने धारणालाई व्यवहारमा लागू गर्ने हो भने सर्वप्रथम राजनीतिक आन्दोलनका नेताहरूले अथवा सबै अन्य पक्षलाई आÇनो अधीनमा राख्ने नेतृत्वको अभिभारा लिनुपर्नेहरूले  सांस्कृतिक रूपान्तरणको सवालमा समेत आफूलाई उदाहरणका रूपमा प्रस्तुत गर्नु अत्यावश्यक हुन्छ । अन्यथा उनीहरूको निर्र्देशनको पालना अरूहरूबाट गराउन नसकिने हुन्छ । तर हामीले सामना गर्नुपरिहेको तथ्यचाहि“ अधिकांश राजनेताहरूले नै सांस्कृतिक रूपान्तरणविरोधी क्रियाकलापमा आफूलाई संलग्न गराइरहेका छन् । यो भन्दा नकारात्मक विषय अरू के हुन सक्तछ ?

पोलिटिक्स् इन कमान्ड भन्ने धारणाको गलत बुझाइले अरू सबै पक्ष गौण हुन् , राजनीति सबकुछ हो र यो मात्र महŒवपूर्ण क्षेत्र हो भन्ने नितान्त गलत सोच विकसित हुने स्थिति सृजना गरेको देखि“दैछ । सबैभन्दा महŒवपूर्ण विषय राजनीति, सबैभन्दा ठूलो कुरो राजनीति, सबैभन्दा जान्ने मान्छे राजनीतिक नेता, सबैभन्दा ठूलो मान्छे राजनीतिक नेता । र यसरी सबै मान्छे राजनीतिक नेता तथा नेतृत्वको चाकरी र चाप्लुसीमा रमाउने, त्यसैमा व्यस्त हुने अनि राजनीतिक नेता चाहि“ मख्ख पर्ने र घमण्डले फुल्ने  नराम्रो परिपाटीको विकास भै रहेको देखि“दैछ ।

विश्वइतिहासले देखाएको तथ्यचाहि“ के हो भने राजनीतिक प्रभावलाई दरिलो बनाउन, राजनीतिक आन्दोलन विस्तार गर्न र त्यसलाई स्थायित्व प्रदान गर्न संस्कृतिको अतुलनीय योगदान र भूमिका रहेको हुन्छ । राजनीतिलाई दीर्घजीवी बनाउने काम सधै“ नै संस्कृति र सांस्कृतिक आन्दोलनले गर्दछ । पुरानो राज्ययन्त्रमाथि कब्जा गर्नु मात्र पर्याप्त नहु“दो रहेछ, नया“ व्यक्तित्वनिर्माण र त्यस्तो समाजको निर्माणबिनाको राजनीतिक सत्तामाथिको विजय धेरै दिन सुरक्षित रहन नसक्ने रहेछ भन्ने कुरो सोभियत संघ लगायतका थुप्रै देशहरूको उदाहरणले पुष्टि गरिसकेकै छ । यही कारण हिजोआज कुनै पनि राजनीतिक संघर्ष र आन्दोलन सांस्कृतिक आन्दोलनको अनिवार्य र अविभाज्य अड्ड बन्नैपर्दछ भन्ने आवाज उठ्न थालेको छ । राजनीतिक तयारीको संघर्षको क्रममा सांस्कृतिक संघर्षमाथि विशेष जोड दिइनु त्यसैले आवश्यक छ । यो एक किसिमले राजनीतिक संघर्षको सफलताको पूर्वशर्त हो । यस्तो संघर्ष सांस्कृतिक रूपान्तरणबिना  सफल र दिगो हुन नसक्ने तथ्य पनि स्वतःसिद्ध छ । 

यस सन्दर्भमा ख्याल राख्नुपर्ने अर्काे के पनि छ भने ऐतिहासिक विकास क्रममा एउटा चरणमा पुगेपछि राजनीति अनावश्यक समेत हुने रहेछ । राजनीति राज्यसञ्चालनका निम्ति नभई नहुने विषय हो । तथापि वर्गीय समाजको अन्त भएपछि वा राज्यको विलोप भएपछि राज्यसत्ताजस्ता दमनका साधनहरू स्वतः समाप्त हुन्छन् । हामीलाई माक्र्सवादले दिएको शिक्षा यही नै हो । तर संस्कृतिका अन्य पक्षहरूको महŒव भने त्यसपछि झन् झन् बढ्दछ । संस्कृति यसपछि अझ बढी विकसित हुने अवस्था सृजना हुनु किन स्वाभाविक छ भने त्यतिखेर मानिसका सृजनात्मक योग्यताहरूको सदुपयोग हुने अधिकतम अवसर र परिस्थिति निर्माण हुन्छ र मानिसहरू यसको निर्माणमा पहिलेको भन्दा अत्यधिक मात्रामा संलग्न हुन थाल्दछन् । 

हामीकहा“ पुरानो संस्कार, आनीबानी, चालचलन र नैतिकताजस्ता संस्कृतिका पक्षहरू नफेर्न प्रायः दुइटा कुरामा विशेष जोड दिने गरिएको पाइन्छ । पहिलो तर्क के छ भने संस्कृति अधिरचना हो, आधारमा परिवर्तन भएपछि मात्र अधिरचनामा परिवर्तन आउ“छ । यो बर्नस्टिनजस्ता संस्कृतिलाई आर्थिक क्रियामा परिणत गर्ने आर्थिक भौतिकवादीहरूले धेरै अघिदेखि सार्दै आएको गलत तर्कको पुनरावृत्ति मात्र हो । संस्कृतिको सापेक्ष स्वाधीनतालाई अस्वीकार गर्ने र संस्कृतिलाई अर्थतन्त्रद्वारा प्रत्यक्ष रूपमा र पूर्ण रूपमा निर्धारित मान्ने चिन्तनकै अनुसरण गर्दछ यस सिद्धान्तले । संस्कृति अन्तिम रूपमा अर्थतन्त्रबाट निर्धारित भए पनि यो प्रत्यक्ष र पूर्णतया अर्थतन्त्रबाट निर्धारित ह“ुदैन, यसलाई अन्य थुपै्र कुराले प्रभावित पार्दछन् भन्ने विचारको पक्षपोषण माक्र्सवादीहरूले गर्दछन् । माक्र्सवादका प्रणेता कार्ल माक्र्सले धेरै अघि नै संस्कृति अर्थतन्त्रभन्दा सापेक्ष रूपमा स्वतन्त्र र स्वाधीन हुन्छ भन्ने विचारलाई तथ्यहरूद्वारा प्रमाणित गरिसकेका हुन् । आधार र अधिरचनाका बीच हुने द्वन्दात्मक प्रभावलाई बुझ्न नसक्ता  पनि यस्तो सोचले फल्नेफुल्ने मौका पाउ“छ । आधारले अधिरचनालाई मात्र प्रभाव पार्ने होइन कि अधिरचनाले पनि आधारलाई प्रभाव पार्दछ । संस्कृति ( अधिरचना ) ले अर्थतन्त्र (आधार ) को स्थापनाका लागि समेत महŒवपूर्ण भूमिका निर्वाह गर्न सक्तछ । अधिरचना आधारका तुलनामा अघि वा पछि पर्न सक्तछ, यो आधारको हुबहु प्रतिच्छाया होइन । जसरी गीत, संगीत लगायत साहित्यका क्षेत्रमा  नेपालको प्रगतिवादी साहित्यमा विकास ह“ुदै गएको छ त्यसै गरी संस्कार लगायत नैतिकता र चालचलनका सम्बन्धमा पनि आÇनै संस्कृति निर्माण गर्ने प्रयत्न हुनैपर्दछ ।

पुरानो संस्कृति नफेर्न दिइने गरेको दोस्रो तर्क के छ भने हामीले अवलम्बन गर्ने गरेको संस्कृतिका धेरै पक्षहरू धर्मस“ग गा“सिएका छन् र धर्म व्यक्तिको निजी मामिला हो, त्यसैले यसमा कसैले पनि हस्तक्षेप गर्नु अनुचित हुन्छ, प्रश्रितजीले आधारपत्रको टिप्पणी गर्ने क्रममा अघि यहा“ भनेझैं धर्म अत्यन्त जटिल विषय हो आदि आदि । यी तर्कहरूले पनि विषयलाई सही रूपमा ग्रहण गर्ने प्रयत्न गरेका छैनन् । सर्वहारावर्गको नेतृत्वमा शोषकवर्गको हातबाट राज्यसत्ता खोसेपछि राज्यले नया“ जनवादी समाज र समाजवादको एउटा चरणमा धर्म मान्ने कि नमान्ने सवालमा आम नागरिकहरूलाई आफैं चयन गर्ने स्वतन्त्रता प्रदान गर्दछ र धर्मलाई व्यक्तिको निजी मामिला बनाउ“छ, यो एकदमै सा“चो कुरो हो । तर यसको अर्थ कम्युनिस्टहरू पनि धर्म मान्दछन् र उनीहरूलाई जुनसुकै धर्म मान्ने छुट हुन्छ भन्ने होइन । आधारपत्रले विश्वसर्वहारावर्गका महान् गुरु एवं नेता लेनिनको उद्धरण समेत राखेर यस तथ्यमाथि  सही रूपमा प्रकाश पार्ने काम गरेको छ । तर विडम्बनाको विषय त के भएको छ भने नेपालका कतिपय कम्युनिस्ट नेताहरू कत्ति पनि नहिचकिचाई आÇनो पार्टी धर्म मान्ने पार्टी भएको र संसारमा यस विषयमा आÇनो पार्टी विशिष्ट भएको नितान्त गैरमाक्र्सवादी–लेनिनवादी विचार प्रस्तुत गर्दै हि“डिरहेका छन् । एकातिर आफूले मान्दै आएको दर्शन र विश्वदृष्टिकोण द्वन्दात्मक भौतिकवाद नै हो भनेर छाती पिट्तै पनि हिंड्ने र अर्कातिर द्वन्दात्मक भौतिकवादी विश्वदृष्टिकोण र दर्शनले कही“ कतै कत्ति पनि स्वीकार गर्न नमानेको धर्मको वकालत पनि गर्न नछाड्ने यस्तो परस्परविरोधी विचार एवं व्यवहारका कारणले नै सांस्कृतिक रूपान्तरणको प्रश्नलाई समेत भा“जो हालेको छ र विचारधारात्मक धरातललाई पनि बिगार्ने काम गरिरहेको छ । द्वन्दात्मक भौतिकवाद भनेकै आदर्शवाद र अध्यात्मवादजस्ता विज्ञानविरोधी विचारधाराका विरुद्ध खडा भएको र ईश्वर तथा परमात्मा आदि अलौकिक तथा अदृश्य शक्तिलाई मान्ने विचारहरूस“ग निरन्तर संंघर्ष गर्दै विकसित भएको भौतिकवादी, धर्मविरोधी, निरीश्वरवादी दर्शन हो । त्यसैले आफूप्रति इमानदार रहन र आफूले स्वीकार गरेको विचारधारा र दर्शनमा प्रतिबद्ध रहन  समेत धर्म र ईश्वरको मान्यतालाई बल पु¥याउने सबै किसिमका चाडबाड, संस्कार र रीतिरिवाज धार्मिक विधिविधान अनुसार नमनाउने र तिनको पुर्पक्षका विरुद्ध उभिने काम कम्युनिस्टहरूले नगरी हुंदैन । 

यहा“निर धर्मनिरपेक्षताका सम्बन्धमा पनि हामीहरू एकदमै स्पष्ट हुनु आवश्यक छ । एकथरी विचारकहरू धर्मनिरपेक्षतालाई गलत रूपबाट व्याख्या–विश्लेषण गरेर धार्मिक हुनुको भावमा प्रस्तुत गर्न खोजिरहेका छन् । उनीहरू धर्मनिरपेक्ष हुनु भनेको सर्व–धर्म–समभावको विचारलाई मान्यता दिनु हो भन्ने विचार राख्तछन् ।  सर्व–धर्म–समभावको अर्थ सबै धर्महरूलाई समान रूपले ग्रहण गर्नुपर्दछ भनेको हो । तर व्यवहारमा के हुन्छ भने कसैले कुनै धर्ममाथि आस्था राख्तछ भने उसका निम्ति अरू धर्मभन्दा उसले मानेको धर्म राम्रो र श्रेष्ठ हुनु र अरू धर्महरू त्यो धर्मका तुलनामा तल्लो र नराम्रो हुनु एकदमै स्वाभाविक हुन्छ । त्यसैले सबै धर्मलाई समान भावबाट हेर्ने भनाइ नै सर्वथा गलत छ । दोस्रो कुरो धर्मनिरपेक्षता भनेको धर्मप्रति तटस्थ रहने वा सबै धर्मलाई समान रूपमा लिने भनेको नभएर धर्मको विरोध गर्ने भनेको हो । धार्मिकता र धर्मनिरपेक्षता एकै ठाउ“मा रहन सक्ने विषयहरू होइनन् । यूरोपको आधुनिक इतिहासलाई अलि राम्ररी हेरेको खण्डमा हामी के पाउनेछौं भने धर्मनिरपेक्षतासम्बन्धी विचार प्रत्यक्षतया धर्मको विरोधमा विकसित भएको छ । अर्काे लोकको कल्पनालाई नकार्नु र हामी रहेको यही लोक वा यथार्थलाई यसैका नियमहरूको आधारमा व्याख्या–विश्लेषण गर्नुलाई चिन्तनको इहलोकीकरण ( सेक्युलराइजेशन ) मानिन्छ । यसको अर्थ के हो भने धर्मनिरपेक्षताको धारणा विज्ञान र बुद्धिवादको आधारमा विकसित हुन्छ, यसले अनुभव, तर्क र प्रयोगमाथि जोड दिन्छ र धार्मिक चिन्तनको अबौद्धिक पारलौकिकतालाई निषेध गर्दछ । त्यसैले धर्मनिरपेक्षतालाई धर्महरूको सापेक्ष समानताको रूपमा लिने प्रवृत्ति गलत छ र यस किसिमको चिन्तनबाट हामी सर्वथा मुक्त हुनु आवश्यक छ । तर विडम्बना नेपालका हामी कम्युनिस्ट भनिने कतिपय व्यक्तिहरू अद्यापि यस किसिमको भ्रामक चिन्तनबाट मुक्त हुन सकिरहेका छैनौं । 
     यहा“ हामीले  के हेक्का राख्नु जरुरी छ भने यो गोष्ठी आम जनतालाई दृष्टिगत गरेर होइन कम्युनिस्ट आन्दोलन र त्यसकै वरिपरि रहेका सचेत व्यक्तिहरूलाई लक्ष्यित गरेर आयोजना गरिएको हो । त्यसैले आधारपत्रमा उठाइएका सवालहरूलाई आम जनताले आजैदेखि  व्यवहारमा लागू गर्नुुपर्छ भन्ने किसिमले तर्क गर्नु उचित होइन । आम जनता सचेत र जागरुक भएपछि मात्र सांस्कृतिक रूपान्तरणको प्रश्न अघि बढ्ने हो भनी स्वतस्फूर्तताको पछि दगुर्ने  र समय पर्खेर बस्ने काम पनि एकदमै खराब कुरो हो । सचेत प्रयत्नबिना पुरानो विचार, चालचलन, संस्कार र प्रवृत्तिहरू सहजै फेरिने होइनन् । त्यसका निम्ति लगातार मिहिनेत गर्नु जरुरी हुन्छ र शुरुदेखि नै यस्तो प्रयत्न हुनु आवश्यक छ ।  हामी सबैलाई के थाहा छ भने सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्तिको प्रश्न नै लेनिनले यही तथ्यलाई ध्यान दिएर अघि सार्नु भएको थियो । वर्गसंघर्षका क्रममा आफूभित्र रहेका पुराना विचार, आनीबानी, संस्कार र संस्कृतिलाई रूपान्तर गर्नु आवश्यक छ भन्ने सार कुरो नै सांस्कृतिक क्रान्तिको सन्देश हो । यही कारण नया“ संस्कृतिको निर्माण र आत्मरूपान्तरणका लागि सांस्कृतिक क्रान्तिको विचारलाई हामीले समर्थन जनाउनु परेको हो । सांस्कृतिक क्रान्तिको विरोध गर्ने गलत प्रवृत्ति आन्दोलनमा विद्यमान त छ“दै नै छ, सांस्कृतिक क्रान्तिका पक्षधरहरूले समेत यस सवाललाई ओठे भक्ति मात्र जनाउने गरेको हो कि भन्ने प्रश्न यदा कदा म आफूमा उब्जिरहने किन गर्दछ भने हाम्रो आन्दोलनमा सबैभन्दा तिरस्कार गरिएको विषय नै यही हुने गरेको छ । 

हाम्रो आन्दोलनमा देखिएको वैचारिक अस्पष्टता र यस किसिमको प्रयत्नको अभावले गर्दा नै आज पनि हामीहरू आन्दोलनभित्र नया“ जनवादी संस्कृति अवलम्बन गर्ने कि समाजवादी संस्कृति अपनाउने स्पष्ट हुन सकिरहेका छैनौं । आम जनतामाझ नया“ जनवादी संस्कृतिको विकासमा जोड दिइनुपर्छ र कम्युनिस्ट आन्दोलनभित्र चाहि“ समाजवादी संस्कृतिको अभ्यास हुनुपर्छ भन्ने विचार धेरै अघिदेखि राख्तै आएका श्यामप्रसाद अहिले यस गोष्ठीको मञ्चमा बसिहरहनु भएको तपाईं–हामीले देखिरहेका छांैं । आन्दोलनभित्र नया“ जनवादी संस्कृतिको अभ्यास समेत हुन नसकेको आजको स्थितिमा यो बहस धेरैका निम्ति प्राज्ञिक होला तर आन्दोलनभित्र सांस्कृतिक रूपान्तरणको सवाललाई गम्भीरतका साथ अघि बढाइनुपर्छ भनी यसरी आवाज उठिरहेको सन्दर्भमा यसको उपेक्षा हुनु कत्ति पनि राम्रो कुरो होइन । नया“ जनवादी संस्कृतिको निर्माणको आजको अवधिमा समाजवादी संस्कृतिको अवलम्बन कसरी हुन सक्छ भन्ने विचार वरिष्ट कम्युनिस्ट नेताहरूबाट सुन्ने  गरिएको प्रसङ्गमा यस्तो छलफल व्यापक बनाइनुपर्दछ र यसलाई एकदमै गम्भीरतासाथ छलफलमा लगिनुपर्दछ भन्ने मलाई लागेको छ । 

गोष्ठीमा खगेन्द्र संग्रौलाले नेपालमा उग्र वामपन्थी कम्युनिस्ट पार्टीदेखि चरम दसिणपन्थी कम्युनिस्ट पार्टीसम्मको अस्तित्व रहेको अवस्थामा संस्कृतिको सवालमा तिनका बीच रहेको फरक फरक स्थिति र भिन्नतालाई नकेलाई सबैलाई एउटै डालामा हालेर अति सरल तरीकाले आधारपत्रमा विचार प्रस्तुत गरिएको छ भन्ने किसिमको आÇनो मत यस समारोहमा राख्नुभएको छ । निश्चय पनि आधारपत्रले यो सरल काम नै गरेको छ । आधारपत्रमा विशेष गरी नेपालको कम्युनिस्ट आन्दोलनमा खतराको रूपमा विद्यमान दक्षिणपन्थी अवसरवादका कारण संस्कृतिका क्षेत्रमा ज्वलन्त रूपमा  अघि आएका विषयहरूलाई नै बढी महŒवका साथ प्रस्तुत गर्ने काम भएको छ । निश्चय पनि यो आधारपत्रको सीमा र कमजोरी मान्न सकिन्छ । तर नेपालका कतिपय कम्युनिस्ट पार्टीले नया“ संस्कृतिको निर्माण र सांस्कृतिक रूपान्तरणको सवाललाई विचारका तहमा दक्षिणपन्थी पार्टीका तुलनामा सही दृष्टिकोण अघि सारेको र तुलनात्मक रूपमा बढी महŒव दिएको वस्तुगत यथार्थ ह“ुदाह“ुंदै पनि उनीहरूले समेत व्यावहारिक पक्षमा भने पर्याप्त दृष्टि पु¥याउन नसकेको कटु यथार्थ कसैबाट लुकेको विषय ह“ुदै होइन । तीमध्ये कतिको चिन्तन र व्यवहारमा थुप्रै असंगति पनि नदेखिएका होइनन् । विशेषतः संस्कृतिको सवालमा उग्र वामपन्थी विचारगत त्रुटिबाट सृजित समस्याहरूको सामना पनि हिजोआज हामीले भोगिरहनु परेको छ । यस्ता कमीकमजोरीहरू आधारपत्रमा समावेश हुन सकेका छैनन् ।  आधारपत्रले दक्षिणपन्थबाट सृजित विषयलाई प्राथमिकतामा राखे पनि यहा“ उठाइएको भनाइ र गराइका बीचको अन्तराल भने धेरथोर सबै पार्टीहरूमा रहिआएको खराबी हो भन्ने यथार्थलाई भने हामीले स्वीकार नगरी नहुने स्थिति छ भन्ने मलाई लाग्दछ । उदाहरणका निम्ति व्यक्तिवादको विषयलाई नै उठाउन सकिन्छ । हामीले स्वीकार्दै आएको मान्यता के हो भने व्यक्तिवाद, निजी स्वार्थ, शोषणको लालचा, बैरभाव र प्रतिस्पर्धाको भावना प“ूजीवादी समाजको नैतिकताको सार हो । तर आज हाम्रो आन्दोलनमा प्रचण्डपथदेखि बहुदलीय जनवादसम्म कहा“ देखा परेको छैन व्यक्तिवाद ? पार्टीसंगठनमा दुई महाधिवेशनका बीचमा केन्द्रीय समिति सर्वाेच्च अड्ड हुन्छ भन्ने धारणालाई सबैले स्वीकार गरे पनि हामीकहा“ व्यवहारमा झन्डैजसो महासचिव  एकजना व्यक्तिलाई सर्वाेच्च मान्ने परिपाटी विकसित भैरहेको देखिन्छ– केन्द्रीय समितिभन्दा माथि पोलिटब्यूरो, पोलिट ब्यूरोभन्दा माथि केन्द्रिय कार्यालय र केन्द्रिय कार्यालयभन्दा माथि महासचिव । झट्ट सुन्दा यो कुरो धेरै मित्रहरूलाई अतिशय सरलीकरण गरिएको जस्तो लाग्न सक्छ, तर के व्यवहारले यसैलाई पुष्टि गरेको छैन र ? आधारभूत संगठनात्मक सिद्धान्तका रूपमा हामीले जनवादी केन्द्रियतालाई स्वीकार गरेका छौं । तर यो जनवाद कि अराजकतावादमा फ“सेको कि त केन्द्रियतामा ठिङ्गुरिएको हामीले देखिभोगिरहेकै  छौं । एकातिर चरम दक्षिणपन्थी पार्टीहरू छन् , जहा“ अभिव्यक्तिको स्वतन्त्रताको नाउ“मा जसले जे बोले पनि हुने चरम अराजकता देख्न पाइन्छ भने अर्कातिर क्रान्तिकारी भनिने पार्टीहरूमा लेनिनकै शब्दावलि प्रयोग गर्ने हो भने पनि छलफल र आलोचनाको स्वतन्त्रता के हो कार्यकर्ताहरूले बुझ्न समेत नपाउने स्थिति रहिरहेकै छ । कम्युनिस्ट पाटींलाई हामीले सर्वहारा वर्गको पार्टी भनी व्याख्या–विश्लेषण गर्दै आएका छौं । तर  श्रमजीवीवर्गका सुखदुःखमा सहभागी भएका, तिनीहरूस“ग सा“च्चिकै घुलमिल गरेर काम गरिरहेका र तिनको भावनालाई आत्मसात् गरेर अघि बढिरहेका कति नेता र कार्यकर्ताहरू छन् हाम्रो आन्दोलनमा ? श्रमजीवी जनताका माझ वर्षको एकाध दिन पनि उठबस नगरेका नेताहरूको पार्टी भएको छैन र नेपालको कम्युनिस्ट पार्टी ? जनसेवा र जननीतिको सवालमा पनि भिन्न स्थिति देख्न पाइ“दैन । भन्दा कम्युनिस्टहरू जनताका सेवक हुन् भनी हामी कहिल्यै थाक्तैनौं, तर हाम्रो व्यवहार भने आफूलाई जनताको शासकभन्दा कत्ति पनि तल नठान्ने किसिमकै छ । जनतालाई होच्याउने, गाली गर्ने, तर्साउन,े जबर्जस्ती गर्ने र जनतालाई मुक्ति दिने मुक्तिदाताचाहि“ आफैंलाई सम्झिरहने । अनि कसरी विकसित होओस् अधिकतम भन्दा अधिकतम जनतालाई आÇना पार्टीका क्रियाकलापमा सहभागी बनाउने, उनीहरूलाई आधारित गरी नीतिनिर्णयहरू निर्माण गर्ने र उनीहरूस“गै अघि बढ्ने जननीतिको क्रियान्वयन ? सर्वहारावर्गको वर्गीय संघर्षका हितहरूको अनुमोदन र साम्यवादको प्राप्ति,  साम्यवादी समाजको निर्माण र त्यसको पूर्णत्वको संघर्षले नै समाजवादी नैतिकतालाई निर्धारित गर्दछ । यसै कारणले कम्युनिस्टहरूले सामूहिकवादलाई आÇनो नैतिकताको आधार बनाउने गर्दछन् । आचरणमा समाज र समुदायको सेवा गर्नु, सामाजिक हितहरू र जनताका हितहरूलाई व्यक्तिगत स्वार्थभन्दा माथि राख्नुलाई मुख्य कुराका रूपमा लिने सिद्धान्तलाई सामूहिकवाद भनिन्छ । निजी स्वार्थ र व्यक्तिवादको बोलबालालाई कम गर्ने प्रयत्न प्रभावकारी तरीकाले नचलाइएको स्थितिमा यस्तो समूहवाद हाम्रो आन्दोलनमा कति फेला पर्ला मननीय विषय भएको छ भन्ने मलाई लाग्दछ ।

समाजवादी नैतिकतालाई निर्धारित गर्ने तŒवका रूपमा हामीले लिने गरेका विषयमा इमानदारी , सत्यनिष्ठा, नैतिक शुद्धता, सामाजिक तथा व्यक्तिगत जीवनमा सरलता, विनयशीलता र आडम्बरहीनताका अतिरिक्त अन्याय, आलस्य, छलकपट, निजी स्वार्थ र पदलोलुपताप्रति असहिष्णुताजस्ता विषयहरू पर्दछन् । नैतिक शुद्धताको कुरो  संसदीय क्रियाकलापलाई आÇनो तत्कालको आधारभूत काम ठान्ने पार्टीका नेताहरूका सन्दर्भमा उठाउनु पाखण्ड मात्र ठहरिनेछ, किनभने नैतिकताका दृष्टिले आज सबैभन्दा बढी गनाएका तिनै छन् । नेतृत्व तहका व्यक्तिहरूले एउटै विषयमा फरक फरक मत सार्वजनिक गर्ने, खास विषयमा कहिले एउटा कुरा व्यक्त गर्ने र कहिले अर्कै भनाइ राख्ने, नेताहरूले एउटा कुरो गर्ने र कार्यकर्ताले चाहि“ ठीक त्यसको उल्टो कुरा गर्ने गरेका एमालेदेखि माओवादी पार्टीसम्मका कतिपय घटनाहरूलाई दृष्टिगत गर्ने हो भने इमानदारी र सत्यनिष्ठामा पनि हाम्रो आन्दोलन खरो हुन नसकिरहेको देखिन्छ । सरलता, विनयशीलता र आडम्बरहीनता कम्युनिस्ट आन्दोलनको वर्तमान नेतृत्वका निम्ति विजातीय विषय त होइन मलाई कहिलेकाही“ यस्तो पनि लाग्ने गर्दछ । सबैभन्दा जान्नेबुझ्ने म, म सबैभन्दा ठीक, अरू सबै बेठीक, म आफैं मात्र राम्रो भन्ने जस्ता आडम्बर र घमण्ड भएका नेताहरूको बिगबिगी नेपालको कम्युनिस्ट आन्दोलनमा कम छैन । पदलोलुपताप्रतिको मोह पनि समाजवादी नैतिकताका विपरीत हामीमा पर्याप्त रहिरहेकै छ । सिद्धान्तका विपरीत भएका यस्ता आचरणहरूको लामो सूचि खडा गर्न सकिन्छ । मैले यो विषय कम्युनिस्ट आन्दोलनलाई पत्रु साबित गर्न नभएर यसले संस्कृतिका क्षेत्रमा पु¥याउनुपर्ने सावधानीलाई इंगित गर्न र नेपालमा भएका कम्युनिस्ट पार्टीहरू सबैले सांस्कृतिक रूपान्तरणको प्रश्नलाई अत्यन्त सावधानीका साथ अगाडि बढाउनुपर्ने आवश्यकता बोध गराउनका निम्ति मात्र उठाएको ह“ु ।

सांस्कृतिक रूपान्तरणको सवाललाई बौद्धिक एवं व्यावहारिक प्रक्रियाका क्रममा मात्र सही किसिमले हल गर्न सकिन्छ । विचारका तहमा सांस्कृतिक रूपान्तरणको सवाललाई अत्यन्त महŒवका साथ उठाउने तर त्यसको एक मात्र सही उपाय मानिएको वर्गसंघर्षमा चाहि“ सहभागी नहुने एउटा गलत प्रवृत्ति पनि नेपालमा देखा पर्दछ । नेपालको आर्थिक–राजनीतिक अवस्थालाई परिवर्तन गर्ने संघर्षमा क्रियाशील भएर मात्र सांस्कृतिक रूपान्तरणको समस्या समाधान हुन सक्तछ भन्ने तथ्यलाई हामीले गम्भीरताका साथ मनन गर्नैपर्दछ । माक्र्सवादको यो एउटा अति महŒवपूर्ण प्रस्थापना हो ।

म स्वयं आधारपत्र तयार गर्ने समितिमा रहेको र त्यसमा भएका छलफललाई नै विशेषतया आधारित गरी आधारपत्र बनाइएको ह“ुदा आधारपत्रका बारेमा अलोेचनात्मक रूपमा आÇना मतहरू राख्नु म उचित ठान्दिन । केसम्म भन्नु चाहि उपयुक्त नै होला भने त्यहा“ भएका छलफलहरूलाई भाषागत लगायत विभिन्न कारणले गर्दा समुचित रूपमा राख्नमा केही कमीकमजोरीहरू भने अद्यापि रहेकै छन् । तथापि यो आधारपत्र तयार गर्नमा विशेष रुचि लिनु भएकोमा हामी सबैले संयोजक साथीलाई र यो गोष्ठी आयोजना गर्नमा विशेष चासो र पहल लिने टेकनाथ बराललाई धन्यवाद दिनैपर्दछ ।
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सांस्कृतिक आन्दोलनमा अवसरवाद
–बदरूद्दीन उमर 
बंगलादेशको अर्थनीति तथा राजनीतिको क्षेत्रमा जुन अनुशासनहीन्ता, अराजकता तथा अवसरवाद आज अति सजिलैगरी देखिने गर्दछ, त्यसको प्रभाव यस देशको संस्कृतिमा पनि पर्याप्त प्रबल छ।यही कारण बाम तथा दक्षिणपन्थी मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी तथा सांस्कृतिक कार्यकर्ताहरूको दृष्टिकोण र कार्यशैली आदिमा पनि त्यो अनुशासनहीनता, अराजकता तथा अवसरवाद हाल ज्यादै व्यापक रूपमा देखिने गर्दछ।
कुनै पनि समाजको मुनष्यको सांस्कृतिक जीवन उसको जीविका अर्जित गर्ने पद्धति र आर्थिक जीवनसित पूर्णतः गाँसिएको हुन्छ। यस दृष्टिले बंगलादेश पनि अपवाद छैन।यसैले सांस्कृतिक क्षेत्रमा जुन व्यापक अराजकतावाद तथा अवसरवाद हामी पाउँछौं। त्यकसो चरित्र सही तरिकाबाट बुझ्न मध्यमवर्ग वा बुर्जुवा वर्गको आर्थिक कर्मकान्डका महत्वपूर्ण पक्षका बारेमा परिचित हुन आवश्यक हुन्छ।
यस प्रसंगमा सर्वप्रथम विचार गर्नुपर्ने कुरो के भने बंगलादेशको वर्तमान समयका धनी वर्ग यिनीहरू बुर्जुवा वर्गको माथिल्लो हिस्सा हुन्–जसरी आफ्नो धनसम्पत्ति कमाएको छ र कमाइरहेको छ, त्यसको हात शोषणसँग भन्दा बढी लुटपाटसित सम्पर्क छ। हाम्रो देशका धनी मानिसहरू वास्तुतः धनसम्पत्ति लुटपाटको माध्यमबाट तीब्र गतिमा कमाउन जति रूचि राख्दछन्, त्यति रूचि अनुशासित कुनै शोषण प्रक्रियाको माध्यमबाट धन आर्जित गर्न पटक्कै राख्दैनन्। १९७२ देखि लुटपाटको माध्यमबाट धनसम्पदा हासिल गर्न शुरू भएको प्रक्रिया आज पनि कायम छ। यसैले उद्योग, कलकारखाना सही ढंगले खडा गर्ने, सामान्यतया बुर्जुवा परिपार्टीबाट व्यवसायिक नियम, कानुन अनुसार नाफा कमाउने आदि नगरी उनीहरू आयात निर्यातका क्षेत्रमा व्यापक चोरी तथा तिकडम, तस्कर व्यापार बजार नियन्त्रणको माध्यमबाट अत्यधिक लाभ बटुल्ने आदि बाटोबाट नै धन कमाएर रातारात मोटाघाटा हुँदैछन् वा हुने प्रयास गरिरहेका छन्। यो रूझान कति व्यापक रूपबाट समाजमा फैलिएको छ भने माथिदेखि तलसम्म हरेक स्तरमा नै यही एउटा प्रक्रियाको माध्यमबाट धन कमाउने आकांक्षा तथा प्रयास हेर्न लायक छ। यसको फलस्वरूप अर्थनीतिको क्षेत्रमा जे भइरहेको छ, त्यो के भने उद्योगका मालिक औद्योगिक विकास गर्न सक्षम नभए तापनि रातारात आर्थिक स्थितिमा भौतिक उन्नति गर्नमा सक्षम भइरहेका छन् र यसको फलस्वरूप पूरै अर्थव्यवस्थालाई संकटमा पुर्‍याईरहेका छन्।
कुनै पनि सुसंगठित शोषण व्यवस्थामा उद्योगपति तथा व्यवसायी मानिसहरूको धनसंग्रह शोषणको माध्यमबाट हुन्छ र यसैको फलस्वरूप उद्योग तथा अर्थव्यवस्थाको पनि विकास हुन्छ। छिमेकी देश भारतमा बिडला, टाटा आदि औद्योगिक परिवारहरूले पनि यसैगरी धनसम्पत्ति कमाएका छन्। तर बंगलादेशका उद्योगपतिहरूको धनी हुने प्रक्रिया उद्योगलाई नष्ट गर्ने माध्यमबाट नै अघि बढेको छ। त्यसैले यहाँ उद्योग विकसित नभएर पनि उद्योगपतिहरू धनी हुनमा कुनै बाधा छैन र करोडौं करोड रूपैयाँ कमाएर उनीहरू धनी पनि भइरहेका छन्।
माथिल्लोस्तरमा जुन रूझान तथा प्रक्रिया जारी छ, त्यही तल पनि हेर्न योग्य छ। अतः त्यहाँ पनि अर्थ उपार्जनका क्षेत्रमा स्थापित रीतिरिवाज, नियमकानुन आज बचेका छैनन्। चोरी, भ्रष्टाचार आदिको व्यापक प्रसार देखेर नै यस विषयमा शंका गर्ने ठाउँ बाँकी रहँदैन। यस अतिरिक्त आर्थिक संकट जतिजति गहिरो हुँदै गइरहेको छ, सरसामानको भाउ त्यत्तिकै बढिरहेको छ र जीविका जति अनिश्चित भइरहेको छ, त्यत्तिकै बढिरहेको छ र जीविका जति अनिश्चित भइरहेको छ, त्यत्तिकै मानिसहरू चोरी भ्रष्टाचारलाई आडभरोसाका रूपमा समातिरहेका छन्। यो परिस्थितिमा अवसरवाद–जुन एउटा शक्तिशाली रूझानको रूपमा सम्पूर्ण समाजमा स्थापित रहनेछ–स्वभाविक छ।
जीवनको यो आर्थिक आधार र चिन्तनको रूझानले सांस्कृतिक जीवनलाई गहिरोसँग प्रभावित र नियन्त्रित गर्नेछ, यसमा विस्मित हुनुपर्ने कुनै कुरो छैन। बंगलादेशमा संस्कृतिको क्षेत्रमा जुन परिस्थितिहरू आज विद्यमान छन्, तिनमा यो स्वाभाविक विषय आज सजिलैसित हेर्नयोग्य छ।
माथि बंगलादेशका बुर्जुवा वर्गमा सम्मिलित मानिसहरूको जुन चरित्र उल्लेख गरिएकोछ, त्यसभित्र अवसरवाद नै सांस्कृतिक क्षेत्रमा सबैभन्दा बढी प्रासंगिक हुन्छ। किनभने यहाँ सिधै चोरी, भ्रष्टाचार, लुटपाटको कुनै स्थान छैन। अवसर छ आत्मविक्रयको र यही आत्मविक्रयको बाटो हो। यही बाटोबाट नै वर्तमान बंगलादेशका मध्यमवर्गको विपुल एवं अधिकतर सांस्कृतिक कार्यकर्ताहरूको पदयात्रा जारी छ।
अनुभवबाट पुष्टि हुन्छ यस देशका कवि, साहित्यकार, नाट्यकार, चित्रकार, संगीतकार आदि सांस्कृतिक कार्यकर्ताहरूमा कलात्मक शक्तिको अभाव पटक्कै छैन। तर फेरि पनि वास्तविक क्षेत्रमा प्रचलित धराका रूपमा कला, साहित्य चर्चामा खासगरी जुन मुख्य धारा बनेको छ, त्यसमा यो सामर्थ्यको कुनै प्रकाश तथा साक्षात् सामान्यता देखिंदैन।यसको कारण अवसरवादमा नै खेाज्नुपर्ने हुन्छ।
कुनै पनि कलाकारको क्षमता जति नै किन नहोस्, उसमा इमानदारी र प्रतिबद्धताको अभाव हुने बित्तिकै उसको क्षमताको विकास कहिल्यै सटीक र सही रूपमबाट हुन सक्दैन। किनभने कलाकारको क्षमताले जहाँ उसलाई लैजान चाहन्छ, इमान्दारी र प्रतिबद्धताको कमीले त्यसबाटोमा बाधाहरू, यहाँसम्म कि अलंघनीय बाधाहरू खडा गर्दछ। त्यसैले जीवनमा त्यस्तो कुनै ल73यप्रति समर्पित नहुने कलाकार, साहित्यकार वा अन्य कुनै बुद्धिजीवी ल73य हासिल गर्ने मार्गमा कलाकार, साहित्यकारका रूपमा आफ्नो शक्तिले बाधा उपस्थित गरेको अवस्थामा त्यस सामु झुक्न बाध्य हुन्छन्। आजको बंगलादेशमा मध्यमवर्गका बुद्धिजीवी कलाकार, साहित्यकारहरू जीविका तथा धनोपार्जनको एउटा प्राणान्तकारी प्रयासमा लागेका छन् र यही कारण उनीहरूले कला साहित्य तथा बुद्धिका चर्चालाई धेरैजसो यसको अधीन राखेका छन्। यसको अपवाद छैन भन्ने कुरो होइन, तर अधिकतर यसै धाराका अन्तर्गत छन्। अर्थात् यस क्षेत्रमा यो नै मुख्य धारा हो।
पहिले नै भनिसकेको छु, बंगलादेशका सांस्कृतिक कार्यकर्ताहरूमा कलात्मक शक्तिको अभाव छैन।यस शक्तिसँग साक्षात्कार बेलाबेलामा अकास्मात् कुनै काव्यग्रन्थ, नाटक, कथा, कविता वा चित्रमा हुन्छ। तर कलाशक्तिका यी सम्पूर्ण अभिव्यक्तिहरू कुनै नीतिमाथि स्थापित छैनन्। कलाकारहरूमा अन्तर्निहित सामर्थ्यको बलमा नै कहिलेकाहीं तिनमा यी सम्पूर्ण अपवाद देखिन्छन्।
बामपन्थी नामबाट परिचित एक किसिमका बुद्धिजीवी आन्दोलनको कुरा गर्छन् र एउटा अर्कै किसिमको सांस्कृतिक आन्दोलनसित जोडिइरहन्छन् वा जोडिइरहने प्रयत्न गर्दछन्। किनभने यिनका विपुल बहुसंख्यक मूलतः उपरोक्त मध्यमवर्गका भाग हुन र तिनैका सरह एउटै रूझानको अधिन हुन्छन्। त्यसैले यस किसिमका “वामपन्थी” कलाकार, साहित्यकार, बुद्धिजीवी मासिनहरू पनि इमानदारीर दृढ प्रतिबद्धताका आधारमा कुनै सांस्कृति कआन्दोलन सृष्टि गर्न अथवा संचालन गर्न कुनै सक्रिय भूमिका खेल्न सक्दैनन्।
सन् १९५४ मा युक्त फ्रन्ट(संयुक्त मोचा) को चुनावको विजयपछि ढाकामा जुन सांस्कृति कसम्मेलन भयो, त्यसमा पश्चिम बंगालबाट आएका सम्पूर्ण प्रतिनिधिहरूमध्ये कला, साहित्यिक मनोज बसु पनि थिए। एउटा सम्बोधन सभामा उनले के भने भने उनको कुनै कथा फिल्ममा उपयोग हुनु भन्दा अघि उनी जति स्वतन्त्रतासित र खुला मनले लेख्न पाउँथे पछि त्यस्तो सम्भव भएन। किनभने लेख्न वस्ता कथठा पर्दामा उतार्दा कस्तो लाग्ला भने बारम्बार आइरहन्छ अर्थात् यहाँ फिल्मी पर्दाको चमकले उनको कला, साहित्यलाई प्रभावित गर्दछ। आजका बुर्जुवा कला, साहित्यकारहरूको वर्तमान अवस्थालाई यस किसिमको रूझानको माध्यमबाट नै धेरै सीमासम्म व्याख्यायित गर्न सकिन्छ। किनभने दक्षिण वा बाम कुनै किसिमका बुर्जुवा नै तिनीहरू किन नहुन् किसिम किसिमका पुरस्कार तथा प्राप्तियोगको सम्भावनाबाट निनहिरू सधै नै ढलुलुल र व्याकुलप्राण रहन्छन्। रेडियो, टेलिभिजन प्रोग्रामले कला, साहित्य, भावनालाई लगभग ढाकिरहन्छन् र मनोज बसुको सिने पर्दा झैं प्रथमोक्त भावनाहरूले द्वितीयोक्त भावनाहरूलाई आफ्नो वशमा राख्दछन्। ठीक यही कारणबाट नै वामपन्थी बुद्धिजीवी र कला, साहित्यकारसित दषिणपन्थीहरूकोृ कार्यक्षेत्रमा कुनै सीमारेखा खिच्न सम्भव हुँदैन। यही कारण वामपन्थी वा प्रगतिशलि भन्ााले तिनीहरू नै बुझन्छन्, जसले आफ्ना मानिसहरूलाई त्यही किसिमको साम्य राखेर केही छिटपुट कुराकानी गरिरहन्छन्।
प्रगतिशील जनवादी तथा क्रान्तिकारी आन्दोलन वास्तवमा सैद्धान्तिक आन्दोलन वा संग्रामको एक संप्रसारित रूप हो। दोस्रो शब्दमा के भन्न सकिन्छ भने जनतामा सैद्धान्तिक संग्राम फैलाउनुको दोस्रो नाम हो –सांस्कृतिक आन्दोलन। जनताका शत्रु, दक्षिणपन्थी तथा प्रतिक्रियाशील बुर्जुवा व्यक्तिहरू र तिनका रक्षक तथा पिठ्ठु साम्राज्यवादी शक्तिहरू जनताका बीचमा पत्रपत्रिका, टेलिभिजन, नाटक, जात्रा, सिनेमा इत्यादिको माध्यमबाट जुन प्रचार गर्दछन्, जनताका माझ जुन अवास्तविक तथा उनीहरूका हितका विरूद्ध आशा आकांक्षा उत्पन्न गरेर उनहिरूलाई संग्रामविमुख बनाइराख्ने प्रयत्न गर्दछन्, त्यसका विरूद्ध आन्दोलन संगठित गर्नुको नाम नै हो–जनवादी तथा क्रान्तिकारी सांस्कृतिक आन्दोलन। त्यसैले यस क्षेत्रमा यस आन्दोलनको निर्धारित सैद्धान्तिक आधार नहुने हो, यदि यो एउटा गहिरो तथा व्यापक सैद्धान्तिक संग्रामको अ)ग नबन्ने हो भने त यो सही ढंगबाट संचालित हुन सक्दैन वा अड्न सक्दैन। यही कारण वतृमान बंगलादेशमा प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलनमा जुन शक्तिहीनता दैन्यदशा तथा दिशाहीनता, हामी पाउँछौं त्यसको मूल कारण हो सैद्धान्तिक संग्रामको शक्तिहीनता, दैन्य दशा वा यिनको वास्तविक उपस्थितिको अभाव।
बंगलादेशका वामपन्थीहरू मुखले ज्यादै ठूलाठूला क्रान्तिकारी कुराकानी गर्ने गर्छन् तापनि उनीहरूको वास्तविक कार्यकलाप विभिन्न अवसरवादी सोचविचारबाट नियन्त्रित तथा संचालित छन्। यसैले गर्दा एकातिर जसरी उनीहरूमा क्रान्तिकारी सैद्धान्तिक चर्चा, मार्क्सवादी, लेनिनवादी सैद्धान्तिक चर्चा जस्तो केही पनि छैन, त्यसरी नै कुने सांस्कृतिक आन्दोलनको सही सोचविचार वा त्यस क्षेत्रमा सक्रियता छैन।
कुनै आन्दोलन संगठित गर्नु एक वा केही व्यक्तिहरूको काम होइन। एक मुठ्ठीभर मानिसहरूले आन्दोलन शुरू गर्न त सक्दछन्, त्यसको विकास हुन र त्यो शक्तिशाली हुन चाहिं धेरैकोस्किय सहभागिता निर्भर गर्दछ। अतः एक आन्दोलनलाई धेरै मानिसहरूले त्यसमा भाग लिन र स्कित्रय हुन पाउनेगरी संगठित गर्नु आवश्यक हुन्छ।
तर यस्तो किसिमको आन्दोलन संगठित गदैृ गएर मात्र वापमन्थी संगठनहरूका सामु मनोज बसु कथित सिनेमाको पर्दा हल्लन्छ। मन्त्रीत्वको सपना, रेडियो, टेलिभिजन कार्यक्रमको सपना र विभिन्न किसिमका “अपूर्व” सबै सपना उनीहरूको सोचलाई ढाकेर अन्य चेतनालाई मोहाविष्ट गर्दछन् र उनीहरू सामयिक क्रान्तिकारी उत्तेजनावश यसो कहिलेकाहीं केही गरेर पनि पछि “तर्कसंगत” संयत भाव धारण गर्दछन्।
यस किसिमका बामपन्थी सही सैद्धान्तिक संघर्षबाट डराउँछन्, किनभने सैद्धान्तिक संग्रामको माध्यमबाट नै उनीहरूको मुखुन्डो उत्रन सम्भव छ र वास्तवमा त्यो उत्रन्छ पनि।यसैले मुखले मार्क्सवाद, लेनिनवादको कुरो धेरै व्यक्तिहरूले गर्छन् तापनि तिनीहरू अपरिहार्य सैद्धान्तिक संग्रामका विरूद्ध ज्यादै नै मुखर र सक्रिय छन्। हाम्रा नाम चलेका वामपन्थीहरू जो कोहीबाट सांस्कृतिक आन्दोलन संगठित गर्नु सम्भव हुँदैन। यही सम्भवतः यसको मुलकारण हो। किनभने अघि नै भनिसकेको छु। सांस्कृ.तिक आन्दोलन वास्तवमा सैद्धान्तिक आन्दोलनको एक खास रूप हो र त्यसको अविभाजित अंग हो।
बंगलादेशमा सांस्कृतिक आन्दोलनको आवश्यकता आज पहिले भन्दा ज्यादै बढी अनुभव गरिंदैछ र यसबारे नयाँ ढंगबाट सोचविचार शुरू भएको छ। यस क्षेत्रमा ख्याल गर्नुर्प्ने कुरा के छ भने सांस्कृतिक आन्दोलनलाई अवसरवादको मार्गबाट हटाएर राख्नका निम्ति त्यसलाई प्रगतिशी, जनवादी तथा क्रान्तिकारी सैद्धान्तिक संग्रामको आधारमा नै स्थापित गर्नुपर्नेछ। यसरी सांस्कृतिक आनदोलनलाई समाज परिवर्तन गर्ने एउटा व्यापक संग्रामको अंगको रूपमा खडा गर्न नसक्दा नयाँ तरिकाबाट आन्दोलन खडा नर्ग किन कोशिस नगर्ने? यसो नगर्ने हो भने सांस्कृतिक आन्दोलनलाई बुर्जुवा वर्गको प्रभावबाट मुक्त राखेर सही परिणतितिर लैजान असम्भव हुनेछ। अरू थोरै दिनभित्र नै यस किसिमको आन्दोलनका नेता आत्मविक्रित भएर पहिलेकै जस्तो भविष्यमा पनि आन्दोलनलाई सखाप पार्नेछन्। यो कथा साहित्य आन्दोलन, नाट्य आनदोलन, कथा आन्दोलन आदि प्रत्येक किसिमका आन्दोलन,का क्षेत्रमा फरक फरक ढंगले जसरी सत्य छ त्यसरी नै त्यस किसिमको सांस्कृतिक आनदोलनका क्षेत्रमा पनि साँचो छ, जुन सामूहिक रूपमा देशमा जनवादी तथा क्रान्तिकारी संग्रामको एउटा सहायक शक्तिका रूपमा गठित र संचालित हुन चाहन्छ।
(वेदना  ६०–६१ बाट)
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सांस्कृतिक रूपान्तरणको आवश्यकता र दिशा

- चैतन्य
गोष्ठीको विषय महत्वपूर्ण, सामयिक र विशिष्ट प्रकारको रहेको छ । विषयवस्तुबारे छलफलको प्रक्रियामा संस्कृतिसंबन्धी अवधारणा, नेपाली समाजको वर्तमान सांस्कृतिक अवस्था, सांस्कृतिक रूपान्तरणको आवश्यकता, सांस्कृतिक रूपान्तरणको दिशा, सांस्कृतिक आन्दोलनमा रहेका कमी तथा सीमा जस्ता विषयहरूबारे विवेचना गर्न आवश्यक देखिन्छ । यस सन्दर्भमा संक्षिप्त रूपमा चर्चा गर्ने प्रयास गरिएको छ ।

१– संस्कृति संबन्धी सामान्य अवधारणाः

संस्कृति सम्बन्धी अवधारणाको चर्चा गर्दा सैद्धान्तिकः रूपमा उल्लेख गर्नसकिने र गर्नुपर्ने कुराहरू धेरै छन् । यहा“ यी सबै कुराबारे लामो बहसमा जान अहिले सम्भव छैन । यस सन्दर्भमा हामीले तत्काल ध्यानदिनु पर्ने कुरा मूलतः यी हुन् ः
(क) मानिसद्वारा श्रमप्रक्रियाका बीचबाट प्रकृतिमाथि विजय प्राप्तगर्दै उत्पादन तथा कलामूलक गतिविधिहरूलाई अगाडि बढाउने प्रक्रियामा संस्कृतिको सृष्टि हुन्छ । संस्कृति प्रकृति र जीवनको पुुनःसृजनसंग जोडिएको छ । संस्कृतिलाई मानवीय गतिविधिमा आधारित सामाजिक तथा ऐतिहासिक परिघटनाका रूपमा ग्रहण गर्न सकिन्छ ।

(ख) संस्कृतिको वास्तविक अध्ययन उत्पादक शक्ति र उत्पादन संबन्ध तथा आधार र उपरिसंरचनाका बीच द्वन्द्वात्मक एकत्वको ज्ञानमा आधारित रहेको छ । संस्कृति उपरिसंरचना अन्तर्गत पर्दछ । संस्कृति दुई प्रकारका हुन्छन् – भौतिक र आत्मिक । भौतिक संस्कृति अन्र्तगत उत्पादनका औजार, प्रविधि, मानव निर्मित दैनिक प्रयोग र उपभोगका सामग्री आदि आउ“छन् । आत्मिक संस्कृति भित्र विचार, चेतना, दर्शन , नैतिकता, मूल्य, आचरण, रितिरिवाज, आस्था, प्रथा, चालचलन, कला, विज्ञान आदि पर्दछन् । आत्मिक संस्कृतिको विकासको आधार एवम् स्रोत भौतिक संस्कृति हो र आत्मिक संस्कृतिले पनि भौतिक संस्कृितको निर्माणमा महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह गर्दछ । संस्कृतिलाई भौतिक तथा आत्मिक मूल्यको संश्लिष्ट अवधारणाका रूपमा परिभाषित गर्न सकिन्छ ।

(ग) कुनै वस्तुको उत्पादन, रचना, विन्यास र सजावटमा व्यक्त सिप, योग्यता र ज्ञानमा संस्कृतिको स्तर प्रकट हुने गर्दछ । साथै, संस्कृतिको स्तर मानिसको चिन्तन, आचार र व्यवहारमा पनि अभिव्यक्त हुन्छ । मूलतः समाजको विकासको स्तरसंगै संस्कृतिको स्तरमा पनि विकास हुने गर्दछ ।

(घ) संस्कृति एक सार्वभौम सामाजिक अवधारणा हो । परन्तु प्रत्येक समाज र सामाजिक समूहका विशिष्ट सांस्कृतिक पहिचान पनि हुने गर्दछन् । वर्गसमाजमा संस्कृतिको स्वरूप वर्गीय हुन्छ । जुन समाजमा जुन वर्गको प्रभुत्व छ त्यो समाजमा त्यसै वर्गको संस्कृति प्रभुत्वशाली रहेको हुन्छ । दासयुगदेखि सामन्तवादी युग हु“दै पु“जीवादी युगसम्म आउ“दा हरेक युगमा उत्पीडक र उत्पीडित वर्गका संस्कृतिबीच निरन्तर सघर्ष चल्दै आएको छ । विभिन्न देशमा सम्पन्न समाजवादी क्रान्तिले यो संघर्षलाई उत्कर्षमा पु¥याउने काम गरेको छ । यसै संघर्षका बीचबाट सांस्कृतिक रूपान्तरणको प्रक्रिया अगाडि बढ्दै आएको छ ।
(ङ) पु“जीवादी, साम्राज्यवादी वा आधुनिकतावादी मान्यता अनुसार संस्कृतिलाई दुई भागमा विभाजित गरिएको हुन्छ – उच्च संस्कृति र भीड संस्कृति । उनीहरूका दृष्टिमा उच्च संस्कृति भनेको कुलीन, सम्भ्रान्त तथा उच्च वर्गका व्यक्तिहरूको संस्कृति हो र यो सभ्य, समुन्नत तथा उन्नत स्तरको हुन्छ । उनीहरूका दृष्टिमा भीड संस्कृति भनेको सामान्य तहका तल्लो वर्गका जनताको संस्कृति हो । उनीहरू यस्तो संस्कृतिलाई असभ्य संस्कृति पनि भन्ने गर्दछन् । यो उपभोक्तावादी मान्यतामा आधारित छ । वास्तविक कुरा केहो भने शोषक र उत्पीडक वर्गद्वारा जनतालाई क्रान्ति तथा मुक्तिका आदर्शबाट विमुख तुल्याउन र शोषण उत्पीडनको जालमा फ“साइराख्नका लागि भीड संस्कृतिको अवधारणा ल्याइएको हो ।

संस्कृतिले उद्योगको रूप धारण गरेको, विद्युतीय प्रविधि तथा सूचना संचारका क्षेत्रमा अपूर्व क्रान्ति भएको र भूमण्डलीकरणको प्रक्रिया तीव्र रूपमा बढ्दै गएको वर्तमान विश्वमा सांस्कृतिक साम्राज्यवादको हैकम कायम भएको छ । त्यसको वैचारिक प्रतिनिधिका रूपमा उत्तरआधुनिकतावादले सांस्कृतिक वर्णसंकरता, उपभोक्तावाद र विघटित मूल्यचेतनालाई प्रश्रय दिइरहेको छ ।

(च) हरेक समाजमा मानिसका सांस्कृतिक आवश्यकता, उद्देश्य तथा आदर्श हुने गर्दछन् र तिनको परिपूर्ति वा प्राप्तिका लागि रचनात्मक गतिविधि र आवश्यक कर्म गर्न जरुरी हुन्छ । यी सबै मानवीय जीवन मूल्य वा सांस्कृतिक मूल्यबोधसंग संबन्धित छन् । सत्यम्, शिवम्, सन्दरम् सर्वोच्च सांस्कृतिक मूल्य हुन् । उन्नत सांस्कृतिक आवश्यकता, उद्देश्य वा आदर्श यिनै सर्वोच्च सांस्कृतिक मूल्यमा आधारित रहेका हुन्छन् । सांस्कृतिक रूपान्तरणको प्रक्रिया विभिन्न प्रकारका संघर्ष र नया“ सांस्कृतिक मूल्यबोधका बीचबाट सम्पन्न हुने गर्दछ ।
(छ) सांस्कृतिक रूपान्तरणको कुरा गर्दा एकातिर पुरानोको ध्वंश तथा नया“ को निर्माण गर्ने मान्यतालाई दृढतापूर्वक अवलम्बन गर्नुपर्दछ भने अर्कोतिर देशको राष्ट्रिय तथा विश्व संस्कृतिद्वारा सिर्जित उत्कृष्ट मूल्य मान्यताहरूलाई अँगाल्न आवश्यक छ । विश्व संस्कृति र सांस्कृतिक आन्दोलनको इतिहासमा रुस, चीन लगायतका देशमा सम्पन्न क्रान्तिहरू र मुख्यतः महान् सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्तिका अनुभवहरूबाट आवश्यक पाठ सिक्दै तथा नेपालको विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितिमाथि समेत ध्यान दिंदै सांस्कृतिक रूपान्तरणको दिशामा अगाडि बढ्नेबारे गम्भीर बन्न जरुरी छ ।

२– वर्तमान सांस्कृतिक अवस्था

नेपाल अद्र्धसामान्ती तथा अर्धऔपनिवेशिक अवस्थामा आधारित बहुजातीय, बहुभाषिक, बहुधार्मिक तथा बहुसांस्कृतिक मुलुक हो । नेपालमा लामो समयदेखि एकातिर जनविरोधी, अराष्ट्रिय तथा अवैज्ञानिक संस्कृति र अर्कोतिर जनवादी, राष्ट्रिय तथा वैज्ञानिक संस्कृतिका बीचमा निरन्तर संघर्ष चल्दै आएको छ । राज्यसत्तामा सामन्त, नोकरशाह एवम् दलाल पु“जीपति वर्गको हैकम चल्दै आएकोले नेपाली जनता वर्गीय, जातीय, क्षेत्रीय, लै¨िक तथा जातव्यवस्थामा आधारित आर्थिक, राजनीेतिक र सांस्कृतिक उत्पीडनको शिकार हु“दैआएका छन् । साथै, नेपाल यस प्रकारका उत्पीडनका विरुद्ध जनसंघर्ष, जनआन्दोलन र वर्गसंघर्षका साथै सशस्त्र संघर्षको प्रक्रियाका बीचबाट पनि अगाडि बढ्दै आएको छ । यस सन्दर्भमा दशवर्षको महान् जनयुद्ध र उन्नीस दिने ऐतिहासिक जनआन्दोलन विशेष उल्लेखनीय रहेका छन् ।
विभिन्न प्रकारका जनसंघर्ष, वर्गसंघर्ष र जनयुद्धको प्रक्रियामा साहित्य र कलाको क्षेत्रमा एकातिर आभिजात्यवाद तथा आधुनिकतावाद विस्थापित हु“दै गएको र अर्कोतिर प्रगतिशील, जनवादी तथा प्रगतिवादी धारा स्थापित हु“दै आएको पाइन्छ ।
महान् जनयुद्ध र ऐतिहासिक जनआन्दोलनको परिणामस्वरूप अहिले देशमा राजतन्त्रको अन्त भई संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रको स्थापना भएको छ । नेपाल हिन्दुराज्यबाट धर्मनिरपेक्ष राज्यमा रूपान्तरित भएको छ । संविधानसभाको निर्वाचन पश्चात् अहिले नेकपा(माओवादी)को नेतृत्वमा संयुक्त सरकार बनेको छ । देश यो बेला शान्तिप्रक्रियालाई तार्किक निष्कर्षमा पु¥याउने, नया“ आधारमा राज्यको पुनःसंरचना गर्ने र नया“ जनसंविधान निर्माण गर्ने प्रक्रियामा अगाडि बढिरहेको छ ।
विभिन्न प्रकारका ऐतिहासिक संघर्षका बीचबाट आज देशमा उत्पीडित वर्ग, जात, जाति, लि¨ र तप्काका जनतामा नया“ जागृति र चेतनाका लहरहरू तुफानी वेगमा विकसित ह“ुदै आएका छन् । पुराना सांस्कृतिक मूल्यहरूको विघटन र नया“ सांस्कृतिक मूल्यहरूको संघटनको प्रक्रिया तीव्र गतिमा विकसित हु“दै गैरहेकोछ ।
निरंकुश पञ्चायतकालीन नेपालमा एक भाषा , एक धर्म र एक भेषको सामन्तवादी मान्यताले उत्कर्ष प्राप्त ग¥यो र २०४७ सालमा बहुदलको पुनःस्थापना भएयता पनि त्यो मान्यता कायमै र≈यो । परन्तु , नेकपा(माओवादी)द्वारा संचालित महान् जनयुद्धले त्यसप्रकारको मान्यतामाथि भीषण आक्रमण गरिदियो । अहिले राज्यको पुनःसंरचना हुन गैरहेको छ र एक भाषा , एक धर्म र एक भेषको मान्यता पनि ध्वस्त बन्न गएको छ । तर पनि नया“ मान्यता अझै स्थापित र सस्थागत बनिसकेको छैन ।
देश अद्र्धऔपनिबेशिक अवस्थामा रहनु , बा≈य हस्तक्षेप तथा सांस्कृतिक प्रदूषण बढ्दै जानु र विद्युतीय सूचना÷सञ्चारको क्षेत्रमा अपूर्व प्रगति हुनुको कारण यहा“ शिक्षा , साहित्य , कला , पत्रकारिता , सिनेमा , रेडियो , टिभी आदि मार्फत् साम्राज्यवाद तथा विस्तारवादले सांस्कृतिक क्षेत्रमा हैकम जमाउ“दै आएको कुरा पनि स्पष्ट नै छ ।
परन्तु , नेपालमा अहिले पनि एकातिर सामन्तवाद तथा साम्राज्यवादसंग संबन्धित जनविरोधी, अराष्ट्रिय एवम् अवैज्ञानिक संस्कृति र अर्कोतिर जनवादी क्रान्तिसँग सम्बन्धित जनवादी, राष्ट्रिय एवम् वैज्ञानिक सँस्कृतिका बीचमा आधारभूत अन्तरविरोध कायमै छ । साँस्कतिक आन्दोलनको आजको मूल समस्या संसदीय यथास्थितिवादमा अल्झिएर बस्ने कि लोकतन्त्रलाई नया“ उ“चाइमा विकसित तुल्याउने, देशको राष्ट्रिय स्वाधीनताको रक्षा गर्ने कि वैदेशिक प्रतिक्रियावादका सामु घुँडा टेक्ने, आन्दोलन तथा वैज्ञानिक चेतनामा आधारित नया“ संस्कृतिले समृद्ध बन्ने कि पुरानै संस्कृतिमा टा“सिइरहने जस्ता विषयसँग जोडिएको छ । नया“ जनसंविधानको निर्माण गर्ने महान् ऐतिहासिक प्रक्रियामा सि¨ो देश अगाडि बढिरहेको बेला सांस्कृतिक रूपान्तरणको प्रश्नले विशेष महत्व राख्दछ ।

३– सांस्कृतिक रूपान्तरणको आवश्यकता
विषयवस्तुको शीर्षकका रूपमा राखिएको सांस्कृतिक रूपान्तरणको आवश्यकता जस्तो पदावलीले राजनीतिक तथा आर्थिक रूपान्तरण पूरा भैसकेको र अब सांस्कृतिक रूपान्तरण मात्र बा“की रहेको भन्ने कुराको छनक दिन खोजेको प्रतीत हुन्छ । यदि कुरा त्यसो हो भने त्यस प्रकारको आशयप्रति सहमत हुन सकिन्न । यदि गणतन्त्रको स्थापना र धर्मनिरपेक्ष राज्यघोषणाको पृष्ठभूमिमा अग्रगामी राजनीतिक तथा आर्थिक रूपान्तरणको प्रक्रियामाथि ध्यान दिंदै सांस्कृतिक रूपान्तरणको आवश्यकता औंल्याइएको हो भने त्यो सही छ ।

सांस्कृतिक रूपान्तरणको आवश्यकताको प्रश्न समाजको भौतिक संस्कृति र आत्मिक संस्कृतिको विकासको एक निश्चित अवस्था र स्तरसँग सम्बन्धित रहेको हुन्छ । यो प्रक्रिया र स्तर नेपाली जनवादी क्रान्तिको ऐतिहासिक चरणसँग जोडिएको छ । यो प्रक्रियामा हाम्रालागि सांस्कृतिक रूपान्तरण त स्वतः आवश्यक छ, तर गुणात्मक प्रकारको राजनीतिक तथा आर्थिक रूपान्तरण विना सांस्कृतिक रूपान्तरण हुन सक्तैन । साथै, अर्कोतिर राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्रमा गुणात्मक रूपान्तरणका लागि पनि सांस्कृतिक रूपान्तरण आवश्यक हुन्छ । आत्मिक संस्कृतिको विकासका लागि भौतिक संस्कृतिको विकास हुन जरुरी छ । यो काममा उत्पादनका साधनहरूमाथि कायम रहिआएको सामन्तवादी स्वामित्व तथा वैदेशिक प्रतिक्रियावादी प्रभुत्व प्रमुख बाधक रहिआएका छन् । भौतिक संस्कृतिको विकासका लागि प्राकृतिक र मानवीय ऊर्जाको सदुपयोग र विकास अनिवार्य शर्त हुन् । संक्षिप्तमा भन्नु पर्दा भौतिक तथा सांस्कृतिक रूपमा नया“ नेपालको निर्माणका लागि पुरानो उत्पादन संबन्ध र सामाजिक संबन्धमाथि आमूल क्रान्ति गर्न अनिवार्य रूपमा आवश्यक छ ।

नेपाली समाज अझै पनि अद्र्धसामन्ती तथा अद्र्धऔपनिवेसिक अवस्थामा रहेको स्थितिमा सांस्कृतिक रूपान्तरणको आवश्यकता भन्नाले आर्थिक , राजनीतिक, नैतिक, कानुनी, दार्शनिक तथा सौन्दर्यबोधीय रूपमा विद्यमान पुरानो सामाजिक संबन्धमा क्रान्ति गरी नया“ सामाजिक संबन्ध स्थापित गर्ने जनसमुदायको आत्मिक आकांक्षालाई बुझ्न पर्दछ । तदनुसार सांस्कृतिक रूपान्तरणको आवश्यकताका सन्दर्भमा ध्यान दिनु पर्ने विषयहरू मूलतः यी हुन्ः

(क) जनवादको प्रश्न ः
ड्ड किसान, दस्तकार, मजदुर लगायतका आम जनसमुदायको मुक्तिको लागि सामन्तवादी उत्पीडन तथा भेदभावको अन्त्य र वास्तविक स्वतन्त्रता, जनताको लोकतान्त्रिक अधिकारको स्थापना तथा त्यसको अभ्यासका लागि उपयुक्त वातावरणको निर्माण ।
ड्ड महिला समुदायको मुक्तिको लागि पितृसत्तावादी हैकम तथा भेदभावको अन्त्य र सबै क्षेत्रमा पुरुष सरह समानता तथा विशेषाधिकारको व्यवस्था ।
ड्ड जनजाति समुदायको मुक्तिका लागि खस–हिन्दुवादी उच्च राष्ट्राहंकारवादको अन्त्य र जातीय आत्मनिर्णयको अधिकारको स्वीकृतिसहित जातीय स्वशासनको स्थापना ।
ड्ड दलित समुदायको मुक्तिको लागि सामन्ती ब्राह्मणवादी उत्पीडन तथा भेदभावको अन्त्य, राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रमा समानता तथा विशेषाधिकारको व्यवस्था ।
ड्ड जनताका बीचमा पारस्परिक मैत्री, सद्भाव तथा भ्रातृत्व भावना स्थापित गर्ने एवम् त्यसलाई विकसित तुल्याउने काममा जोड ।
यी सबै कुराका निम्ति अहिले सामन्तवादी सामाजिक संबन्ध तथा त्यसप्रकारको मानसिकता, संसदीय यथास्थितिवाद र सुधारवाद बाधक रहेका छन् । हामीले यी बाधकहरूका विरुद्ध संघर्षगर्दै लोकतन्त्रलाई अर्को नया“ उ“चाइ प्रदानगर्न जरुरी छ ।
(ख) राष्ट्रिय स्वाधीनताको रक्षाको प्रश्नः
ड्ड साम्राज्यवादी श्रेष्ठता र हीनताबोधी मानसिकताको अन्त्य ।
ड्ड साम्राज्यवादी–विस्तारवादी आर्थिक–सांस्कृतिक घुसपैठ र वर्चस्वको अन्त्य ।
ड्ड देशभक्तिको भावधारामा दृढ रहने तथा त्यसलाई विकसित तुल्याउने र सर्वहारा अन्तराष्ट्रियतावादी भावनाको कदर गर्ने काममा विशेष जोड ।
यी कुराका निम्ति वैदेशिक प्रतिक्रियावादको दलाली तथा राष्ट्रीय आत्मसमर्पणवादी प्रवृत्ति, उपभोक्तावादी चिन्तन र सांस्कृतिक साम्राज्यवाद बाधक रहिआएका छन् । हामीले यिनका विरुद्ध संघषर््ा चलाउन जरुरी छ ।


(ग) आर्थिक क्षेत्र ः
ड्ड सामन्ती तथा दलाल पु“जीवादी उत्पादन सम्बन्धको अन्त्य गर्ने ।
ड्ड भौतिक संस्कृतिको विकासका लागि आर्थिक रूपान्तरण र निर्माणका काममा जोड दिने ।
ड्ड भ्रष्टाचार, कमिशनतन्त्र, अपारदर्शिता, उपभोक्तावाद लगायतका गलत प्रवृत्तिलाई दुरुत्साहित तुल्याउने ।
ड्ड सांस्कृतिक उद्योग र सूचना प्रौद्योगिकीको प्रभाव तथा साम्राज्यवादी–विस्तारवादी हस्तक्षेपका विरुद्ध संघर्ष गर्ने ।
ड्ड डान्सबार, क्यासिनो, अश्लील विज्ञापन लगायतका विकृति तथा विसंगतिमा आधारित संस्कृतिमाथि नियन्त्रण कायम गर्ने ।

(घ) वैचारिक क्षेत्रः
ड्ड धार्मिक अन्धविश्वास, महिलाप्रतिको हेपाइ, जातपात–छुवाछुत, धामीझ“ँक्री लगायतका सामन्तवादी तथा रुढिवादी परम्परालाई दुरुत्साहित गर्ने ।
ड्ड जन्म–विवाह–मृत्युका समयमा गरिने संस्कारलाई नया“ ढंगले संगठित तथा रूपान्तरित गर्दै जाने ।
ड्ड चाडवाड, मेलापर्व आदिमा सन्निहित रुढिवादी परम्पराको अन्त गर्ने ।
ड्ड जनताको धार्मिक स्वतन्त्रताको कदर गर्ने र धार्मिक उत्पीडनका विरुद्ध संघर्ष चलाउने ।
ड्ड श्रम तथा श्रमिक जनताको सम्मान गर्ने र जनतालाई इतिहासको निर्माताको रूपमा लिने ।
ड्ड जनताप्रति प्रेम र वर्गदुश्मनप्रति घृणा जाहेर गर्ने ।
ड्ड समग्र विश्व, जीवन र समाजलाई हेर्ने आदर्शवादी तथा आधिभूतवादी चिन्तनका विरुद्ध द्वन्द्वात्मक तथा ऐतिहासिक भौतिकवादी विश्वदृष्टिकोणको प्रचार–प्रसार गर्ने ।

(ङ) शैक्षिक क्षेत्र ः
ड्ड सामन्तवाद र साम्राज्यवादद्वारा नियन्त्रित शैक्षिक क्षेत्रलाई जनवादी तथा वैज्ञानिक रूपान्तरणको दिशामा विकसित तुल्याउने ।
ड्ड नेपाल र नेपाली जनताको हित र प्रगतिमाथि ध्यान दिँदै परिवर्तित स्थितिअनुसार शैक्षिक नीति, योजना र पाठ्क्रममा परिवर्तन ल्याउने ।
ड्ड शिक्षामा व्यापारीकरणको अन्त्य गर्ने ।

(च) साहित्य र कलाको क्षेत्र ः
ड्ड सामन्तवादी विचारधारा, राजतन्त्र आदिको गुणगानमा आधारित आभिजात्यवादी साहित्य, कला र संस्कृतिलाई दुरुत्साहित गर्ने ।
ड्ड निराशावाद, शून्यवाद, बहुलवाद, पलायनवाद, साम्राज्यवादी विस्तारवादी विकृति, विसंगति, हीनतावोध, अश्लीलता, छाडावाद, आपराधिक मनोवृत्ति आदिलाई प्रश्रय दिने आधुनिकतावादी तथा उत्तरआधुनिकतावादी साहित्य, कला र संस्कृतिलाई दुरुत्साहित गर्ने ।
ड्ड वर्गसंघर्ष, जनआन्दोलन र महान् जनयुद्धको भावधारामा आधारित कलाकृतिहरूकलाई प्रोत्साहित गर्ने ।
ड्ड प्रगतिशील साहित्य र कलाको विकासमा आवश्यक ध्यानदिने ।
ड्ड प्रगतिशील लेखक तथा कलाकारहरूलाई प्रोत्साहित गर्ने ।
ड्ड माक्र्सवादी सौन्दर्य चिन्तन र समाजवादी यथार्थवादलाई अवलम्बन गर्दै त्यसको महत्वबारे व्यापक प्रचार प्रसार गर्ने ।

४–सांस्कृतिक रूपान्तरणको दिशा ः
सांस्कृतिक रूपान्तरणको दिशा भनेको सारमा सांस्कृतिक आन्दोलनको दिशा नै हो । सांस्कृतिक रूपान्तरणको दिशा राजनैतिक आन्दोलनको दिशासाग घनिष्टरूपमा जोडिएको हुन्छ । सांस्कृतिक आन्दोलनको परिधि व्यापक र त्यसको तुलनामा राजनीतिक आन्दोलनको परिधि सीमित हुने गर्दछ । यी दुवैले एकअर्कोलाई प्रभावित पार्ने गर्दछन् । सांस्कृतिक रूपान्तरणको दिशा संबन्धित समाज विशेषको ऐतिहासिक विकासको चरणसँग सम्बन्धित हुन्छ । सांस्कृतिक आन्दोलनलाई सही ढङ्गले अगाडि बढाउनका लागि सांस्कृतिक आन्दोलनको सम्बन्धित चरणमाथि ध्यानदिँदै आवश्यक नीति र कार्यक्रमको निर्माण गर्नु पर्दछ । अद्र्धसामान्ती तथा अद्र्धऔपनिवेसिक अवस्थामा रहिआएको नेपाली समाज पु“जीवादी जनवादी क्रान्तिको ऐतिहासिक चरणका बीचबाट अगाडि बढिरहेको छ । सांस्कृतिक रूपान्तरणको दिशालाई मार्गदर्शन गर्नकालागि माक्र्सवादको सैद्धान्तिक आलोकको आवश्यता पर्दछ । मार्गदर्शक सिद्धान्तबारे नेपाली वामपन्थी तथा सांस्कृतिक आन्दोलनमा विवाद तथा मतभेदहरू रहिआएका छन् । हाम्रो पार्टी नेकपा(माओवादी)ले माक्र्सवाद–लेनिनवाद–माओवाद र प्रचण्डपथलाई मार्गदर्शक सिद्धान्त मान्दै आएको छ ।
सांस्कृतिक रूपान्तरणको दिशाबारे कुरा गर्दा निम्न विषयहरू ध्यानदिन योग्य छन् ः
(क) उद्देश्य
ड्ड जनवादी, राष्ट्रिय र वैज्ञानिक संस्कृतिको स्थापना गर्नु ।
ड्ड नया“ जनवाद हु“दै समाजवाद र साम्यवादको दिशामा अगाडि बढ्नु ।
ड्ड व्यक्तिमा सन्निहित सृजनात्मक ऊर्जाको उद्घाटन तथा सदगुणहरूको विकास गर्नु । समग्र सामाजिक जीवनका साथै उत्पीडित मानिसहरूलाई मुक्तगर्दै उनीहरूको सर्वतोमुखी तथा सामञ्जस्यपूर्ण विकासको प्रक्रियालाई अगाडि बढाउनु ।
(ख) प्रहारको निशाना
ड्ड सांस्कृतिक क्षेत्रमा विद्यमान सामन्तवादी, साम्राज्यवादी तथा विस्तारवादी सबैखाले शोषण, उत्पीडन, हस्तक्षेप र प्रभुत्वको विरोध गर्नु ।
ड्ड साहित्य, कला र संस्कृतिको क्षेत्रमा आभिजात्यवाद, आधुनिकतावाद र उत्तरआधुनिकतावादको विरोध गर्नु ।
(ग) संयुक्त मोर्चा
ड्ड सांस्कृतिक आन्दोलनलाई प्रभावकारी बनाउन विभिन्न प्रगतिशील शक्ति तथा संगठनहरूसँग संयुक्त मोर्चा वा कार्यगत एकताको निर्माण गर्ने ।
ड्ड यो क्षेत्रमा एकता र संघर्षको विधिलाई स्थापित गर्न प्रयत्नशील रहने ।
(घ) नेतृत्व
ड्ड सांस्कृतिक रूपान्तरणका लागि गरिने आन्दोलनको नेतृत्व पुरानो विचार र वर्गबाट हुन सक्तैन भन्ने कुरा जनताको बीचमा पु¥याउने ।
ड्ड सांस्कृतिक रूपान्तरणको नेतृत्व श्रमिक वर्ग र उसको विचारबाट मात्र हुन सक्तछ भन्ने कुरालाई स्थापित गर्ने ।
(ङ) कार्यक्रम
ड्ड आन्दोलनलाई अगाडि बढाउन केन्द्रीय र स्थानीय रूपमा , वेग्ला वेग्लै र संयुक्त रूपमा समेत विभिन्न ढङ्गका कार्यक्रमहरूको सञ्चालन गर्नु पर्दछ ।
ड्ड सांस्कृतिक आन्दोलन वा रूपान्तरणका कार्यक्रमहरूमा वर्गीय, जातीय, भाषिक, क्षेत्रीय, लै¨िक तथा सांस्कृतिक विविधतालाई समेटनु पर्दछ ।

५–सांस्कृतिक आन्दोलनभित्रका समस्या ः
सांस्कृतिक आन्दोलन वा रूपान्तरणको प्रक्रियालाई सही दिशा प्रदान गर्नकालागि यो क्षेत्रमा विद्यमान कतिपय गलत चिन्तन र प्रवृत्तिहरू बाधक रहिआएका छन् । ती मुख्यतः यी हुन् ः ः
(क) व्यवहारवादको समस्या–
यो सिद्धान्तको महत्वलाई सदाका लागि गौण बनाई व्यावहारिक उपयोगितालाई प्राथमिकता दिने चिन्तन र प्रवृत्तिको समस्या हो । यो चिन्तन अनुभववाद, बहुलवाद र उपभोक्तावादमा आधारित छ ।
(ख) वर्गसमन्वयवादको समस्या–
नेपाली सांस्कृतिक आन्दोलनमा वर्गसंघर्ष र वर्गीय पक्षधरताको प्रश्नलाई ओझेलमा पार्दै वर्गसमन्वयवादको भासमा फ“स्ने खतरा हामीकहा“ लामो समयदेखि कायम रहिआएको छ । यो सम्झौतावादको समस्या हो ।
(ग) द्वैतवादको समस्या–
भनाइ र गराइ तथा शब्द र कर्मका बीच विद्यमान द्वैतवादको समस्याले पनि नेपाली सांस्कृतिक आन्दोलन ग्रसित रहिआएको छ । नेपाली जनवादी तथा कम्युनिष्ट आन्दोलनमा यो समस्या अत्यन्तै गम्भीर बन्दै आएको छ ।
(घ) विशुद्धतावादको समस्या–
सांस्कृतिक आन्दोलन र रूपान्तरणको क्षेत्रमा राजनीतिको महत्वलाई इन्कार गर्ने र बैद्धिक कसरतमा जोडदिने विशुद्धतावादको समस्याले पनि हामी पीडित बन्दै आएका छौँ । यो कम्युनिष्ट आन्दोलनभित्रको शास्त्रीयतावादको समस्या हो ।
(ङ) सुधारवादको समस्या–
सांस्कृतिक रूपान्तरणको प्रक्रियामा क्रमिकता तथा सुधारमा मात्र अल्झने र गुणात्मक फड्को हान्न तयार नहुने चिन्तन र प्रवृत्तिबाट पनि हामी ग्रसित रहेका छौं । यो कम्युनिष्ट आन्दोलन भित्रको संसदवादको समस्या पनि हो ।
च) व्यक्तिवादको समस्या– व्यक्तिगत हित तथा स्वार्थप्रति लिप्त रहने र सामाजिक हित तथा समाजवादी मान्यताअनुरूप अगाडि बढ्न नचाहने प्रवृत्ति पनि हामीकहा“ अत्यन्तै प्रवल रहिआएको छ ।
यस अतिरिक्त सांस्कृतिक आन्दोलनमा अकर्मण्यतावाद, संकीर्णतावाद, जडसूत्रवाद लगायतका गलत चिन्तनबाट पनि अनेकौं समस्याहरू देखापर्दै आएका छन् । यी सबै समस्याहरूको समाधानका लागि हामी गम्भीर बन्नु पर्दछ । पुराना आदत, संस्कार, वानी वेहोराहरू फेर्ने, रुचि तथा भावनाको परिष्कार गर्ने, श्रम तथा सृजनात्मक कार्यमा संलग्न रहने, माक्र्सवादको अध्ययनप्रति अभिरुचि जगाउने, देश, जनता, क्रान्ति र समाजवादका उदात्त आदर्शप्रति निष्ठावान हुने, लाभ होइन त्यागलाई प्राथमिकता दिने आदि कुरामा विशेष ध्यान दिनु पर्दछ । यो प्रक्रियामा सांस्कृतिक आन्दोलन र समाजको रूपान्तरणमा संलग्न हुने सांस्कृतिक कर्मीहरू स्वयम् रूपान्तरित हुन र माक्र्सवाद तथा महान् सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्तिको आलोकमा निरन्तर क्रान्तिको दिशामा अगाडि बढ्न जरुरी छ ।
६– उपसंहारः
गोष्ठीको विषयबारे प्रस्तुत गर्नुपर्ने मूल कुरा यिनै हुन् । अहिले सांस्कृतिक रूपान्तरणको आवश्यकता र दिशाबारे गम्भीर बहस र छलफल चलाउने मात्र होइन कि कार्यान्वयनको क्षेत्रमा जाने कुरामा पनि विशेष ध्यानदिन आवश्यक छ । सांस्कृतिक रूपान्तरणको प्रश्न जनवादी तथा समाजवादी क्रान्तिको प्रश्नसँग अभिन्न रूपमा गा“सिएको छ । तसर्थ, यसबारे गम्भीर बन्न जरुरी छ ।
(२७ मंसीर २०६५ मा प्रलेसद्वारा ललितपुरमा आयोजित विचार गोष्ठीमा प्रस्तुत कार्यपत्र)

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